गुरुपूर्णिमा : सद्गुरु-तत्त्व, आत्मजागरण एवं भारतीय ज्ञान-परम्परा का सनातन महापर्व

– डॉ. अभिषेक कुमार उपाध्याय

भारतवर्ष की सनातन संस्कृति केवल विविध पर्वों, उत्सवों और अनुष्ठानों की परम्परा नहीं है, अपितु वह मानव-जीवन को लौकिकता से अलौकिकता, सीमितता से अनन्तता तथा अज्ञान से ब्रह्मज्ञान की ओर अग्रसर करने वाली दिव्य जीवन-पद्धति है। यहाँ प्रत्येक पर्व केवल कालगणना का सूचक नहीं, अपितु आत्मपरिष्कार, सांस्कृतिक जागरण और आध्यात्मिक उत्कर्ष का महोत्सव है। इन्हीं दिव्य पर्वों में आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा, जिसे गुरुपूर्णिमा अथवा व्यासपूर्णिमा कहा जाता है, भारतीय ऋषि-परम्परा, गुरु-शिष्य संस्कृति और ब्रह्मविद्या के प्रति कृतज्ञता का सर्वोच्च पर्व है।

भारतीय मनीषा ने गुरु को केवल ज्ञानदाता अथवा शिक्षणकर्ता नहीं माना, अपितु उन्हें जीवन के परम मार्गदर्शक, आत्मबोध के प्रेरक और परमात्मा तक पहुँचाने वाले दिव्य सेतु के रूप में प्रतिष्ठित किया है। माता-पिता मनुष्य को शरीर प्रदान करते हैं, समाज व्यवहार सिखाता है, किन्तु सद्गुरु जीव को उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराते हैं। इसीलिए उपनिषदों ने उद्घोष किया—

*तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्*

*समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्॥*

*(मुण्डकोपनिषद्)*

अर्थात् ब्रह्मविद्या की प्राप्ति के लिए ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु का आश्रय अनिवार्य है। गुरु के बिना ज्ञान केवल सूचना बनकर रह जाता है, किन्तु गुरु की कृपा से वही ज्ञान आत्मानुभूति में रूपान्तरित हो जाता है।

‘गुरु’ शब्द स्वयं अपने भीतर सम्पूर्ण दर्शन समेटे हुए है। गुरुगीता में कहा गया है—

*गुकारस्त्वन्धकारः स्यात् रुकारस्तन्निरोधकः।*

*अन्धकारनिरोधित्वात् गुरुरित्यभिधीयते॥*

अर्थात् ‘गु’ अज्ञानरूपी अन्धकार तथा ‘रु’ उस अन्धकार के निवारण का द्योतक है। जो जीव के अन्तःकरण से अविद्या, अहंकार, संशय और मोह का नाश कर ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न करे, वही वास्तविक गुरु है। इसलिए गुरु का महत्त्व किसी व्यक्ति-विशेष की पूजा में नहीं, बल्कि उस दिव्य चेतना में है जो शिष्य के जीवन को रूपान्तरित कर देती है।

भारतीय संस्कृति में गुरु और शिष्य का सम्बन्ध जन्म-जन्मान्तर का आध्यात्मिक सम्बन्ध माना गया है। यह सम्बन्ध केवल बौद्धिक नहीं, अपितु आत्मिक है। गुरु शिष्य को अपने समान बनाने का प्रयत्न करते हैं, उसे अपने ज्ञान, तप, साधना और अनुभव का अधिकारी बनाते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को केवल युद्ध की नीति नहीं सिखाई, बल्कि उसके मोह का निवारण कर उसे धर्म, कर्म और आत्मस्वरूप का बोध कराया। इसलिए भगवद्गीता का अमर उपदेश आज भी गुरु-शिष्य सम्बन्ध का सर्वोच्च आदर्श है—

*तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।*

*उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥ (भगवद्गीता ४.३४)*

ज्ञान की प्राप्ति विनय, सेवा और श्रद्धा से होती है; अहंकार से नहीं। यही गुरु-परम्परा का शाश्वत संदेश है।

आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को व्यासपूर्णिमा भी कहा जाता है, क्योंकि इसी दिन भगवान वेदव्यास का अवतरण हुआ माना जाता है। यदि भारतीय ज्ञान-परम्परा को सुव्यवस्थित स्वरूप प्राप्त हुआ है, तो उसका श्रेय महर्षि वेदव्यास को ही है। उन्होंने वेदों का विभाजन, महाभारत की रचना, अठारह महापुराणों का संकलन तथा ब्रह्मसूत्र की रचना कर ज्ञान की ऐसी अक्षय निधि मानवता को प्रदान की, जिसका कोई समकक्ष विश्व में दुर्लभ है।

