-पूजा पारीक
हमारे समाज ने जेंडर की औपचारिक गिनती भले ही थर्ड जेंडर पर रोक रखी हो, मगर सामाजिक व्यवहार ने चुपचाप एक “चौथा जेंडर” गढ़ लिया है—एकल महिला। तलाकशुदा हो, पति से अलग रह रही हो या अपनी इच्छा से अकेले जीवन जी रही हो या विशेष रूप से- विधवा हो, समाज की निगाह में उसकी पहचान सबसे पहले यही होती है कि “वह अकेली है।” और मानो उसका जीवन अब उसका निजी जीवन नहीं रहा।
उसकी चाल में अर्थ खोजे जाएंगे, उसकी मुस्कान का विश्लेषण होगा, उसकी खामोशी पर प्रश्नचिह्न लगेगा, उसके कपड़ों पर बहस होगी, उसके आने-जाने का हिसाब रखा जाएगा और उसके मित्रों की सूची पर अनौपचारिक जनगणना कर ली जाएगी।
वह हँसती है तो सवाल उठता है “इसके खुश रहने की वजह क्या है? अरे! कितना हंसती है?” रोती है तो सलाह मिलती है—“अब तो मजबूत बनो, रो-रो के सबको दिखाना चाहती है कि कितनी दुखी है।” सजती है तो सबके कान खड़े हो जाते हैं कि आखिर किसे दिखाने के लिए सज रही है? सादा रहती है तो “पुरुषों की सहानुभूति लेना चाहती है, अच्छे से तैयार होकर रहना चाहिए न !”
किसी पुरुष से दो शब्द बात कर ले तो समाज की कल्पनाशक्ति अचानक अद्भुत रूप से सक्रिय हो जाती है। और ये कल्पनाशक्ति ‘जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि’ वाले रवि और कवि दोनों को ही बहुत पीछे छोड़ देती है| और अगर किसी पुरुष से बात न करे तो भी फैसला तैयार— “बहुत घमंडी है। पता नहीं खुद को क्या समझती है|” अर्थात एकल महिला के लिए कोई सही उत्तर नहीं है। समाज ने उसके लिए प्रश्नपत्र ही ऐसा बनाया है, जिसमें हर उत्तर गलत ही है।
सबसे अधिक विडंबना तब होती है, जब एकल महिला खुद को सँवारती है। “किसे दिखाना है? अब इस उम्र में इतना सजने की क्या जरूरत है?” लेकिन कोई यह क्यों नहीं पूछता कि शायद वह किसी को दिखाने के लिए नहीं, खुद को देखने के लिए सजी है। शायद वह आईने के सामने इसलिए खड़ी होती है कि लंबे समय बाद उसे अपने चेहरे पर अपना ही चेहरा दिखाई दे। शायद वह खुद से कहना चाहती है— “मैं ज़िंदा लाश नहीं, ज़िंदा इंसान हूँ| एक स्त्री हूँ, जिसे सजना पसंद है| दूसरों के लिए नहीं; खुद के लिए |” जिंदगी ने उससे बहुत कुछ छीना होगा। उसके हिस्से में बहुत से ऐसे दिन आए होंगे, जब सुबह उठना भी सिर्फ एक जिम्मेदारी रहा होगा। बहुत सी रातें ऐसी रही होंगी, जिनमें तकिए ने उसके आँसुओं के अलावा और कुछ भी महसूस नहीं किया होगा।
लेकिन फिर एक दिन वह अलमारी खोलती है, अपनी पसंद की साड़ी निकालती है, बाल सँवारती है, माथे पर बिंदी लगाती है, आँखों में काजल, होठों पर रंग और आईने में खुद को देखती है। पर एकदम से उसे ऐसे लगता है जैसे उसने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया है, बाहर सबकी नजरों का सामना कैसे कर पायेगी? लोग क्या कहेंगे? यही डर और सवाल उसके विचारों और बदलाव की चाह पर हावी हो जाते हैं |
पर उस क्षण वह कोई अपराध नहीं कर रही होती है , स्त्री की स्वाभाविक वृत्ति को जीना चाहती है बस | अपने जीवन को सामान्य महसूस करना चाहती है | उसे किसी पुरुष की आँखों की नहीं, अपने आत्मसम्मान की जरूरत होती है। वह सजती है ताकि कोई उसे सुंदर कहे—यह जरूरी नहीं। वह इसलिए भी सज सकती है कि उसे खुद अपने चेहरे पर जिंदगी की थोड़ी-सी चमक लौटती हुई दिखाई दे।
