पिता — बबिता बोरा

पिता ने कभी ज़्यादा कुछ नहीं कहा। असल में, वे कभी ज़्यादा कुछ कहते ही नहीं थे। “पिता” शब्द सुनते ही याद आती है — शनिवार रात का इंतज़ार, पेट्रोल की महक, देवदार के पेड़ों की ठंडी छाया, दूब घास पर टिकी ओस की बूँदों को चीरकर आती धूप की चमक, और दस रुपये की … Read more

सौ रुपए में मूक संवाद..!!

सरहद पर स्थित एक कस्बे में एक व्यक्ति रोज अपने शहर के एटीएम में जाता और  मात्र ₹100 निकालकर वापस लौट आता। उसका यह सिलसिला लगभग रोज चलता रहा । उस एटीएम में तैनात गार्ड को भी आश्चर्य होता कि यह व्यक्ति रोज केवल ₹100 निकालने आता है जबकि वह चाहे तो सामान्य लोगों की … Read more

एक विरान ज़िन्दगी — डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती

 डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती सरकारी प्रथम दर्जा कॉलेज, के आर पुरा, बैंगलोर-36 शिलचर का टिकर बस्ती इलाका। बड़ी-छोटी कुछ इमारतो के बीच एक मध्यम दर्जे का घर। चारों तरफ झाड़ियों से ढका। मालूम होता है कि काफी दिनों से वहाँ की सफाई नहीं हुई है। घर घुसते ही नज़ारा कुछ इस तरह का। टूटा दरवाज़ा, सामने … Read more

लघु कथा: गलतफहमी दूर भी होती है

असम के एक छोटे से कस्बे में, दीपक नामक युवक कहीं दूर से आकर एक किराए के कमरे में रहने लगा। वह एक प्रतिष्ठित सामाजिक संगठन से जुड़ा हुआ था, और सेवा ही उसका जीवनधर्म था। अपनी सहजता, कर्मठता और निःस्वार्थ सेवा भाव से दीपक जल्द ही गांव के लोगों का प्रिय बन गया। कोई … Read more

शतरंज सी दुनिया

बड़ी मनमोहक है ये दुनिया शतरंज सी बिछी हुई, हर चाल में छुपा है सपना, हर मोड़ पर नयी कोई धुन बनी हुई। न्यारी-न्यारी ये क्यारियाँ, जैसे बादलों की चादर ओढ़े, हर कोना, हर आँगन बोले-सपनों की सरगम में जोड़े। हवाओं की इन प्रवाईयों में, संगीत की धुनें बसी, जैसे हर साँस के संग बहती, … Read more

गुरुजी ने कहा कि मां के पल्लू पर निबन्ध लिखो.., तो लिखने वाले छात्र ने क्या खूब लिखा…”पूरा पढ़ियेगा आपके दिल को छू जाएगा”* 🥰

       आदरणीय गुरुजी जी…     माँ के पल्लू का सिद्धाँत माँ को गरिमामयी  छवि प्रदान करने के लिए था.   इसके साथ ही … यह गरम बर्तन को    चूल्हा से हटाते समय गरम बर्तन को       पकड़ने के काम भी आता था.         पल्लू की बात … Read more

“जब शिखर मौन होता है…”

(नेतृत्व की महानता और विवशता- मोदी की व्यक्तित्व की विशालता के प्रति समर्पित ) जब शिखर मौन होता है, तब भी वो बोल रहा होता है, भीतर ही भीतर हर चिंता का भार वो तोल रहा होता है। जो चलता हो अग्निपथ पर, वो छाँव कहाँ माँगा करता? जिसे न मिले एक नींद की घड़ी, … Read more

“शपथ सिंदूर की”

( आदरणीय मोदी जी के दृढ़ निश्चय और कुशल नेतृत्व को समर्पित ) ०८/०५/२०२५ लाल जो रेखा है ललाट की — वह रक्त नहीं है-प्रतिज्ञा है, हर बिंदी में जलता है भारत — यह नारी की भक्ति-यज्ञा है। श्रृंगार नहीं है,शस्त्र है यह — जन-जन के विश्वास का स्वर, जहाँ प्रेम की वाणी के स्वर … Read more

तुम देखोगे, हम देख चुके हैं।

हम देख चुके हैं बर्बादी, हम देख चुके हैं बगदादी। हम देख चुके शाहीन बाग़, और टुकड़े वाली आज़ादी।। हम देख चुके हैं बामियान, हम देख चुके मज़हब गंदा। देखा है जौहर पद्मा का, देखा है जलता नालंदा।। हम देख चुके हैं खिलजी को, हम देख चुके हैं अब्दाली। हम देख चुके तैमूर लंग, हम … Read more

बदला पहलगाम का

शर्म न आईं वो दहशतगर्दों , जो तुम मारे थे धर्म पूछ- पूछ कर । क्यों मारे थे पहलगाम में उन सबको , जो आए थे काश्मीर का आंनद लेने घुम-धुम कर। क्या बिगारा था उन मासुमो ने, जिसे मारे थे तुम सब धर्म पूछ- पूछ कर । शर्म करो ये देश के गद्दारों, जो … Read more