गुरुचरण विश्वविद्यालय में डिमासा भाषा शिक्षण एवं शिक्षाशास्त्र पर द्विदिवसीय कार्यशाला का आयोजन

स्वदेशी भाषा एवं ज्ञान-परंपरा के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में महत्वपूर्ण संस्थागत पहल

शिलचर (असम) | 13 जुलाई 2026

गुरुचरण विश्वविद्यालय, शिलचर के अंग्रेज़ी विभाग द्वारा 12–13 जुलाई 2026 को डिमासा भाषा शिक्षण एवं शिक्षाशास्त्र विषय पर द्विदिवसीय कार्यशाला का सफल आयोजन किया गया। इस कार्यशाला को नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनॉमस काउंसिल (NCHAC) का सहयोग प्राप्त था। कार्यक्रम में शिक्षाविदों, भाषा विशेषज्ञों, डिमासा समुदाय के प्रतिनिधियों, शिक्षकों एवं विद्यार्थियों ने भाग लेकर डिमासा भाषा के संरक्षण, शिक्षण-पद्धति के विकास तथा उसके संस्थागत संवर्धन पर व्यापक विचार-विमर्श किया।

भारत की प्राचीनतम स्वदेशी भाषाओं में से एक मानी जाने वाली डिमासा भाषा समृद्ध भाषाई, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विरासत की संवाहक है। कार्यशाला का उद्देश्य इस भाषा के प्रलेखन, शिक्षण तथा औपचारिक शिक्षा प्रणाली के माध्यम से इसके संरक्षण एवं संवर्धन के लिए ठोस शैक्षणिक आधार तैयार करना था।

उद्घाटन सत्र

उद्घाटन समारोह में प्रतिष्ठित शिक्षाविदों, कछार के डिमासा समुदाय के प्रतिनिधियों, विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों तथा विद्यार्थियों की गरिमामयी उपस्थिति रही।

मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. सुनील मोहंती, पूर्व सहायक प्राध्यापक, दिल्ली विश्वविद्यालय तथा वर्तमान में असम क्षेत्र प्रचार प्रमुख, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, ने स्वदेशी ज्ञान-परंपराओं के संरक्षण की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने डिमासा भाषा एवं संस्कृति की प्राचीनता, समृद्धि और उसकी सभ्यतागत महत्ता का उल्लेख करते हुए कहा कि स्वदेशी भाषाओं का संरक्षण भारत की सांस्कृतिक विविधता, पारंपरिक ज्ञान तथा सभ्यतागत निरंतरता को सुरक्षित रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री अभिजीत नाथ, शैक्षणिक कुलसचिव, गुरुचरण विश्वविद्यालय ने की।

मुख्य अतिथि श्री कुलेन्द्र दौलागुपु, मुख्य कार्यकारी सदस्य, NCHAC के सलाहकार, पूर्व कार्यकारी सदस्य, NCHAC तथा राष्ट्रीय युवा आयोग के पूर्व सदस्य ने विश्वविद्यालय की इस पहल की सराहना करते हुए स्वदेशी भाषाओं के संरक्षण हेतु परिषद् के सतत सहयोग का आश्वासन दिया।

शैक्षणिक विचार-विमर्श

कार्यशाला में कछार जिले के पचास से अधिक डिमासा विद्वानों, शोधार्थियों, माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों तथा विद्यार्थियों ने सक्रिय सहभागिता की।

शैक्षणिक सत्रों को डॉ. अमलेन्दु भट्टाचार्य, पूर्व विभागाध्यक्ष, बंगला विभाग, गुरुचरण विश्वविद्यालय तथा सुप्रसिद्ध विद्वान, और डॉ. सर्वोजीत थाओसेन, प्राचार्य, हाफलोंग सरकारी महाविद्यालय ने संबोधित किया।

विचार-विमर्श के प्रमुख विषयों में डिमासा भाषा शिक्षण की प्रभावी पद्धतियाँ, पाठ्यक्रम निर्माण, शिक्षण-सामग्री का विकास, शिक्षक प्रशिक्षण, भाषाई संसाधनों का प्रलेखन तथा औपचारिक शिक्षा व्यवस्था में स्वदेशी भाषाओं के समावेशन की रणनीतियाँ शामिल रहीं।

ऐतिहासिक उपन्यास का लोकार्पण

उद्घाटन समारोह का एक विशेष आकर्षण डॉ. वंदना थाओसेन, विभागाध्यक्ष, अंग्रेज़ी विभाग एवं कार्यशाला की संयोजिका द्वारा रचित ऐतिहासिक उपन्यास “Whispers of the Lost Heart: The Untold Story” का लोकार्पण रहा।

यह उपन्यास डिमासा साम्राज्य की समृद्ध विरासत की पृष्ठभूमि में प्रेम, साहस और संघर्ष की एक प्रेरक कथा प्रस्तुत करता है तथा डिमासा समाज की सांस्कृतिक चेतना और ऐतिहासिक धरोहर को साहित्यिक अभिव्यक्ति प्रदान करता है।

समापन सत्र

समापन समारोह का संचालन आयोजन समिति के सचिव डॉ. अर्जुन चौधरी ने किया।

समारोह में प्रो. निरंजन राय, कुलपति, गुरुचरण विश्वविद्यालय तथा श्री मुकुल बर्मन, सेवानिवृत्त स्टेशन निदेशक, आकाशवाणी, सिलचर एवं पूर्व अध्यक्ष, डिमासा साहित्य सभा, कछार उपस्थित रहे।

अपने संबोधन में प्रो. निरंजन राय ने स्वदेशी भाषाओं पर अनुसंधान को बढ़ावा देने की विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता दोहराई तथा निकट भविष्य में ‘स्वदेशी अध्ययन केंद्र’ (Indigenous Study Centre) की स्थापना की योजना की घोषणा की, जो पूर्वोत्तर भारत के स्वदेशी समुदायों पर अनुसंधान, प्रलेखन और शैक्षणिक अध्ययन का प्रमुख केंद्र होगा।

डिमासा समुदाय की ओर से डॉ. सर्वोजीत थाओसेन ने गुरुचरण विश्वविद्यालय एवं NCHAC के प्रति आभार व्यक्त करते हुए युवाओं से अपनी भाषा एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, अध्ययन और संवर्धन में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।

कार्यक्रम के समापन पर प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित किए गए तथा डॉ. अर्जुन चौधरी द्वारा धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया गया।

पहल का महत्व

यह कार्यशाला डिमासा भाषा के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक एवं संस्थागत पहल है। शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, शिक्षकों और समुदाय के प्रतिनिधियों को एक साझा मंच पर लाकर गुरुचरण विश्वविद्यालय ने भारत की भाषाई विविधता के संरक्षण तथा पूर्वोत्तर भारत की स्वदेशी ज्ञान-परंपराओं को सशक्त बनाने की अपनी प्रतिबद्धता को पुनः रेखांकित किया है।

नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनॉमस काउंसिल (NCHAC) के सहयोग से आयोजित यह पहल भविष्य में अनुसंधान, पाठ्यक्रम विकास, शैक्षणिक सहयोग तथा डिमासा भाषा के व्यापक संवर्धन के लिए एक सुदृढ़ आधार प्रदान करेगी।

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