दहलीज़ तक आया एक मेहमान

दहलीज़ तक आया एक मेहमान जो चला जाता है, वह चला जाता है— पर जो आदतों में जकड़ा रह जाता है, वही जानता है आदतों को छोड़ने की आदत की पीड़ा। कभी-कभी अधूरे मिलन में ही जीवन की प्राप्ति छिपी होती है। कभी-कभी रिश्तों का नाम न होना ही भविष्य को शांत बना देता है। … Read more

तिरंगा पूछता है!

तिरंगा पूछता है! यह तिरंगा जब लहराता है, तो सिर्फ़ हवा से नहीं लहराता— यह लहू से उठी हुंकार है, जो हर नागरिक से पूछ जाता— बताओ! क्या अब भी देश तुम्हारी आदत है, या सिर्फ़ अवसर की सियासत है? शहीदों ने माँ से वादा तोड़ा, पर वतन से कभी नहीं डोले, हँसते-हँसते प्राण चढ़ा … Read more

हमें शांति चाहिए

हमें शांति चाहिए मै एक रात बड़ा हैरान हुआ सोच – सोच कर बड़ा परेशान हुआ आज मानव, मानव को काट मारने को तैयार है अपने स्वार्थ हेतु मानव के गर्दन पर खींच रखी तलवार है इंसानियत – मानवता बस बेबस लाचार है जिनके पास यश, शक्ति है वे स्वयं मे चूर है अपने शक्ति … Read more

आत्मकथा

आत्मकथा मैं हूँ स्वयं अपनी कहानी, मेरी ही लिखी जिंदगानी। जो कुछ भी हूँ, जैसी भी हूँ, मैं अपनी ही पहचान हूँ। मेरे हर पन्ने में बसा है दर्द भी, खुशियाँ, संघर्ष अपार। अनुभवों की स्याही से लिखी, जीवन की सच्ची दरकार। मेरे शब्दों में मेरी आत्मा, हर भावना की गहरी छाया। जो जिया, जो … Read more

अश्व  प्रत्याशा के रथ पर

अश्व  प्रत्याशा के रथ पर , झंकृत है , अलंकृत है,, स्रोत जिसका संस्कृत है अन्वेषित है ,अभिप्रेषित है ज्योत जिसकी परिष्कृत है हिंदी ! , अश्व  प्रत्याशा के रथ पर , विश्व भाषा के पथ पर उन्नत है, प्रेरित है, सृजन जिसकी विस्तृत है। गूँजित है, प्रवाहित है, अक्षरों में उज्ज्वलित है। हिंदी ! … Read more

वनवासियों के हितैषी राजा विजयभूषण सिंहदेव

11 जनवरी/जन्म-दिवस वनवासियों के हितैषी राजा विजयभूषण सिंहदेव भारत में सैकड़ों साल से ईसाई मिशनरियां काम कर रही हैं। वे सेवा के जाल में फंसा कर भोले-भाले वनवासियों को ईसाई बनाती हैं। यह धर्मान्तरण कभी-कभी राष्ट्रान्तरण जैसी बीमारी भी बन जाता है। वे उन्हें आदिवासी कहकर भारत और शेष हिन्दू समाज से काट देते हैं। … Read more

बाबा

बाबा — — — — — — — — बाबा बहुत ज़्यादा बातें नहीं करते थे। बाबा बहुत कम ही बोलते थे। बाबा मतलब शनिवार रात का इंतज़ार, पेट्रोल के धुएँ की गंध, देवदार के पेड़ों की शालीनता, दूर्वा घास पर टिकी ओस की बूँदों को चीरकर आती धूप के मोती, या दस रुपये की … Read more

हास्य व्यंग्य        नेता जी का गृहप्रवेश

       नेता जी का गृहप्रवेश गाँव मे सेठ जी बनाए भव्य महल भव्यता देख लोग कहने लगे शीशमहल॥ सेठ जी शुभ मुहूर्त देख रखा महल का गृहप्रवेश उस दिन वैदिक मंत्रोच्चारण से गुंजयमान हुआ परिवेश॥ सेठ जी के द्वार पर लगा आम-खास लोगों का तांता निमंत्रण पाकर अपने अनुज संग पहुंचे नेता॥ अनुज … Read more

शब्दवीणा सृजन त्रिविधा में बिहार, मध्य प्रदेश, एवं हरियाणा के रचनाकारों ने किया काव्य पाठ

 कर्नल गोपाल अश्क, कुमार कांत एवं सुशीला यादव ने पढ़ीं एक से बढ़कर एक रचनाएँ गया जी। राष्ट्रीय साहित्यिक सह सांस्कृतिक संस्था ‘शब्दवीणा’ द्वारा आयोजित “शब्दवीणा सृजन त्रिविधा” के गत अंक में गया जी से कवि कुमार कांत, इंदौर, मध्य प्रदेश से कवि कर्नल गोपाल अश्क एवं गुरुग्राम, हरियाणा से कवयित्री सुशीला यादव ने बतौर … Read more

एक बेल के सारे तुंबे खारे ( व्यंग्य)

वैसे तो तुंबे खारे ही होते हैं क्योंकि तुंबे की बेल ही ऐसी होती है कि उससे उगने वाले सारे ही तुंबे खारे होगें फिर यह कहावत क्यों बनी? क्यों व्यंगात्मक अंदाज मे कहा जाता है जबकि सभी जानते हैं कि विष वृक्ष की उपज क्या होगी।    ईमली सैतान  पृवृति की इसलिए थी कि … Read more