– विश्वास राणा
फ़िक्र नहीं जो मुझसे ख़फ़ा हैं, बाशिंदे तेरे शहर के
शुक्र यही मेरी आवारगी पे फिदा हैं, परिंदे तेरे शहर के
क़तल सब खुद करें , इलज़ाम हमारे सर धरें
गज़ब जादूगरी करते हैं, नुमाइंदे तेरे शहर के
एक ज़रा सी दस्तक क्या दी साफ़दिली ने नगर द्वार पे
बिलों में जाके छिप गए हैं, दरिंदे तेरे शहर के
हाँ मेरी ही थी सब खता, तुम तो ठहरे बड़े नादां
आदमी सी फितरत रखते हैं, आईने तेरे शहर के
फ़िक्र नहीं जो मुझसे ख़फ़ा हैं, बाशिंदे तेरे शहर के ….