काछार के श्रीकोना आलमबाग में श्री श्री लक्ष्मी माई मेला एवं शिव चतुर्दशी मेला का भव्य आयोजन
काछार (असम): बराक घाटी के ऐतिहासिक एवं आस्था के प्रमुख केंद्र श्रीकोना आलमबाग में स्थित श्री श्री लक्ष्मी माई मंदिर के पावन प्रांगण में प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी शिव चतुर्दशी के अवसर पर सप्ताहव्यापी भव्य मेले का आयोजन किया गया। रविवार को मेला कमेटी के सदस्यों द्वारा विधिवत रूप से मेले का उद्घाटन किया गया।
आस्था और चमत्कार से जुड़ा प्राचीन इतिहास
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार लगभग 250 से 300 वर्ष पूर्व सनुसाधु नामक एक संत को स्वप्न में एक दिव्य कन्या के दर्शन हुए। बाद में वही कन्या पहाड़ी पर साक्षात प्रकट हुईं और तत्पश्चात शिला रूप धारण कर लिया। संत ने इसे माता लक्ष्मी का आशीर्वाद मानते हुए समझा कि देवी इस स्थान पर मंदिर स्थापना की इच्छा रखती हैं।
इसी प्रकार गयादास ब्रह्मचारी नामक एक अन्य संत, जो उस समय इस पहाड़ी पर तपस्या करते थे, उन्हें भी दिव्य अनुभूति हुई। उन्होंने यहां मंदिर निर्माण का संकल्प लिया। मान्यता है कि मंदिर निर्माण के दौरान स्वयंभू रूप में “लक्ष्मी शिला” प्रकट हुई तथा माता लक्ष्मी का वाहन उल्लू भी शिला रूप में प्रकट हुआ।
सबसे पहले यहां लक्ष्मीबाड़ी मंदिर की स्थापना हुई, उसके बाद नारायण मंदिर का निर्माण किया गया। समय के साथ स्थानीय ग्रामीणों ने पहाड़ी पर राम मंदिर और शिव मंदिर का भी निर्माण कराया। वर्तमान में राम मंदिर का निर्माण कार्य जारी है।
‘बराक घाटी का दूसरा भुवन’
यह छोटी सी पहाड़ी बराक घाटी का “दूसरा भुवन” के नाम से भी प्रसिद्ध है। पहाड़ी पर स्थित ‘हस्तिकुंड’ नामक जलाशय में वर्षभर जल भरा रहता है, जो इस स्थल की विशेषता मानी जाती है।
शिव चतुर्दशी पर उमड़ता है जनसैलाब
लक्ष्मीबाड़ी मंदिर और शिव मंदिर की स्थापना के बाद से प्रत्येक वर्ष शिव चतुर्दशी के दिन यहां हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। इसी अवसर पर लक्ष्मीबाड़ी के पाददेश में विशाल सप्ताहव्यापी मेला आयोजित किया जाता है। इस मेले में देश के विभिन्न हिस्सों से व्यापारी पहुंचकर विविध प्रकार की वस्तुओं की बिक्री करते हैं।
पत्रकार वार्ता में दी गई विस्तृत जानकारी
मेला उद्घाटन के अवसर पर आयोजित पत्रकार सम्मेलन में मेला कमेटी के पदाधिकारियों ने मंदिर के इतिहास एवं मेले के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। इस अवसर पर कमेटी के अध्यक्ष मलय कांती दास, सचिव धीरज गौड़, जीतू लाल दास, सरेल माझी, बाबुल दास, साधन दास, मोंटू दास, दोलन सबर, राय मोहन दास, मतिलाल दास सहित अनेक सदस्य उपस्थित रहे।
आयोजकों ने बताया कि यह मेला केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक समागम का भी प्रमुख मंच है, जो क्षेत्र की परंपरा और भाईचारे को सुदृढ़ करता है।