ऑपरेशन जंतर-मंतर: तिलचट्टों का प्रदर्शन या डीप स्टेट का हाइब्रिड वॉरफेयर? डार्क फंडिंग सिंडिकेट की इनसाइड स्टोरी!

#राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर हाल ही में आयोजित तिलचट्टों के प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस द्वारा किए गए अभेद्य सुरक्षा प्रबंध और हज़ारों प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेकर दूरदराज के इलाकों में छोड़ने की प्रशासनिक कार्रवाई ने एक बार फिर उस बड़े अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र को बेनकाब कर दिया है जो भारत की संप्रभुता को चुनौती देने के लिए पर्दे के पीछे से रचा जा रहा है। 

#कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए तैनात भारी पुलिस बल, बैरिकेडिंग और एहतियाती गिरफ्तारियों के बीच आंदोलन के शीर्ष चेहरों—अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका और सौरव दास—को हवाई अड्डे पर ही हिरासत में ले लिया गया।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा और चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब दिल्ली में कानून-व्यवस्था की यह साधारण प्रशासनिक कार्रवाई अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि #जिनेवा स्थित #संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय (OHCHR) ने बिजली की फुर्ती दिखाते हुए आपातकालीन चिंता व्यक्त कर दी। 

संयुक्त राष्ट्र का यह तंत्र वास्तव में पूरी तरह वाशिंगटन के भू-राजनीतिक नियंत्रण और उसकी प्राथमिकताओं पर चलता है, जहां वही होता है जो अमेरिकी विदेश नीति और उसका डीप स्टेट तय करता है। 

जब गाजा में भीषण मानवीय संकट पैदा होता है या पाकिस्तान की सेना बलूचिस्तान में दशकों से नागरिकों का दमन करती है, तब यूएन की जबान पूरी तरह सिल जाती है; लेकिन भारत के एक गैर-अनुमति वाले प्रदर्शन पर स्थानीय पुलिस के कदम उठाते ही उसकी यह त्वरित तत्परता साबित करती है कि यह अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव पहले से तैयार (#Pre-scripted) था।

 सवाल उठता है कि आखिर भारत के एक स्थानीय पुलिसिया एक्शन पर संयुक्त राष्ट्र का सर्वोच्च मानवाधिकार मंच इतनी हड़बड़ाहट में क्यों कूद पड़ा?

इस अंतरराष्ट्रीय बेचैनी का सीधा जवाब इन आंदोलनकारियों के संदिग्ध वित्तीय प्रोफाइल में छिपा है।

 बिना किसी मजबूत औद्योगिक, व्यापारिक या #कॉर्पोरेट पृष्ठभूमि के और बेहद कम उम्र में इन नेताओं का ऐशो-आराम—देश भर में बिजनेस क्लास की लगातार हवाई यात्राएं, पंचतारा होटलों में ठहराव, लाखों के लग्जरी ब्रांडेड कपड़े, जूते, घड़ियां और महंगे आधुनिक गैजेट्स—इस बात की खुली गवाही देता है कि इस तथाकथित जन-आंदोलन के पीछे कोई स्थानीय चंदा नहीं, बल्कि अकूत विदेशी वित्तीय संसाधन झोंके जा रहे हैं। 

यही कारण था कि जैसे ही इन मोहरों पर नकेल कसी गई, वाशिंगटन से लेकर जिनेवा तक का समूचा विदेशी तंत्र अपने इस निवेश को बचाने के लिए बिलबिला उठा।

जब भारत सरकार ने एफसीआरए (#FCRA) के कड़े नियमों और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के केंद्रीय खाते की सख्त निगरानी से पारंपरिक एनजीओ माध्यमों का गला घोंट दिया, तो विदेशी सिंडिकेट ने भारत को अस्थिर करने के लिए ‘डार्क फंडिंग’ के पांच अत्यंत महीन और शातिर वित्तीय गलियारे तैयार कर लिए।

● #पहला, पश्चिमी थिंक-टैंकों और सोरोस-समर्थित संस्थाओं द्वारा इन युवा चेहरों को ‘स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय सलाहकार’ और ‘रिसर्च फेलो’ बनाकर मामूली सोशल मीडिया गतिविधि के नाम पर लाखों रुपये की ‘परामर्श फीस’ (Consulting Fees) को वैध व्यावसायिक आय के रूप में भेजा जाता है, जिससे एफसीआरए कानून तकनीकी रूप से बायपास हो जाता है। 

