रूह का  जायका

रवायतों की ज़ंजीरों के उस परे अदावतों की लकीरों से बिन डरे शिकायतों के मजीरों को दूर धरे जब “वो” शाम ढले, तेरे साये तले रात भर धुंए का साया बन ढलना चाहता हूँ अपनी रूह का जायका चखना चाहता हूँ बंदिशों के ताने बाने  तोड़ रंजिशों के सब  बहाने मोड़ ख्वाहिशों के हर  ठिकाने … Read more

शब्दवीणा की कर्नाटक प्रदेश समिति की मासिक काव्यगोष्ठी में समसामयिक विषयों पर पढ़ी गयीं रचनाएँ

–मैं अंधेरों में, उजाले खोजता हूँ चले आना तुम, जब आयेगा सावन नयी ऊँचाइयों पर शब्दवीणा को धरेंगे सब राष्ट्रीय साहित्यिक सह सांस्कृतिक संस्था ‘शब्दवीणा’ की कर्नाटक प्रदेश समिति ने राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. रश्मि प्रियदर्शनी की उपस्थिति में मासिक काव्य गोष्ठी आयोजित की, जिसमें आमंंत्रित रचनाकारों ने सावन, बारिश, तीज व्रत, प्रेम, देशभक्ति जैसे समसामयिक … Read more

कहानी सेहत

सेहत मोहना श्रीभूमि की रहने वाली थी वही प्रफुल सिलचर का रहने वाला था। प्रफुल के पिता का सिलचर में बहुत बड़ा घर था। वे गाड़ियों का कारोबार किया करते थे। प्रफुल ने यही के विश्वविद्यालय से एम.बी.ए की परीक्षा पास की थी। फिर कुछ साल दिल्ली में निजी कम्पनी में नौकरी करने के बाद … Read more

“सलाम तुम्हें, अंतरिक्ष यात्री!”

सलाम तुम्हें, शुभ्रांशु शुक्ला… तुम जब अंतरिक्ष की ओर बढ़े, तो तुम्हारे पीछे सिर्फ़ धरती नहीं थी— एक पूरा देश था… एक अरब धड़कनों की उम्मीदें थीं, एक सूरज था — जो अब आकाश में नहीं, तुम्हारी आँखों में चमकता है। तुमने साबित कर दिया — कि विज्ञान सिर्फ़ प्रयोगशालाओं में नहीं होता, वो सपनों … Read more

गीत

बेशक परिवर्त्तन आया है, सम्बन्धों में तनातनी है, घर-आँगन दीवार-द्वार तक, बदल गये पर प्रीति न बदली।। पहनावे अभिरुचियाँ बदलीं, अकड़न बदली नहीं किसी की। नर-नारी की चाहत बदली, धड़कन बदली नहीं किसी की।। साँस वही है आस वही है, जीवन का आभास वही है। दुनिया का विश्वास डिगा पर, प्राण प्रणय की रीति न … Read more

उधर उर्वशी व्यस्त हुई है

परिवर्तन ऐसा आया है, रहन सहन सब भव्य हो गए। भोलापन हो गया नदारद, कहने को हम सभ्य हो गए।। नर-नारी में होड़ लगी है, किससे आगे कौन रहेगा। कोई नहीं बताने वाला, अपने घर की कौन कहेगा।। परिधि पार कर चुकी लाज की, नारी की गर्दन ऊँची है। नर का नाम शिखर पर टंकित, … Read more

मुंशी प्रेमचंद जी की एक “सुंदर कविता”, जिसके एक-एक शब्द को, बार-बार “पढ़ने” को “मन करता” है-_

ख्वाहिश नहीं, मुझे मशहूर होने की,”         _आप मुझे “पहचानते” हो,_         _बस इतना ही “काफी” है।_ _अच्छे ने अच्छा और_ _बुरे ने बुरा “जाना” मुझे,_         _जिसकी जितनी “जरूरत” थी_         _उसने उतना ही “पहचाना “मुझे!_ _जिन्दगी का “फलसफा” भी_ _कितना अजीब … Read more

एक आदर्श किसान का परिवार- दीपाली सिंह

एक छोटे से शहर में एक किसान रहता था, जो बड़ा ही मेहनती, ईमानदार और प्रतापी था। वह अपने खेतों में दिन-रात मेहनत करता और पूरे समर्पण से अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। उसकी लगन और सादगी ने उसे न केवल अपने परिवार का बल्कि पूरे गांव का आदर्श बना दिया था। किसान न … Read more

हंसना मना है सच्ची घटना (अनुवाद)

एक ट्रक रात के समय शव लेकर शिलॉंग से शिलचर जा रहा था। रास्ते में ड्राइवर और हेल्पर को चाय पीने की तलब लगी। तो उन्होंने ट्रक को सड़क के किनारे रोका और दोनों पास की दुकान पर चाय पीने उतर गए। वो लोग दुकान में बैठकर चाय पी रहे थे। उधर, एक आदमी जो … Read more

बेवफाई की हनीमून डायरी — प्रियंका सौरभ

मैंने देखा था एक जोड़ा हाथों में हाथ, आँखों में स्वप्न लिए वो कहते थे – “हमसफ़र” पर शायद किसी एक के लिए ये सफर सिर्फ “अंत” था. मेघालय की वादियों में जहाँ झीलें चुपचाप सब सुनती हैं, वहीं गूंजा था एक मौन चीत्कार एक प्रेमी पति, जो पत्नी के हृदय में नहीं, उसके षड्यंत्र … Read more