क्योंकि अकेलेपन के लंबे गलियारों से गुजरते हुए कई बार इंसान अपने ही अस्तित्व से दूर हो जाता है। वह हँसना भूल सकता है। अपने लिए जीना भूल सकता है। आईने में खुद को देखना भी भूल सकता है। और तब थोड़ा-सा श्रृंगार केवल श्रृंगार नहीं रहता— वह स्वयं को फिर से पहचानने की एक छोटी-सी कोशिश बन जाता है।
वह किसी को रिझाना नहीं चाहती।
वह किसी को चुनौती नहीं दे रही।
वह किसी को कुछ साबित भी नहीं कर रही।
वह बस अपने भीतर यह विश्वास जगाना चाहती है कि—
“मैं केवल किसी की पत्नी, किसी की विधवा या किसी की जिम्मेदारी नहीं हूँ। मैं स्वयं भी एक संपूर्ण मनुष्य हूँ। मेरे भीतर अभी भी धड़कता हुआ एक दिल है, मेरी आँखों में अभी भी सपने हैं, और सुंदर लगने का अधिकार अभी भी मेरा है। मेरे पास खुश रहने कि बहुत वजहें नहीं होंगी, पर फिर भी मैं खुश रहना चाहती हूँ|”
शायद समाज को यह समझने में अभी बहुत समय लगेगा कि जिंदगी को महसूस करने के लिए किसी दूसरे की स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती।
हर गली, हर मोहल्ले और हर परिचित मंडली में, जहां देखो वहां कुछ फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट हैं, जिनमें ना सबूत हैं, ना गवाह हैं, ना ही वकील है, ना अपील है, और फैसला तो इतना फ़ास्ट कि फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट भी स्लो ट्रैक कोर्ट हैं इनके सामने| इनमें कुछ स्वयंभू न्यायाधीश मौजूद हैं, जो अपने हाथ में चरित्र प्रमाण पत्र और पेन रखते हैं जिससे उस स्त्री के चरित्र को ए, बी या सी ग्रेड दे सकें | फैसला-ऑन द स्पॉट |
किसी की हँसी पर फैसला।
किसी के पहनावे पर फैसला।
किसी की दोस्ती पर फैसला।
किसी की स्वतंत्रता पर फैसला।
मानो अकेली स्त्री इंसान नहीं, समाज की खुली हुई फाइल हो—जिसे कोई भी पढ़ सकता है और उस पर टिप्पणी लिख सकता है। विडंबना यह भी है कि इस सामाजिक अदालत की कई मुखर न्यायाधीश स्वयं महिलाएँ ही होती हैं, निन्यानवे प्रतिशत आरक्षण महिलाओं ने ही ले रखा है इस पोस्ट के लिए |
एक स्त्री दूसरी स्त्री को देखकर सहजता से कह देती है—“अकेली है… पता नहीं कैसी होगी।” इस एक वाक्य में सदियों की सामाजिक दृष्टि छिपी होती है। हमने स्त्रियों को एक-दूसरे का सहारा बनने के बजाय कई बार एक-दूसरे का नैतिक प्रहरी बना दिया है। पुरुष देर रात घर लौटे तो—“काम होगा।” पुरुष मित्रों के साथ घूमे तो—“जिंदगी का आनंद ले रहा है।” पुरुष अकेला रहे तो—“स्वतंत्र है।” लेकिन स्त्री देर से लौटे तो प्रश्न। मित्रों के साथ जाए तो प्रश्न। अकेली रहे तो प्रश्न। और सबसे बढ़कर—खुश रहे तो भी प्रश्न।
क्यों?क्या स्त्री की स्वतंत्रता का अर्थ तभी तक स्वीकार्य है, जब तक वह समाज की सुविधानुसार दिखाई दे?क्या उसका जीवन किसी “प्रमाण-पत्र” का मोहताज है? और आखिर यह अधिकार किसने दिया कि किसी स्त्री के वस्त्र उसके चरित्र का परिचय बन जाएँ और उसकी मुस्कान उसकी अनैतिकता की गवाही?