● #दूसरा, मोनेरो और यूएसडीटी (USDT) जैसी हार्ड-टू-ट्रेस क्रिप्टोकरेंसी और पीयर-टू-पीयर (P2P) ऑफ-मार्केट नेटवर्क के जरिए डिजिटल मुद्रा को सीधे बेनामी नकदी में बदलकर रैलियों की भीड़, पोस्टर और मंच के खर्चों में लगाया जा रहा है। 

● #तीसरा, ग्लोबल क्राउडफंडिंग गेटवेज पर ‘लोकतंत्र रक्षा’ और ‘कानूनी सहायता’ के नाम पर फर्जी बॉट्स और प्रॉक्सी डोनेशन के जरिए एकमुश्त रकम को ‘छोटे नागरिकों के चंदे’ के रूप में दिखाया जाता है।

● #चौथा और सबसे चालाक रास्ता ‘इन-काइंड’ थर्ड-पार्टी लॉजिस्टिक्स का है, जिसमें आयोजकों के खातों में सीधे एक रुपया डाले बिना दिल्ली और मुंबई की वोल्वो बसें, लग्जरी होटलों के बिल, मंच की एलईडी स्क्रीन और हवाई टिकटों का भुगतान सीधे विदेशी संस्थाओं या कॉर्पोरेट क्रेडिट कार्ड्स से सीधे वेंडरों को कर दिया जाता है, ताकि कागजों पर नेता साधारण नागरिक दिखें और मैदान में करोड़ों का तंत्र काम करता रहे।

अमेरिकी डीप स्टेट की यह बौखलाहट अनायास नहीं है, बल्कि इसके पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत द्वारा किसी भी प्रकार की अमेरिकी ब्लैकमेलिंग और कूटनीतिक दबाव के आगे झुकने से किया गया सीधा इनकार है।

 भारत ने दुनिया के सामने अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस से रियायती कच्चा तेल खरीदने का अडिग फैसला लेकर, पश्चिमी प्रतिबंधों के पाखंड की परवाह किए बिना सीना तानकर और वाशिंगटन की आंखों में आंखें डालकर अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का लोहा मनवाया है। 

इस बीच भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताओं में अमेरिका दुनिया के सामने भले ही व्यापार घाटे और टैरिफ का रोना रोता हो, लेकिन बंद कमरों में उसका असली दर्द भारत द्वारा फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (FCRA) के कड़े प्रतिबंधों को लेकर है। 

अमेरिका लगातार भारत पर दबाव बना रहा है कि इन प्रतिबंधों को हटाया जाए ताकि उसका विदेशी फंडिंग नेटवर्क भारत में बेरोकटोक बह सके। 

पश्चिमी देशों के दोहरे चरित्र का आलम यह है कि जो अमेरिका भारत को रूसी तेल पर घेरने की कोशिश करता है, वह खुद जब घरेलू महंगाई और डीजल संकट से घिरता है, तो पिछले दरवाजे से रूस से सीधे डीजल की आपूर्ति हासिल करने की राह तलाशने लगता है—जिस पर खुद यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लादिमिर जेलेंस्की तक ने कड़ी आपत्ति जताई है।

वित्तीय तंत्र और जमीनी आंदोलनों के अलावा इस हाइब्रिड वॉरफेयर का सबसे मारक हथियार मीडिया और डिजिटल स्पेस में विमर्श तैयार करना है। 

इसके लिए अमेरिकी विदेश विभाग के इंटरनेशनल विजिटर लीडरशिप प्रोग्राम (#IVLP), नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी (#NED), जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी और पश्चिमी विश्वविद्यालयों (जैसे हार्वर्ड, कोलंबिया व रॉयटर्स इंस्टीट्यूट) के जरिए एक खास विचार-प्रवाह से जुड़े मीडियाकर्मियों को ‘पत्रकारिता प्रशिक्षण’ और ‘फेलोशिप’ के नाम पर वाशिंगटन, न्यूयॉर्क और यूरोपीय राजधानियों में आमंत्रित किया जाता रहा है। 

इस तंत्र में पारंपरिक मीडिया से डिजिटल स्पेस में आए वरिष्ठ पत्रकारों—जैसे आशुतोष (सत्य हिंदी), सीमा चिश्ती (द वायर), सिद्धार्थ वरदराजन और रोहिणी सिंह—के साथ-साथ अब विशेष रूप से उन स्वतंत्र यूट्यूबर्स, पॉडकास्टर्स और इन्फ्लुएंसर्स को भी इस नेटवर्क का हिस्सा बनाया जा रहा है जिनकी पहुंच करोड़ों युवा दर्शकों तक है। 

