घुमंतू-विमुक्त समाज : इतिहास, संघर्ष और सेवा के जरिए मुख्यधारा से जुड़ने की नई पहल

सदियों से देश की संस्कृति, कला, व्यापार और सामाजिक जीवन के वाहक रहे घुमंतू समुदाय आज भी पहचान, शिक्षा और सम्मान के लिए संघर्षरत हैं। लखनऊ में प्रवास के दौरान मेरी भेंट संघ के प्रचारक और घुमंतू जनजाति कल्याण परिषद के संयुक्त प्रांत प्रमुख राजेश जी से हुई बातचीत और एक पुस्तिका से मिली जानकारी के आधार पर मैंने यह लेख लिखा। 

विशेष लेख- दिलीप कुमार 

भारत की सामाजिक संरचना सदैव विविधताओं से भरी रही है। इस विविधता में घुमंतू, अर्धघुमंतू और विमुक्त समुदायों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। देश के अलग-अलग हिस्सों में घूमकर अपनी कला, कौशल, व्यापार, लोकपरंपराओं, वंशावलियों और मौखिक इतिहास को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने वाले इन समुदायों ने भारतीय संस्कृति को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके बावजूद आज इन समुदायों का एक बड़ा हिस्सा सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ेपन, अस्थिर आवास, शिक्षा के अभाव और पहचान संबंधी समस्याओं से जूझ रहा है।

इन्हीं समुदायों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े विभिन्न सेवा संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा शिक्षा, स्वास्थ्य, दस्तावेजीकरण, आवास, स्वरोजगार तथा सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में विभिन्न सेवा कार्य किए जा रहे हैं।

कौन हैं घुमंतू और विमुक्त समुदाय?

घुमंतू समुदाय वे समूह हैं जिनकी पारंपरिक जीवन-पद्धति में एक स्थान पर स्थायी रूप से रहने के बजाय आवश्यकता और आजीविका के अनुसार एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना शामिल रहा है। इनमें बंजारा, नट, भाट, सांसी, कंजर, पारधी, बावरिया, सिकलीगर, गाड़िया लुहार, कालबेलिया, नायक सहित अनेक समुदाय शामिल हैं।

इनमें से कई समुदाय परंपरागत रूप से कलाकार, लोकगायक, कथावाचक, पशुपालक, व्यापारी, शिल्पकार, लोहार, वंशावली लेखक अथवा विभिन्न प्रकार के पारंपरिक कौशल में दक्ष रहे हैं। देश के विभिन्न क्षेत्रों में इनकी उपस्थिति ने स्थानीय अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक जीवन को समृद्ध किया।

इन समुदायों के पास अनुभवजन्य ज्ञान की एक विशाल मौखिक परंपरा रही है। लोककथाओं, गीतों, वंशावलियों, लोकनाट्य, हस्तशिल्प और पारंपरिक व्यवसायों के माध्यम से इन्होंने ज्ञान और संस्कृति को पीढ़ियों तक पहुँचाया।

इतिहास के एक कठिन अध्याय की छाया

घुमंतू-विमुक्त समुदायों के इतिहास का सबसे पीड़ादायक अध्याय ब्रिटिश शासन से जुड़ा है। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अनेक घुमंतू और विमुक्त समुदायों ने स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप क्रांतिकारियों को सहयोग दिया। जंगलों और पर्वतीय क्षेत्रों की जानकारी, संदेशों का आदान-प्रदान, हथियारों की मरम्मत और आपूर्ति तथा आवश्यकता पड़ने पर प्रत्यक्ष युद्ध में भागीदारी जैसे कार्यों में कई समुदायों की भूमिका बताई जाती है।

1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश शासन ने ऐसे अनेक समुदायों को संदेह की दृष्टि से देखना शुरू किया। इसी पृष्ठभूमि में क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट, 1871 लागू किया गया, जिसके तहत अनेक समुदायों को सामूहिक रूप से ‘अपराधी जनजाति’ के रूप में चिह्नित किया गया। इस कानून ने इन समुदायों की सामाजिक छवि और उनके जीवन पर गहरा नकारात्मक प्रभाव डाला।