सच तो यह है कि आज की एकल महिला समाज के लिए इसलिए असहज है क्योंकि वह कई पूर्वनिर्धारित समीकरणों को अस्वीकार कर देती है। वह बताती है कि स्त्री की पहचान केवल पत्नी या सुहागन होने से नहीं बनती। वह माँ हो सकती है, बेटी हो सकती है, बहन हो सकती है, अधिकारी हो सकती है, मित्र हो सकती है—लेकिन इन तमाम रिश्तों के परे भी वह एक स्वतंत्र मनुष्य है। उसकी पसंद की भी एक दुनिया है। उसकी इच्छाओं की भी एक जगह है। उसकी हँसी और रोने का भी अपना कारण हो सकता है। उसके जीवन को हर बार किसी पुरुष से जोड़ना आवश्यक नहीं।
हर संवाद प्रेम नहीं होता। हर मुस्कान निमंत्रण नहीं होती। हर सजना प्रदर्शन नहीं होता। और हर अकेलापन अधूरापन नहीं होता।
शायद समाज को सबसे पहले इसी भाषा को सीखने की जरूरत है। अकेली स्त्री पर दया करने से पहले उसे सम्मान देना सीखिए। उसकी निगरानी करने से पहले उसकी निजता का अर्थ समझिए। उसके चरित्र का मूल्यांकन करने से पहले अपने दृष्टिकोण का आत्ममूल्यांकन कीजिए। क्योंकि किसी स्त्री का अकेला होना उसके जीवन में कोई रिक्त स्थान नहीं, उसकी जीवन-परिस्थिति का एक तथ्य मात्र है। रिक्तता तो उस सोच में है, जो स्त्री के व्यक्तित्व को उसके वैवाहिक स्टेटस में समेट देती है।
अब समय आ गया है कि हम इस “चौथे जेंडर” को सामाजिक व्यंग्य का विषय बनाना बंद करें और उसके पीछे छिपी मानसिकता पर प्रश्न उठाएँ। एकल महिला को समाज की अदालत में खड़ा करने के बजाय उसे उसके जीवन का अधिकार दीजिए।
क्योंकि—वह अकेली है, अपराधी नहीं। वह स्वतंत्र है, संदिग्ध नहीं। वह मुस्कुराती है, तो उसका चरित्र नहीं बदल जाता। वह सजती है, तो उसकी गरिमा कम नहीं होती। वह किसी से बात करती है, तो उसकी मर्यादा समाप्त नहीं होती।
और सबसे जरूरी—उसकी जिंदगी पर फैसला सुनाने से पहले यह याद रखिए कि आपको उसके जीवन का दर्शक होने का अधिकार हो सकता है, न्यायाधीश होने का नहीं। शायद जिस दिन समाज यह अंतर समझ लेगा,
उस दिन “एकल महिला” कोई चौथा जेंडर नहीं रहेगी— सिर्फ एक स्त्री होगी। अपने पूरे अधिकारों, अपनी पूरी गरिमा और अपने पूरे आत्मसम्मान के साथ।
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