सोरठी बृजभार की प्रेम कहानी

सोरठी, सोरठपुर के राजा उदयभान सिंह की बेटी थी। उसकी माता का नाम कमलावति था। जब सोरठी का जन्म हुआ, तब पुरोहित को उसके नामकरण के लिए बुलाया गया। पुरोहित सोरठी की कुंडली और हस्तरेखा देखकर आश्चर्यचकित रह गया। सोरठी बुद्धि-विवेक और सद्गुणों की खान होगी, ऐसी कुंडली देखकर पुरोहित कुंठित हो गया। उसने कुटितला … Read more

महाकुंभ स्नान

मां,कुंभ नहाने चलोगी? काफी दिन से कह रही थीं कि मुझे गंगा नहला ला. इस बार तुम्हें नहला लाता हूं. आज ट्रेन का टिकट करा लिया है.’’ यह सुन कर गोमती चहक उठीं, ‘‘तू सच कह रहा है श्रवण, मुझे यकीन नहीं हो रहा.’’ ‘‘यकीन करो मां, ये देखो टिकटें,’’ श्रवण ने जेब से टिकटें … Read more

देहदान – अदीमा मजुमदार 

अगर मौत के बाद भी हसीन दुनिया देखनी हो, तो वक़्त रहते अपने ज़मीर की सदा पर रहम दिली से आँखें दान कर दो। और अगर कहते हो कि इंसानियत की ख़िदमत करोगे, अँध विश्वास मिटाकर इल्म और तर्क़ का दामन थामोगे, तो फिर नाम, ज़ात, मज़हब और बिरादरी से ऊपर उठो— तरक्की की राह … Read more

बसंत पंचमी- सुनील महला

प्रकृति का यौवन वसंत है । ऋतुओं का राजा वसंत है ।। खिल रही है धूप, खिल रही कोंपलें नई। वसंती हवाएं हैं, हरितिमा है छाई।। फिज़ाओं में रंग घुले हैं। दिलों से दिल आज मिले हैं।। रंग-बिरंगे फूल खिले,सरसों, राई और गेहूँ खेत लहलहा रहे हैं। देखो पंछी मधुर गान में चहचहा रहे हैं। … Read more

आया बसंत

प्रकृति का यौवन वसंत है । ऋतुओं का राजा वसंत है ।। खिल रही है धूप, खिल रही कोंपलें नई। वसंती हवाएं हैं, हरितिमा है छाई।। फिज़ाओं में रंग घुले हैं। दिलों से दिल आज मिले हैं।। रंग-बिरंगे फूल खिले,सरसों, राई और गेहूँ खेत लहलहा रहे हैं। देखो पंछी मधुर गान में चहचहा रहे हैं। … Read more

जीवन का आस्तित्व 

मैं एक पेड़ हूँ, खड़ा हूँ जमीं पर, मेरी जड़ें गहरी हैं, मेरी शाखाएँ ऊंची हैं। मैंने देखे हैं ऋतुओं के बदलाव, मैंने महसूस किया है जीवन की गति। मेरी पत्तियाँ हरी हैं, मेरे फूल खिले हैं, मेरी शाखाएँ झूमती हैं, मेरी जड़ें मजबूत हैं। मैं एक पेड़ हूँ, खड़ा हूँ जमीं पर, मैं जीवन … Read more

पेड़ों की शाखाएं

कितनी विश्वस्त होती हैं, पेड़ों की शाखाएं कितने घर, कितने परिवार अपनी डालियों पर बसने देती है। कितने नन्हे परिंदे जीते है इनपर कभी जो शत्रु आता है तो छुपा लेती है, नन्हे परिंदों को। बचा लेती है, इनको शत्रु पाश के बंधन से। कितनी मजबूत होती हैं, पेड़ों की शाखाएं अनगिनत झूलती है झूले … Read more

तिरंगा लहराए जा (कविता)

  आया गणतंत्र दिवस प्यारा, कुंकुम-केसर बरसाए नया सवेरा। लहर-लहर लहराये तिरंगा प्यारा, खिलखिलाया है हर चेहरा।। सुरभित हैं सुमन आज सारे, खग प्यारे हैं चहक रहे। विश्व पटल पर, भारत की हमेशा ही महक रहे।। गौरव से हर माथे ऊंचे, मेहनत के बल हम इस धरा को सींचे। फहराए तिरंगा प्यारा, गायें गीत विजय … Read more

अपनों के बिना

जो कह दिया वह *शब्द* थे ; जो नहीं कह सके वो *अनुभूति* थी ।। और, जो कहना है मगर ; कह नहीं सकते, वो *मर्यादा* है ।। *जिंदगी* का क्या है ? आ कर *नहाया*, और, *नहाकर* चल दिए ।। *बात पर गौर करना*- —- *पत्तों* सी होती है कई *रिश्तों की उम्र*, आज … Read more

और एक बार बेवकूफ बन गए

एक लड़की हूँ, मस्त मगन रहती थी फूटी प्यार के प्याले को देखकर और एक बार बेवकूफ बन गए क्या गलती है मेरी? हर किसी पे भरोसा करना, मेरे प्यार के तरस को छल बना दिया गया। तबस्सुम को छिनकर आंसुओं लाया गया। मेरी हर वादे को भरें महफ़िल में ज़ालिम किया गया। मैं एक नादान सी लड़की हूँ, मस्त गगन … Read more