स्वतंत्र भारत में इस कानून को 31 अगस्त 1952 से समाप्त किया गया और इन समुदायों को ‘विमुक्त’ कहा गया। इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में 31 अगस्त को विमुक्ति दिवस के रूप में मनाया जाता है।

हालांकि, कानून समाप्त होने के बाद भी सामाजिक पूर्वाग्रह पूरी तरह समाप्त नहीं हुए। कई समुदाय आज भी पुलिस और प्रशासन के संदेह, सामाजिक भेदभाव और पहचान के संकट का सामना करते हैं।

संघर्ष और देशभक्ति की अनेक कथाएँ

घुमंतू समाजों के इतिहास में देश और समाज के लिए योगदान की अनेक परंपराएँ मिलती हैं। गाड़िया लुहारों से जुड़ी चित्तौड़ की लोकपरंपरा इसका एक उदाहरण है। लोकमान्यता के अनुसार चित्तौड़ के पतन के बाद उन्होंने प्रतिज्ञा की कि जब तक चित्तौड़ स्वतंत्र नहीं होगा, वे स्थायी घर नहीं बनाएंगे और सामान्य जीवन की कई सुविधाओं का त्याग करेंगे।

इसी प्रकार भाट समुदाय ने लंबे समय तक शासकों और विभिन्न सामाजिक वर्गों की वंशावलियों और ऐतिहासिक घटनाओं को संरक्षित करने का कार्य किया। नट और भांड लोकनाट्य एवं अभिनय की परंपराओं के वाहक रहे। बंजारा समुदाय का संबंध पारंपरिक व्यापार और परिवहन से रहा। सिकलीगरों की पहचान पारंपरिक शस्त्र निर्माण और धातु-कौशल से जुड़ी रही है।

कालबेलिया समुदाय ने अपनी लोकनृत्य परंपरा के माध्यम से राजस्थान की संस्कृति को देश-दुनिया में पहचान दिलाई। वहीं गाड़िया लुहार, नायक, पारधी और अन्य समुदायों की लोकपरंपराओं में संघर्ष, स्वाभिमान और स्वतंत्रता की कथाएँ आज भी जीवित हैं।

इन कथाओं का दस्तावेजीकरण और उनका तथ्यपरक अध्ययन आवश्यक है, ताकि इतिहास को लोकस्मृतियों, उपलब्ध अभिलेखों और प्रमाणित स्रोतों के साथ समग्र रूप में समझा जा सके।

आज की सबसे बड़ी चुनौती : पहचान

घुमंतू और विमुक्त समुदायों के सामने आज सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है—पहचान और दस्तावेजों का अभाव।

स्थायी निवास न होने के कारण अनेक परिवारों के पास आधार कार्ड, राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, जाति प्रमाण-पत्र, निवास प्रमाण-पत्र जैसे आवश्यक दस्तावेज नहीं होते। परिणामस्वरूप वे शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, सामाजिक सुरक्षा और सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ नहीं उठा पाते।

इसके अलावा कई बस्तियों में पेयजल, स्वच्छता, बिजली, सड़क और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव रहता है। बच्चों की शिक्षा भी निरंतर प्रभावित होती है, क्योंकि परिवारों के स्थान परिवर्तन के कारण उनकी पढ़ाई टूट जाती है।

कुछ समुदायों को आज भी पुलिस और प्रशासन के स्तर पर पुराने पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ता है। अतिक्रमण हटाने के अभियानों में अस्थायी बस्तियों के उजड़ने से भी इन परिवारों के सामने आवास का संकट पैदा होता है।

शिक्षा को बनाया परिवर्तन का आधार

घुमंतू समाज की स्थिति में स्थायी बदलाव के लिए शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है। इसी विचार के साथ विभिन्न सेवा संस्थाओं द्वारा बस्तियों में बाल संस्कार केंद्र, एकल शिक्षक विद्यालय, छात्रावास और शिक्षा अभियान चलाए जा रहे हैं।

राजस्थान के विभिन्न जिलों में छात्रावासों के माध्यम से बच्चों को स्थायी शिक्षा से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। श्रीडूंगरगढ़, जालोर, बाड़मेर, पाली, जयपुर, दौसा और भरतपुर जैसे क्षेत्रों में ऐसे प्रयासों का उल्लेख किया जाता है।

