मधुरा नदी से जयवाद्य की ध्वनि के बीच सात कुमारियों ने किया पवित्र जल संग्रह, उसी जल से भरे जाते हैं देवी पूजन के घट
प्रेरणा भारती, निहार कांति राय, उधारबंद।
शारदीय दुर्गोत्सव के उल्लास में कछार जिले का उधारबंद पूरी तरह सराबोर है। महाषष्ठी के पावन अवसर पर विभिन्न दुर्गापूजा मंडपों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। रंग-बिरंगी रोशनी, आकर्षक मंडप सज्जा, प्रतिमाओं की कलात्मक सुंदरता और देवी दर्शन के उत्साह से पूरा क्षेत्र उत्सवमय हो उठा है। लेकिन आधुनिक साज-सज्जा और भव्य आयोजनों के बीच अपनी धार्मिक मान्यताओं, प्राचीन परंपराओं और शास्त्रीय विधि-विधानों को अक्षुण्ण रखते हुए उधारबंद की ऐतिहासिक रूपसी बाड़ी की दुर्गापूजा अपनी विशिष्ट पहचान के साथ आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।
मणिपुरी समुदाय की यह दुर्गापूजा केवल वार्षिक धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे समुदाय की विशिष्ट संस्कृति, पारंपरिक रीति-रिवाजों और पीढ़ियों से चली आ रही विरासत का गहरा संबंध है। विशेष रूप से यहां कुमारी पूजन के दौरान निभाई जाने वाली अनूठी धार्मिक परंपरा श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखती है। प्राचीन परंपरा के अनुसार इस वर्ष भी सात कुमारियों के पूजन की व्यवस्था की गई है। इस अनुष्ठान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मधुरा नदी से पवित्र जल संग्रह करने की विशेष परंपरा है।
शनिवार को निर्धारित धार्मिक विधि-विधान के अनुसार जयवाद्य की ध्वनि के बीच सात कुमारियों की मधुरा नदी की ओर यात्रा निकाली गई। धार्मिक आस्था, परंपरा और उत्सवी उल्लास के संगम के बीच पवित्र जल संग्रह का अनुष्ठान संपन्न हुआ। मधुरा नदी से पवित्र जल एकत्र करने के बाद कुमारियां उसे लेकर पूजा मंडप में लौटीं। इसके बाद इसी जल से देवी पूजन के घटों को भरा गया। रूपसी बाड़ी की दुर्गापूजा में इस विशिष्ट परंपरा को लेकर श्रद्धालुओं में गहरी आस्था और धार्मिक भावनाएं जुड़ी हुई हैं।
### कुमारी पूजन से जुड़ी है प्राचीन धार्मिक मान्यता
हिंदू धार्मिक परंपरा में कुमारी पूजन का विशेष महत्व है। कुमारी कन्या में देवीशक्ति के पवित्र स्वरूप का दर्शन कर मातृरूप में उनकी आराधना करना इस पूजा का मूल भाव है। रूपसी बाड़ी की दुर्गापूजा में भी इस परंपरा को विशेष महत्व दिया जाता है। सात कुमारियों को केंद्र में रखकर संपन्न होने वाले धार्मिक अनुष्ठान इस पूजा की विशिष्टता को और अधिक उजागर करते हैं।
यहां मधुरा नदी से पवित्र जल संग्रह करने की परंपरा केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इससे पूजा की तैयारी, धार्मिक शुद्धता और लंबे समय से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत की स्मृतियां जुड़ी हुई हैं। जयवाद्य बजाते हुए नदी की ओर प्रस्थान करना, निर्धारित विधि से जल संग्रह करना और उसी जल से देवी के पूजन घटों को भरना—अनुष्ठान के प्रत्येक चरण में परंपरा के प्रति गहरी श्रद्धा दिखाई देती है।
ये धार्मिक रीति-रिवाज नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और परंपराओं से परिचित कराने का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम हैं। इनके जरिए पुरानी पीढ़ी की आस्था और सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।
