वैश्विक मंच पर गूंजी केयी पैन्योर की स्वदेशी विकास की आवाज, विधायक टोको टटुंग ने पेश किया मिशन प्लान २०४०

ईटानगर/पारो: अरुणाचल प्रदेश के याचुली विधानसभा क्षेत्र के विधायक टोको टटुंग ने भूटान के पारो में आयोजित ग्लोबल कॉन्शियस फूड सिस्टम्स समिट २०२६ के उद्घाटन सत्र में केयी पैन्योर जिले की स्वदेशी विकास दृष्टि को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत किया। टटुंग इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेने वाले अरुणाचल प्रदेश के पहले विधायक बने।

सम्मेलन का आयोजन भूटान की शाही सरकार, कॉन्शियस फूड सिस्टम्स एलायंस और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। इसमें ६५ देशों के नेता, स्वदेशी समुदायों के प्रतिनिधि, वैज्ञानिक और विकास विशेषज्ञ शामिल हुए।

टटुंग ने उच्चस्तरीय सत्र ‘राइजिंग टू द मोमेंट: इग्नाइटिंग कॉन्शियसनेस टू एड्रेस द पॉलीक्राइसिस’ में पैनलिस्ट के रूप में भाग लिया। इस सत्र में आयरलैंड की पूर्व राष्ट्रपति और संयुक्त राष्ट्र की पूर्व मानवाधिकार उच्चायुक्त मैरी रॉबिन्सन सहित कई अंतरराष्ट्रीय हस्तियां शामिल थीं।

टटुंग ने सम्मेलन में केयी पैन्योर मिशन प्लान २०४० (केपीएमपी २०४०) को प्रस्तुत किया। यह दीर्घकालिक विकास योजना १५ अगस्त २०२६ को औपचारिक रूप से शुरू की गई थी। योजना का उद्देश्य पारंपरिक वार्षिक सरकारी योजनाओं और पांच वर्षीय राजनीतिक चक्रों से आगे बढ़कर जिले के लिए दीर्घकालिक विकास की नींव तैयार करना है।

केपीएमपी २०४० में २० प्राथमिकता वाले क्षेत्र शामिल हैं। इनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि एवं कृषि-पारिस्थितिकी, जैव विविधता, जंगल एवं जल संरक्षण, आजीविका, महिला एवं युवा सशक्तिकरण, संस्कृति, नवीकरणीय ऊर्जा, पर्यटन, बुनियादी ढांचा और स्थानीय संस्थाएं प्रमुख हैं।

निशी समुदाय से आने वाले टटुंग ने विकास के केंद्र में स्वदेशी ज्ञान को रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक ज्ञान और समुदायों के पारंपरिक अनुभव को साथ लेकर ही भविष्य का टिकाऊ विकास संभव है।

उन्होंने कहा कि वैज्ञानिकों, किसानों, विश्वविद्यालयों और बुजुर्गों के ज्ञान को एक ही मंच पर लाने की जरूरत है। उनके अनुसार, खाद्य व्यवस्था केवल भोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मिट्टी, पानी, जंगल, जैव विविधता, पोषण, आजीविका और संस्कृति से सीधे जुड़ी हुई है।

टटुंग ने जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का जिक्र करते हुए कहा कि बाढ़ जैसी आपदाएं प्रभावित समुदायों के लिए केवल वैश्विक बहस का विषय नहीं हैं, बल्कि वे खेत, घर, पशुधन, बीज और पूरे साल की मेहनत के नुकसान के रूप में सामने आती हैं।

केयी पैन्योर के विकास मॉडल में ‘बायोहैप्पीनेस’ की अवधारणा को भी प्रमुख स्थान दिया गया है, जो कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन की सोच से जुड़ी है। केयी पैन्योर को भारत का पहला ‘बायो-हैप्पी जिला’ विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ाया जा रहा है।

इस पहल के तहत एम.एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन और अन्य साझेदार जैव विविधता संरक्षण को पोषण, ग्रामीण आजीविका और मानव कल्याण से जोड़ने पर काम कर रहे हैं।

टटुंग ने कहा कि जंगल और जैव विविधता बचाने के साथ उन समुदायों की आर्थिक और सामाजिक खुशहाली भी सुनिश्चित करनी होगी, जो इन प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करते हैं।

केपीएमपी २०४० के तहत शिक्षा, कृषि और पारिस्थितिकी के क्षेत्र में विभिन्न कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। व्यापक शिक्षा कार्ययोजना (केप) के अंतर्गत सरकारी विद्यालयों के ९० प्रतिशत से अधिक शिक्षकों ने जिला स्तर पर आयोजित क्लस्टर कार्यशालाओं में भाग लिया है।

आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के साथ शुरुआती बाल शिक्षा और पोषण को लेकर भी काम किया जा रहा है।

कृषि एवं पारिस्थितिकी के क्षेत्र में केयी पैन्योर, एम.एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन और पार्टिसिपेटरी एक्शन रिसर्च कोएलिशन ऑफ इंडिया (पार्सी) के साथ मिलकर प्राकृतिक खेती, कृषि-जैव विविधता संरक्षण, पारिस्थितिक आजीविका और समुदाय आधारित विकास योजना पर काम कर रहा है।

टटुंग ने कहा कि केपीएमपी २०४० का वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होगा कि आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या छोड़ा जाता है। उन्होंने एक बुजुर्ग किसान के सवाल का उल्लेख करते हुए कहा कि विकास की योजना बनाते समय यह सोचना जरूरी है कि आने वाली पीढ़ियों को क्या विरासत मिलेगी।

उन्होंने कहा कि एक विधायक का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है, जबकि आज जन्म लेने वाला बच्चा ८० या ९० वर्ष तक जीवित रह सकता है और एक जंगल को विकसित होने में सैकड़ों वर्ष लग सकते हैं। ऐसे में विकास की सोच केवल पांच वर्ष की अवधि तक सीमित नहीं होनी चाहिए।

टटुंग ने स्पष्ट किया कि केपीएमपी २०४० किसी व्यक्ति या राजनीतिक कार्यकाल की योजना नहीं है। उन्होंने कहा, “२०४० में मैं राजनीति में रहूं या न रहूं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। केपीएमपी टोको टटुंग का नहीं हो सकता। यह केयी पैन्योर का होना चाहिए।”

उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य केयी पैन्योर को दिल्ली या सिंगापुर की छोटी प्रतिकृति बनाना नहीं, बल्कि उसकी अपनी पहचान, प्राकृतिक संसाधनों, पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय आकांक्षाओं पर आधारित सबसे बेहतर केयी पैन्योर बनाना है।

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