अजीत अंजुम, पुण्य प्रसून बाजपेयी जैसे यूट्यूब पर सक्रिय डिजिटल पत्रकारों और ध्रुव राठी जैसे स्वतंत्र वीडियो क्रिएटर्स के नैरेटिव्स का विश्लेषण करने पर यह साफ दिखता है कि जब भी देश के भीतर कोई विवाद या आंदोलन (चाहे वह सीएए हो, किसान आंदोलन या अब सीजेपी का जमावड़ा) खड़ा होता है, तो इनका कंटेंट और विदेशी मानवाधिकार मंचों के बयान एक ही सुर में तालमेल बिठाते हैं।

 सतही तौर पर इन दौरों और वर्कशॉप्स को ‘प्रेस की स्वतंत्रता’ और ‘फैक्ट-चेकिंग कार्यशाला’ का आवरण दिया जाता है, लेकिन व्यवहार में यह भारतीय जनमत को प्रभावित करने वाली एक ऐसी डिजिटल ढाल तैयार करता है जो विदेशी डीप स्टेट के हितों के अनुकूल और भारत सरकार की स्वतंत्र नीतियों के प्रतिकूल एकतरफा माहौल बनाने का काम करती है।

यह समूचा ताना-बाना भारत के विरुद्ध चल रहे उस व्यापक हाइब्रिड वॉरफेयर की क्रोनोलॉजी का हिस्सा है, जिसके तहत विदेशी ताकतों ने अपने स्थानीय प्यादों के साथ मिलकर देश को अंदर से खोखला करने की लगातार कोशिशें की हैं। 

अतीत में कभी शाहीन बाग की कृत्रिम घेराबंदी, तो कभी दिल्ली की सीमाओं को महीनों बंधक बनाने वाले तथाकथित किसान आंदोलन के नाम पर अराजकता फैलाई गई। खुद राहुल गांधी की लगातार होने वाली अपारदर्शी और संदिग्ध विदेश यात्राएं हमेशा सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर रही हैं, जहां से भारत-विरोधी विदेशी थिंक-टैंकों के साथ गोपनीय बैठकों के तार जुड़ते रहे हैं। 

पूर्वोत्तर के संवेदनशील मणिपुर से लेकर कश्मीर और मुंबई तक, कभी मैथ्यू बेंडाइक जैसे एजेंटों तो कभी पूर्व अमेरिकी सैनिकों और पादरियों का धर्म प्रचारकों के चोगे में पकड़े जाना इसी अंतरराष्ट्रीय घुसपैठ की पुष्टि करता है। 

जब लोकतांत्रिक चुनावों में जनता ने इन तमाम ताकतों को पूरी तरह नकार दिया और आम राजनीति के सारे हथकंडे एक-एक कर ध्वस्त हो गए, तो अब कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के गुप्त ‘बैकअप’ और नए राजनीतिक मुखौटे के रूप में तिलचट्टों (CJP) को मैदान में झोंका गया है, ताकि देश की राजधानी में कृत्रिम असंतोष का भ्रम खड़ा किया जा सके।

भारत के नागरिकों के लिए यह अत्यंत सजग और सावधान होने की घड़ी है, क्योंकि यह जंग यहीं खत्म नहीं हुई है बल्कि आगे और भी भीषण होने वाली है।

 जब विदेशी ताकतें और उनके इशारों पर नाचने वाले स्थानीय मोहरे सीधे टकराव में मात खा जाते हैं, तो वे समाज की आंतरिक नसों को काटने की महीन साजिशें रचते हैं। 

आने वाले दिनों में सोशल मीडिया के सूक्ष्म एल्गोरिदम, फर्जी नैरेटिव्स, जातिगत वैमनस्य, क्षेत्रीय तनाव और मजहबी ध्रुवीकरण के जरिए समाज को बांटने और छोटे-छोटे राजनीतिक स्वार्थों की खातिर देश की एकता को तार-तार करने के अनगिनत प्रयास किए जाएंगे। 

भारत की 140 करोड़ जनता को ऐसे किसी भी बहकावे और झांसे में आने से बचना होगा और अपने छोटे पूर्वाग्रहों को तिलांजलि देकर देश के सशक्त, अडिग और राष्ट्रभक्त नेतृत्व के पीछे एक अभेद्य चट्टान बनकर खड़ा रहना होगा। 

भारत के स्वाभिमान, आर्थिक संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा के इस निर्णायक दौर में नागरिक सजगता और अखंड राष्ट्रीय एकता ही वह अमोघ अस्त्र है, जिससे विदेशी डीप स्टेट के इस पूरे चक्रव्यूह को हमेशा के लिए नेस्तनाबूत किया जा सकता है।

: साभार धर्मवीर जी के फेसबुक पेज से 

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