‘भीख नहीं, शिक्षा दो’ जैसे अभियानों का उद्देश्य भीख मांगने वाले बच्चों को विद्यालय से जोड़ना और उनके भीतर शिक्षा के प्रति रुचि पैदा करना है। इसी प्रकार ‘एक कदम शिक्षा की ओर’ जैसे अभियानों के माध्यम से बच्चों को विद्यालय भेजने वाले अभिभावकों को सम्मानित कर समाज में सकारात्मक संदेश देने का प्रयास किया जा रहा है।

सेवा से स्वावलंबन की ओर

केवल सहायता देना पर्याप्त नहीं है। घुमंतू समुदायों को स्थायी रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए उनके पारंपरिक कौशल को आधुनिक बाजार से जोड़ना भी आवश्यक है।

महिलाओं के लिए सिलाई प्रशिक्षण, हस्तशिल्प प्रशिक्षण, पारंपरिक उत्पादों की बिक्री, पुरुषों के लिए कौशल प्रशिक्षण तथा स्थानीय उत्पादों के विपणन की व्यवस्था ऐसे प्रयास हैं, जिनसे परिवारों की आय बढ़ सकती है।

महाराष्ट्र के लातूर जिले में गोपाल खेमखारी समुदाय के परिवारों के बीच किए गए प्रयासों में पक्के मकानों का निर्माण, बच्चों को विद्यालय से जोड़ना, सहकारी समूहों का गठन, महिलाओं को हस्तशिल्प प्रशिक्षण तथा पुरुषों को बैंड प्रशिक्षण जैसे कार्यों का उल्लेख मिलता है। ऐसे प्रयास इस बात का उदाहरण हैं कि शिक्षा, आवास और रोजगार को एक साथ जोड़कर सामाजिक परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।

दस्तावेजीकरण से सामाजिक अधिकार तक

घुमंतू समुदायों को सरकारी योजनाओं से जोड़ने के लिए दस्तावेज बनवाना अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है। सेवा संगठनों द्वारा बस्तियों का सर्वेक्षण, आधार एवं राशन कार्ड बनवाने, जाति प्रमाण-पत्र दिलाने और मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने जैसे कार्य किए जा रहे हैं।

दस्तावेज मिलने के बाद ही परिवारों के लिए सरकारी योजनाओं का लाभ लेना आसान होता है। आवास, गैस कनेक्शन, पेयजल, सड़क तथा अन्य मूलभूत सुविधाओं तक पहुँच भी इसी प्रक्रिया से मजबूत होती है।

स्वास्थ्य और स्वच्छता पर भी जोर

घुमंतू बस्तियों में स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुँच एक बड़ी चुनौती है। नियमित स्वास्थ्य परीक्षण, स्वच्छता अभियान और स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से इस समस्या को कम करने का प्रयास किया जा रहा है।

हर बस्ती में समय-समय पर स्वास्थ्य परीक्षण, स्वच्छता के प्रति जागरूकता और बच्चों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान जैसे कार्यक्रम सामाजिक सेवा की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

सामाजिक सम्मान भी उतना ही जरूरी

किसी भी समुदाय का विकास केवल आर्थिक संसाधनों से नहीं होता। उसके लिए सामाजिक सम्मान और समानता की भावना भी आवश्यक है।

घुमंतू और विमुक्त समुदायों को दया या उपेक्षा की दृष्टि से देखने के बजाय उनके इतिहास, कला, परंपरा और योगदान को समझने की आवश्यकता है। इनके लोकगीत, नृत्य, हस्तशिल्प, कथाएँ, वंशावलियाँ और पारंपरिक कौशल भारतीय सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं।

विद्यालयों की पाठ्यपुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सार्वजनिक आयोजनों में इनके योगदान को स्थान देने से समाज में इनके प्रति समझ और सम्मान बढ़ सकता है।

संघ से जुड़े सेवा प्रयास

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े विभिन्न सेवा प्रयासों में घुमंतू एवं विमुक्त समुदायों के बीच शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन और सामाजिक समरसता को केंद्र में रखा गया है। विभिन्न क्षेत्रों में घुमंतू जनजाति परिषद, शिक्षा प्रकल्प, सेवा समितियों और अन्य सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से अलग-अलग प्रकार के कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।

