अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को वैचाारिक और जमीनी स्तर पर राष्ट्रीय बनाने में प्रोफेसर यशवंतरराव केलकर, प्रोफेसर बाल आप्टे तथा मदनदास देवी का विशेष योगदान रहा है। इनमें से प्रचारक के नाते मदनदास जी की विशिष्ट भूमिका रही। उनका जन्म नौ जुलाई, 1942 को महाराष्ट्र में सोलापुर जिले के करमाला गांव में हुआ था। यद्यपि उनके पूर्वज गुजरात से थे। बचपन में ही वे अपने भाई कुशलदास जी के साथ शाखा जाने लगे। धीरे-धीरे उनका प्रेम संघ के प्रति बढ़ने लगा। मेधावी होने के नाते उन्होंने एम.काॅम, स्वर्ण पदक के साथ एल.एल.बी. तथा फिर सी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद वे सुख, सुविधा और वैभव का जीवन जी सकते थे; पर उन्होंने प्रचारक बनकर जीवन देश की सेवा में समर्पित कर दिया।
मदनदास जी 1964 में विद्यार्थी परिषद के काम से जुड़े। पहले मुंबई, 1968 में पश्चिम क्षेत्र और फिर 1970 में वे राष्ट्रीय संगठन मंत्री बनाये गये। यह जिम्मेदारी उन्होंने 22 साल तक संभाली। 1992 में उन्हें संघ में अ.भा. सह प्रचारक प्रमुख तथा 1993 में सह सरकार्यवाह की जिम्मेदारी दी गयी। विदेश में जहां स्वयंसेवक रहते हैं, वहां के प्रवास में उन्होंने पारिवारिक शाखा का सुझाव दिया। इससे परिवार के सब लोग संघ से जुड़ने लगे। अब तो विश्व विभाग के अन्तर्गत सर्वत्र ऐसी ही साप्ताहिक शाखाएं लगती हैं।
1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनने पर उन्हें संघ और सरकार के बीच समन्वय का कठिन काम दिया गया। इधर संघ और समविचारी संगठनों की प्रबल आंकाक्षाएं थीं, तो उधर गठबंधन की मजबूरियां। दोनों में समन्वय तलवार की धार पर चलने जैसा था; पर मदनदास जी ने उसे भरपूर निभाया। यद्यपि उन्हें दोनों ओर से आलोचना झेलनी पड़ी। इसका दुष्प्रभाव उनके स्वास्थ्य पर पड़ा, जिससे वे आजीवन उबर नहीं सके। 2009 में उनका बोझ घटाकर उन्हें संघ की केन्द्रीय कार्यकारिणी का सदस्य तथा दीनदयाल शोध संस्थान का संरक्षक बनाया गया।
मदनदास जी मानते थे कि परिषद का गठन छात्र राजनीति के लिए नहीं, अपितु शिक्षा जगत में व्यापक बदल के लिए हुआ है। इसलिए छात्र संघ के चुनाव के साथ देशहित में रचनात्मक काम और आंदोलन भी जरूरी हैं। संघ और परिषद के कार्यकर्ताओं के लिए ‘करणीय और अकरणीय’ क्या है, इसकी चर्चा वे सबसे करते थे। वे कहते थे कि युवाओं की तरह युवतियों में भी नेतृत्व की क्षमता है। इसलिए परिषद में उन्हें हर स्तर पर स्थान दिया गया। वे प्राध्यापक आदि वरिष्ठ बुद्धिजीवियों से गंभीर विमर्श करते थे, तो छात्रावासों में विद्यार्थियों में भी घुलमिल जाते थे। इसके कारण बड़ी संख्या में पूर्णकालिक कार्यकर्ता तथा प्रचारक संगठन को प्राप्त हुए। नये विचार सुनने, समझने और अपनाने को वे सदा उत्सुक रहते थे। आर्थिक विषयों पर उनकी समझ बहुत गहरी थी।
मदनदास जी परिषद के शिल्पी थे। एक समय लोग परिषद को जनसंघ या भा.ज.पा. का युवा विभाग मानते थे; पर मदनदास जी ने स्पष्ट किया कि हम इनके नहीं, संघ के समविचारी संगठन हैं। उनमें व्यक्ति को समझने की अद्भुत क्षमता थी। वे घंटों बातकर मन की तह तक पहुंचते थे। इससे कार्यकर्ताओं के मनभेद समाप्त हुए। वे कार्यकर्ता की एक-दो भूल माफ करते थे; पर फिर नहीं। यद्यपि इसके बाद भी वे उससे संपर्क बनाये रखते थे। 1975 के आपातकाल में परिषद के भी हजारों कार्यकर्ता सत्याग्रह कर जेल में गये।
24 जुलाई, 2023 को बंगलुरू में मदनदास जी का देहांत हुआ। उनके साथ काम करने वाले कई लोग आज राजनीति तथा सामाजिक क्षेत्र में प्रतिष्ठा प्राप्त हैं। ये सब अपनी कार्यशैली पर उनका प्रभाव स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं। इनमें एक नाम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भी है।