### आधुनिकता के बीच भी अटूट है परंपरा की पहचान
वर्तमान समय में दुर्गापूजा के दौरान मंडप सज्जा, आकर्षक रोशनी और कलात्मक प्रस्तुतियों की विविधता श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बन रही है। समय के साथ त्योहार मनाने के तौर-तरीकों में भी बदलाव आ रहा है। लेकिन इन परिवर्तनों के बीच रूपसी बाड़ी की दुर्गापूजा यह साबित करती है कि किसी उत्सव की वास्तविक शक्ति केवल बाहरी भव्यता तक सीमित नहीं होती। उसकी गहरी सार्थकता अपनी धार्मिक मान्यताओं, शास्त्रीय विधि-विधानों और सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित रखने में निहित होती है।
मणिपुरी समुदाय की इस पूजा में प्राचीन परंपराओं की निरंतरता अतीत और वर्तमान के बीच एक मजबूत सेतु का निर्माण करती है। बुजुर्गों से प्राप्त रीति-रिवाज नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत के महत्व से परिचित कराते हैं। इस प्रकार रूपसी बाड़ी की दुर्गापूजा देवी आराधना के साथ-साथ समुदाय की सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
इस पारंपरिक धार्मिक विधि के महत्व पर प्रकाश डालते हुए सीएनएन 24 के प्रतिनिधि निहार कांति राय से बातचीत में रूपसी बाड़ी दुर्गापूजा समिति के पदाधिकारी धनेश्वर सिंह ने इस विशेष परंपरा के विभिन्न पहलुओं की जानकारी दी। उन्होंने पूजा से जुड़ी प्राचीन मान्यताओं, कुमारी पूजन के महत्व और मधुरा नदी से पवित्र जल संग्रह करने की पारंपरिक प्रथा के बारे में बताया।
### आस्था, भक्ति और संस्कृति का सामूहिक संगम
शारदीय दुर्गोत्सव आनंद, भावनाओं और सामाजिक सद्भाव का पर्व है। मां दुर्गा की आराधना के साथ विभिन्न समुदायों के विशिष्ट रीति-रिवाज और सांस्कृतिक विविधताएं इस उत्सव को और अधिक समृद्ध बनाती हैं। उधारबंद की रूपसी बाड़ी की दुर्गापूजा इसी सांस्कृतिक विविधता का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। यहां कुमारी पूजन का विशेष आयोजन और मधुरा नदी से पवित्र जल संग्रह करने की प्राचीन परंपरा धार्मिक आस्था के साथ-साथ मणिपुरी समुदाय की सांस्कृतिक विशिष्टता को भी सामने लाती है।
समय के साथ अनेक बदलाव आने के बावजूद जो परंपराएं लोगों की आस्था और भावनाओं से गहराई से जुड़ी रहती हैं, वे आसानी से विलुप्त नहीं होतीं। रूपसी बाड़ी की दुर्गापूजा की यह विशिष्ट परंपरा इसी तथ्य को एक बार फिर रेखांकित करती है। जयवाद्य की गूंज, मधुरा नदी का पवित्र जल और सात कुमारियों के इर्द-गिर्द संपन्न होने वाले धार्मिक अनुष्ठान—इन सबके समन्वय से यहां मातृवंदना का एक अनूठा स्वरूप देखने को मिलता है।
आधुनिकता के साथ कदम मिलाते हुए प्राचीन संस्कृति की जड़ों को मजबूती से थामे रखने का यह प्रयास निस्संदेह सराहनीय है। शारदीय दुर्गोत्सव की वास्तविक सुंदरता केवल जगमगाती रोशनी और भव्य मंडपों में नहीं, बल्कि लोगों की आस्था, भक्ति, सांस्कृतिक पहचान और पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती परंपराओं में निहित है। इसी विरासत को श्रद्धापूर्वक संजोते हुए महाषष्ठी के उत्सवी वातावरण में रूपसी बाड़ी की दुर्गापूजा अपनी विशिष्ट पहचान के साथ आलोकित हो रही है।