पिता — बबिता बोरा
पिता ने कभी ज़्यादा कुछ नहीं कहा। असल में, वे कभी ज़्यादा कुछ कहते ही नहीं थे। “पिता” शब्द सुनते ही याद आती है — शनिवार रात का इंतज़ार, पेट्रोल की महक, देवदार के पेड़ों की ठंडी छाया, दूब घास पर टिकी ओस की बूँदों को चीरकर आती धूप की चमक, और दस रुपये की … Read more