– ई0 प्रभात किशोर पावस ऋतु की रिमझिम फुहार के साथ हीं बैद्यनाथ धाम का विश्व विख्यात श्रावणी मेला प्रारंभ हो जाता है । गेरूआ वस्त्रधारी कांवरियों का सैलाव सुल्तानगंज की उत्तर वाहिनी गंगा से सजेसंवारे कांवर में जल डालकर ‘‘बोल बम‘‘ के गगनभेदी उद्घोष के साथ 97 कि0 मी0 लम्बी कंकरीली-पथरीली डगर पर नंगे पैर चल पड़ते हैं देवघर के बाबा बैद्यनाथ मंदिर की ओर । सम्पूर्ण रास्ते में ‘‘बोल-बम का नारा है, बाबा एक सहारा है ।‘‘ का मंत्रोचार इस बीहड़ पथ को शिवभक्ति से सराबोर कर देता है । भारत के महान तीर्थों में एक है-बैद्यनाथ धाम । भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में एक ‘‘कामना लिंग‘‘ यहीं अवस्थित है । यह तीर्थनगर सिर्फ भारतवर्ष हीं नहीं, अपितु पूरे संसार में विख्यात है । तभी तो वर्मा, भूटान, नेपाल, मारिशस, तिब्बत, बंगला देश, फिजी, पाकिस्तान आदि देशों से भी हर वर्ष लाखों श्रद्धालु शिवभक्त सुल्तानगंज में पतित पावन गंगा से जल भरकर कंधे पर कांवर लिए बैद्यनाथ धाम तक पैदल यात्रा कर बाबा भोलेनाथ पर जल चढ़ाते हैं । पौराणिक किंवदन्तियां वैदिक काल से हीं इस पवित्र तीर्थभूमि की अपनी विशेष महत्ता रही है । शिवपुराण के अनुसार, दक्ष प्रजापति के यज्ञ में अपने पति शिव के अपमानित होने पर सती ने यज्ञकुंड में कूदकर अपने प्राणों की आहूति दे दी । सती की मौत से क्रुद्ध भगवान शिव उनकी लाश अपने कंधे पर लेकर तांडव करने लगे । यज्ञ तहसनहस हो गया तथा चारों ओर प्रलय-सी मच गयी । तब देवताओं की सलाह पर भगवान विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र लाश का अंगअंग काटने हेतु भेज दिया ताकि शिवजी के क्रोध पर काबू पाया जा सके । सती का अंग कटकर गिरने लगा, जो कुल 52 स्थानों पर गिरा । सती का हृत्पिण्ड अर्थात हृदय भाग बैद्यनाथ धाम में जिस स्थान पर गिरा, उस स्थान का नाम ‘‘हार्दपीठ‘‘ पड़ गया । भगवान शिव द्वारा सती के हृत्पिण्ड का दाहसंस्कार उक्त स्थान पर किए जाने के कारण यह ‘‘चिताभूमि‘‘ नाम से भी जानी जाती है। बैद्यनाथ धाम के बारे में एक अन्य किंवदन्ती महापंडित एवं शास्त्रशिरोमणि लंकेश रावण से संबंधित है । लंकापति भगवान शिव का इतना अनन्य भक्त था कि अनेकों बार पुष्प की जगह अपना सिर काटकर हीं उसने अपने आराध्य देव के चरणों में अर्पित कर दिया था । एक बार उसके मन में विचार आया कि बारबार अपने आराध्य के दर्शन हेतु सुदूर प्रदेश लंका से भारत के उत्तरांचल के अंतिम छोर पर स्थित कैलाश तक जाना पड़ता है । अतः क्यों नहीं भगवान शिव को मनाकर उन्हें लंका में हीं कर दूं ताकि हमेशा हीं उनके दर्शनों का लाभ मिल सके । इसी उद्देश्य से एक बार रावण ने कैलाश में घोर तपस्या की । उसके तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने इस शर्त पर लंका जाना स्वीकार कर लिया कि कैलाश से लंका तक के मार्ग में तुम जहां कहीं भी मुझे रख दोगे, मैं वहां से आगे नहीं बढ़ूंगा । रावण ने शर्त मान ली । भगवान शिव के इस निर्णय से देवताओं में हलचल मच गयी, क्योंकि इससे पराक्रमी रावण की आसुरी