इन प्रयासों में आवासीय विद्यालय, संस्कार केंद्र, एकल शिक्षक विद्यालय, छात्रावास, स्वास्थ्य परीक्षण, सरकारी दस्तावेज बनवाना, स्वदेशी मेलों के माध्यम से पारंपरिक उत्पादों की बिक्री, महिला प्रशिक्षण केंद्र और शिक्षा अभियान प्रमुख हैं।

उपलब्ध विवरणों के अनुसार कुछ सेवा प्रयासों के माध्यम से हजारों लोगों को सरकारी दस्तावेज उपलब्ध कराने, परिवारों को आवास योजनाओं से जोड़ने तथा बच्चों को शिक्षा से जोड़ने का काम किया गया है। यमगढ़वाड़ी के आवासीय शिक्षा प्रकल्प में बड़ी संख्या में विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। इसी प्रकार विभिन्न स्थानों पर संस्कार केंद्र और छात्रावास संचालित किए जा रहे हैं।

इन दावों और उपलब्धियों का स्वतंत्र सरकारी अथवा संस्थागत दस्तावेजों के आधार पर नियमित मूल्यांकन भी आवश्यक है, ताकि सेवा कार्यों का वास्तविक प्रभाव स्पष्ट रूप से सामने आ सके।

समाज की भी जिम्मेदारी

घुमंतू-विमुक्त समाज के विकास की जिम्मेदारी केवल सरकार या किसी एक संगठन की नहीं हो सकती। समाज के प्रत्येक वर्ग को इसमें अपनी भूमिका निभानी होगी।

सबसे पहले इनके प्रति बनी पुरानी धारणाओं को बदलना होगा। इन समुदायों को संदेह या उपेक्षा की दृष्टि से देखने के बजाय समान नागरिक और समाज के महत्वपूर्ण अंग के रूप में स्वीकार करना होगा।

इनके पारंपरिक कौशल और उत्पादों के लिए बाजार उपलब्ध कराने, युवाओं को कौशल विकास योजनाओं से जोड़ने, बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करने और महिलाओं को स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में सामाजिक संगठनों, उद्योग जगत और प्रशासन को मिलकर काम करना चाहिए।

साथ ही, नशाखोरी, बाल शिक्षा से दूरी और अन्य सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध समुदाय के भीतर से जागरूकता पैदा करना भी आवश्यक है। यह कार्य सम्मान और सहभागिता के साथ होना चाहिए, न कि उपेक्षा या आरोप के साथ।

इतिहास से वर्तमान तक एक नई यात्रा

घुमंतू और विमुक्त समुदायों की कहानी केवल अभाव और पिछड़ेपन की कहानी नहीं है। यह संघर्ष, साहस, कला, परिश्रम और देश की सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखने की कहानी भी है।

इतिहास के किसी दौर में इन समुदायों को जिस कलंक का सामना करना पड़ा, उसकी छाया आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। इसलिए विमुक्ति दिवस केवल एक ऐतिहासिक घटना की स्मृति नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और सम्मान की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर भी है।

जरूरत है कि इन समुदायों को मुख्यधारा में लाने का अर्थ उनकी पारंपरिक पहचान मिटाना नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति और कौशल को सुरक्षित रखते हुए उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, रोजगार और सम्मान के समान अवसर उपलब्ध कराना हो।

‘सब समाज को साथ लेकर आगे बढ़ना है’—यदि यह भावना व्यवहार में उतरती है, तो घुमंतू-विमुक्त समाज के जीवन में स्थायी परिवर्तन संभव है।

आज आवश्यकता है कि समाज इनके इतिहास को जाने, इनके योगदान को पहचाने और वर्तमान समस्याओं के समाधान में सहभागी बने। जिन समुदायों ने पीढ़ियों तक देश की संस्कृति, कला, व्यापार और लोकज्ञान को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाया, उन्हें अब विकास की मुख्यधारा तक पहुँचाना पूरे समाज का साझा दायित्व है।

विशेष नोट- लेखक प्रेरणा भारती डिजिटल न्यूज़ नेटवर्क के मुख्य संपादक है।

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