टी एसोसिएशन ऑफ इंडिया के उत्तर बंगाल शाखा के अध्यक्ष उत्तम चक्रवर्ती ने बताया कि कई चाय बागानों को उत्पादन लागत से भी कम कीमत पर चाय बेचनी पड़ रही है। इससे बागानों पर कर्ज का बोझ बढ़ रहा है और वित्तीय संकट गहरा रहा है। उन्होंने कहा कि उच्च गुणवत्ता वाली चाय उत्पादन और उचित कीमत प्राप्त किए बिना उद्योग की स्थिरता संभव नहीं है।
लागत में भारी वृद्धि बनी बड़ी चुनौती
पिछले कुछ वर्षों में उर्वरक, कोयला, कीटनाशक और बिजली की लागत में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उद्योग के अनुसार केवल बिजली पर ही तैयार चाय के प्रति किलोग्राम उत्पादन में लगभग 10 से 11 रुपये तक खर्च आ रहा है।
संस्था की अध्यक्ष शैलजा मेहता ने कहा कि उत्पादन लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि चाय की कीमतों में उसी अनुपात में वृद्धि नहीं हो रही है। उन्होंने उत्पादन लागत और बिक्री मूल्य के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए न्यूनतम टिकाऊ मूल्य प्रणाली लागू करने की मांग की।
लाखों लोगों की आजीविका पर असर
उत्तर बंगाल के चाय उद्योग से लगभग 32 लाख लोगों की आजीविका जुड़ी हुई है, जो क्षेत्र की कुल आबादी का करीब 28 प्रतिशत है। ऐसे में उद्योग की कमजोर स्थिति का सीधा प्रभाव स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार पर पड़ सकता है।
श्रमिकों की कमी और जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
उद्योग अधिकारियों के अनुसार श्रमिकों की उपलब्धता भी बड़ी समस्या बनती जा रही है। कई बागानों में उत्पादन के चरम समय पर 25 से 50 प्रतिशत तक श्रमिक अनुपस्थित रहते हैं, जिसके कारण बागानों को बाहरी श्रमिकों को अधिक लागत पर नियुक्त करना पड़ रहा है।
इसके अलावा अनियमित वर्षा, बढ़ते तापमान और कीट प्रकोप जैसी जलवायु संबंधी समस्याओं से उत्पादन और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
उद्योग की प्रमुख मांगें
चाय उत्पादकों ने टी बोर्ड इंडिया से लंबित सब्सिडी जल्द जारी करने, कार्यशील पूंजी ऋण पर ब्याज में राहत देने तथा विशेष चाय उत्पादन और मशीनरी आधुनिकीकरण के लिए वित्तीय प्रोत्साहन देने की मांग की है।
इसके साथ ही उद्योग ने यह भी आग्रह किया है कि संगठित चाय उत्पादकों को कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की योजनाओं का लाभ दिया जाए, क्योंकि चाय उत्पादन मुख्य रूप से कृषि आधारित गतिविधि है।
ऊर्जा लागत कम करने पर जोर
उद्योग संगठनों ने बिजली दरों में कमी तथा पश्चिम बंगाल विद्युत नियामक आयोग द्वारा अधिसूचित सौर ऊर्जा प्रावधानों को शीघ्र लागू करने की भी मांग की है, जिससे ऊर्जा लागत घटाई जा सके।
सस्ते आयात और गलत लेबलिंग से नुकसान
उद्योग प्रतिनिधियों का कहना है कि सस्ते आयात और मिश्रित चाय को भारतीय मूल का बताकर बेचने की प्रवृत्ति घरेलू उत्पादकों को नुकसान पहुंचा रही है। उन्होंने गुणवत्ता मानकों और निर्यात प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए कड़ी निगरानी की मांग की।
वैश्विक स्तर पर भारत की मजबूत स्थिति
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चाय उत्पादक देश है और यह क्षेत्र सीधे तौर पर 10 लाख से अधिक श्रमिकों को रोजगार प्रदान करता है। ऐसे में उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उचित नीतिगत समर्थन और सुधार लागू किए जाएं, तो यह क्षेत्र न केवल टिकाऊ बन सकता है बल्कि निर्यात और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत कर सकता है।