अरुणाचल की धरती से जन्मी एक लिपि की अद्भुत गाथा। — समराज चौहान

कभी-कभी एक व्यक्ति का छोटा-सा संकल्प पूरे समाज की पहचान बन जाता है। यही कहानी है अरुणाचल प्रदेश के बनवांग लोसु की, जिन्होंने यह सिद्ध कर दिखाया कि लिपि बनाना सिर्फ अक्षरों का आकार तय करना नहीं होता, बल्कि वह एक समुदाय की आवाज़, अस्मिता और आत्मसम्मान का पुनर्जन्म होता है।अरुणाचल प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर … Read more

मरने-मारने की हिंसा मे निपट गया माओवाद ? जीवंत लोकतंत्र में बन्दूक की क्रांति होगी नहीं, 125 से तीन जिलों में सिमट गया माओवाद — आचार्य श्रीहरि

माओवाद एक विदेशी विचारधारा है। माओवाद की आधारशिला माओत्से तुंग एक चीनी तानाशाह था। उसे चीन की अराजक और लूटरी शक्ति पर गर्व था। वह अपने पडोसी देशों भारत, वियतनाम, भूटान, नेपाल ही नहीं बल्कि जापान, फिलिपींस और कबोडिया जैसे देशों को  भी कीडे-मौकेडे की तरह देखता और समझना था, अपनी सैनिक शक्ति के बल … Read more

बदलती दीवाली: दीप नहीं, प्रदर्शन की झिलमिल — सुनील कुमार महला

हमारा देश भारत त्योहारों का देश है, जहां हर पर्व केवल उत्सव ही नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन भी होता है। दीपावली(दीपो की आवलि यानी कि दीप-पंक्ति) उन्हीं में सबसे प्रमुख, बड़ा और पवित्र त्योहार है‌।संस्कृत में दीपावली का अर्थ होता है-‘दीपानाम् आवली’ अर्थात् दीपों की पंक्ति या दीपों की श्रेणी।संक्षेप में कहा जाए तो … Read more

“अन्नकूट : अन्नदान की परंपरा, राम-राम : आत्मीयता का संदेश”– सुनील कुमार महला

हर वर्ष दीपावली आती है, उजियारा लाती है। दीपकों की रौशनी हर दिल में नई उम्मीद जगाती है।जित देखो तित दीपों की पंक्तियां सजतीं हैं।इन दीपों की सुंदर आवलियां हर तरफ हवाओं में स्नेह, खुशियां, उल्लास, उमंग बिखेरती हैं। धन, वैभव, मिठास का उत्सव बन जाती है, पर सबसे बड़ा उपहार ‘राम-राम’ कहलाती है। ‘राम-राम’ … Read more

प्रतिष्ठित साहित्यकार मिथिलेश भट्टाचार्य एक संस्मरण — मीता दास पुरकायस्थ

“मृत्यु कोई अंत नहीं, वह केवल जीवन के दूसरे सुर में प्रवेश है।” — रवींद्रनाथ ठाकुर अचानक जैसे आकाश का सीना फट गया और उसने एक नक्षत्र को अपने में समा लिया — 20 अक्टूबर 2025 की रात। आकाश और उज्जवल हो उठा, पर शिलचर की एक प्रकाशमयी किरण चुपचाप बुझ गई — चले गए … Read more

संघ पर प्रश्न करने वाले, उत्तर चाहते ही नहीं- महेश भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर कुछ लोगों के जो प्रश्न और शंकाएँ हैं, वे आज या कल की नहीं हैं — वे स्वाधीनता-काल से ही चली आ रही हैं। जो केवल प्रश्न पूछकर भाग जाते हैं, उन्हें उत्तर कैसे मिले? इसलिए वे प्रश्न बार-बार दोहराए जाते हैं और अब वे परंपरागत प्रश्न बन चुके हैं। … Read more

दीपावली : प्रकाश का पर्व और आत्मज्योति का उत्सव —  डा. रणजीत कुमार तिवारी

दीपज्योतिः परब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः। दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ शुभं करोति कल्याणमारोग्यं धनसंपदा। शत्रुबुद्धि-विनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते। दीपक की लौ को ईश्वर का स्वरूप माना गया है, जो अज्ञान और अधर्म के अंधकार को मिटाती है। जब हम दीप जलाते हैं, तो वह केवल बाहरी रोशनी नहीं देता, बल्कि हमारे भीतर के पाप, अंधकार और नकारात्मक विचारों को … Read more

संजय उवाच: रामबहादुर राय होने का अर्थ समझाती एक किताब

‘दिल्ली’ में ‘भारत’ को जीने वाला बौद्धिक योद्धा! —प्रोफेसर संजय द्विवेदी    कभी जनांदोलनों से जुड़े रहे, पदम भूषण और पद्मश्री सम्मानों से अलंकृत श्री रामबहादुर राय का समूचा जीवन रचना, सृजन और संघर्ष की यात्रा है। उनकी लंबी जीवन यात्रा में सबसे ज्यादा समय उन्होंने पत्रकार के रूप में गुजारा है। इसलिए वे संगठनकर्ता, … Read more

इस बार जलाएं एक दिया उम्मीदों का..!! — संजीव शर्मा 

मोबाइल फोन में घुसकर ऑनलाइन लाइटिंग,सजावट का सामान और कपड़े तलाशने में समय बर्बाद करने की बजाए एक बार सपरिवार घर से बाहर निकलिए और सड़क पर दिए बेचती बूढ़ी अम्मा की आंखों में पलती उम्मीदों की रोशनी देखिए या फिर रंगोली के रंग फैलाए उस नहीं सी बालिका के चेहरे पर चढ़ते उतरते रंग … Read more

समय निकल कर एकबार पढ़ियेगा — ज़ुबीन गर्ग : एक योद्धा, एक फ़रिश्ता

कहते हैं कि किसी के जाने का एहसास उसके चले जाने के बाद ही होता है। मैं कभी जुबीन दा से मिली नहीं थी, उनके जाने की उस दुखद घटना ने जहाँ पूरे विश्वभर को हिला कर रख दिया था, वहीं मेरे मन में भी उनसे नहीं मिल पाने का एक मलाल रह गया। लगभग … Read more