शक्ति और भी प्रबल होने की आशंका थी। अतः उन्होने एक चाल चली । जब रावण भगवान शिव के सर्वश्रेष्ठ ‘‘कामना लिंग‘‘ को लेकर आकाशमार्ग से लंका जा रहा था, तो उसे इसी देवघर नामक स्थान पर बहुत हीं जोर की लघुशंका लगी । आकाश से नीचे उतरकर उसने बैद्यनाथ चरवाहा वेशधारी भगवान विष्णु को शिवलिंग थमाकर लघुशंका करने लगा । परन्तु यह तो प्रभु की माया थी । घंटो बीत गये, पर रावण की लघुशंका समाप्त नहीं हुई । बैद्यनाथ चरवाहे ने शिवलिंग के भारी बोझ को सहन न कर पाने के कारण रावण के इच्छा के विपरीत महासती के हृदयपीठ चिताभूमि पर स्थापित कर दिया । लघुशंका के पश्चात् रावण ने शिवलिंग को उठाने की काफी कोशिश की, पर शर्त हार जाने के कारण वह ऐसा करने में नाकामयाब रहा । क्रुद्ध होकर उसने अपने अंगूठे से उसे दबा दिया । कालान्तर में उसी चरवाहे के नाम पर भगवान का नाम बैद्यनाथ महादेव पड़ा और वे स्थानीय भक्तों द्वारा पूजे जाने लगे । लंका नरेश ने शिवलिंग के समीप हीं एक कुएं का निर्माण कर उसमें सारे तीर्थों का जल डाला। जहां मुस्टि के निर्माण के प्रहार से गंगा निकली थी, वहां एक कुंड का निर्माण करवाया, जो आज शिवगंगा के रूप में अवस्थित है । रावण के लंका लौटने के उपरान्त विश्वकर्मा ने बड़े-बड़े पत्थरों से बैद्यनाथ मंदिर के अलावा इस विशाल प्रागंण में 21 अन्य भव्य मंदिरों का निर्माण किया । ये मंदिर हैं- अन्नपूर्णा मंदिर, जगजननी मंदिर, पार्वती मंदिर, काल भैरव मंदिर, गणेश मंदिर, ब्रह्मा मंदिर, संध्या मंदिर, मनसा मंदिर, गंगा मंदिर, हनुमान मंदिर, सूर्य मंदिर, सरस्वती मंदिर, राम मंदिर, बगला मंदिर, आनंद भैरव मंदिर, नर्मदेश्वर मंदिर, गौरीशंकर मंदिर, काली मंदिर, तारा मंदिर, नीलकंठ मंदिर और लक्ष्मीनारायण मंदिर । हमारे शास्त्रों में भी बैद्यनाथ धाम का महत्व उल्लिखित है । पद्मपुराण में इसकी महिमा का गुणगान करते हुए कहा गया है- ‘‘बैद्यनाथ महालिंगम, भवरोग हरे शिवम्‘‘ । आनंद रामायण के अनुसार, एक बार स्वयं प्रभु रामचन्द्रजी गंगा से जल भरकर बैद्यनाथ धाम आये थे और शिव की पूजा-अर्चना की थी । तबसे प्रति दिन लाखों की संख्या में भक्तजन यहां आते हैं और कामना लिंग की पूजा कर मनोबांछित फल प्राप्त करते हैं । सम्पूर्ण श्रावण माह तक लगने वाले इस श्रावणी मेले की महत्ता न सिर्फ राष्ट्रीय नक्शे पर है, वरन् इसे विश्व का सर्वाधिक लम्बा मेला कहा जाता है । किसी भी मायने में प्रयाग, हरिद्वार आदि में कुंभ मेले, गंगा सागर मेला, वैष्णों देवी एवं दक्षिण भारत के अन्य मेले से यहां का लगातार तीस दिनों का श्रावणी मेला कम नहीं है । नदियों के लहरों सी लहराती बलखाती अनवरत चलती शिवभक्त कांवरियों की टोलियों की ‘‘बोल बम – बोल बम‘‘ के गगनभेदी नारों से सर्वत्र आध्यात्मिक वातावरण का सा समां बंध जाता है। सैकड़ों मील पैदल चल रहे स्त्री-पुरूष भक्तों के पैरों में छाले पड़ जाते हैं, पीड़ा होती है । पर बाबा पर गंगा जल अर्पित करते हीं सारे दर्द छूमंतर हो जाते हैं और भक्तजन आत्म विभोर हो जाते हैं । (लेखक अभियंता एवं शिक्षाशास्त्री हैं।), पटना