नमोस्तु ते व्यास विशालबुद्धे फुल्लारविन्दायतपत्रनेत्र।

येन त्वया भारततैलपूर्णः प्रज्वालितो ज्ञानमयः प्रदीपः॥

वेदव्यास का जीवन इस सत्य का उद्घोष करता है कि ज्ञान का संरक्षण ही संस्कृति का संरक्षण है। गुरुपूर्णिमा वस्तुतः उसी अखण्ड ऋषि-परम्परा के प्रति श्रद्धांजलि है, जिसने भारत को ‘विश्वगुरु’ के पद पर प्रतिष्ठित किया।

भारतीय दर्शन की एक विलक्षण विशेषता यह है कि उसने धर्म और विज्ञान को कभी परस्पर विरोधी नहीं माना। यहाँ पर्वों की तिथियाँ भी प्रकृति, ऋतुचक्र और खगोलीय व्यवस्था के अनुरूप निर्धारित की गई हैं। गुरुपूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरम्भ में आती है, जब सम्पूर्ण प्रकृति नवजीवन से स्पन्दित होती है। भारतीय परम्परा में इसी काल से चातुर्मास का शुभारम्भ होता है, जिसमें साधु-संत स्थिर होकर स्वाध्याय, जप, तप, ध्यान और लोकशिक्षण का कार्य करते हैं। यह व्यवस्था केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक, पर्यावरणीय एवं स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अत्यन्त वैज्ञानिक है।

*ऋग्वेद का उद्घोष—*

चन्द्रमा मनसो जातः…

मानव-मन और प्रकृति के सूक्ष्म सम्बन्ध का संकेत करता है। आधुनिक विज्ञान भी स्वीकार करता है कि प्रकृति की लय का प्रभाव जैविक जीवन पर पड़ता है। भारतीय ऋषियों ने इस सत्य को साधना के साथ जोड़ा और मनुष्य को बाह्य प्रकृति के साथ-साथ अपने अन्तर्मन को भी संतुलित रखने की प्रेरणा दी।

योगदर्शन का प्रथम सूत्र-

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः॥

केवल ध्यान का सिद्धान्त नहीं, बल्कि सम्पूर्ण गुरुपूर्णिमा का आध्यात्मिक संदेश है। गुरु का कार्य शिष्य के चित्त को विक्षेपों से मुक्त कर उसे आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित करना है।

भारतीय गुरु-परम्परा केवल व्यक्ति-निर्माण तक सीमित नहीं रही; उसने परिवार, समाज, राष्ट्र और सम्पूर्ण मानवता को दिशा प्रदान की। महर्षि वशिष्ठ से लेकर चाणक्य, समर्थ रामदास, आदि शंकराचार्य, स्वामी विवेकानन्द तथा आधुनिक संत-मनीषियों तक यह परम्परा निरन्तर राष्ट्र की आत्मा को जागृत करती रही है। भारत की वास्तविक शक्ति उसकी सेना, राजनीति अथवा अर्थव्यवस्था से पहले उसके गुरुओं की तपःपूत चेतना में निहित रही है। 

भारत की गुरु-परम्परा का वैशिष्ट्य केवल शास्त्रज्ञान तक सीमित नहीं है; उसका मूल उद्देश्य मनुष्य को मनुष्यता, मनुष्यता को देवत्व और देवत्व को ब्रह्मत्व तक प्रतिष्ठित करना है। इसीलिए हमारे यहाँ गुरु को किसी सम्प्रदाय विशेष का प्रतिनिधि नहीं, अपितु धर्म, ज्ञान, करुणा, तप, त्याग और लोकमंगल की सजीव अभिव्यक्ति माना गया है। गुरु अपने शिष्य को केवल शिक्षित नहीं करते, बल्कि संस्कारित करते हैं; केवल योग्य नहीं बनाते, बल्कि उत्तरदायी भी बनाते हैं; केवल बुद्धि का विकास नहीं करते, अपितु अन्तःकरण का परिष्कार भी करते हैं।

उपनिषदों की यह वाणी गुरु-शिष्य सम्बन्ध का सर्वोच्च आदर्श प्रस्तुत करती है—

*यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ।*

*तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥*

अर्थात् जिस साधक की परमात्मा के प्रति जैसी श्रद्धा है, वैसी ही श्रद्धा गुरु के प्रति भी है, उसी के लिए शास्त्रों के गूढ़तम रहस्य उद्घाटित होते हैं। श्रद्धा ही ज्ञान का द्वार है और विनय उसकी प्रथम सीढ़ी।

आज का युग अभूतपूर्व वैज्ञानिक प्रगति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, तीव्र सूचना-प्रवाह और तकनीकी विकास का युग है; किन्तु इसके साथ-साथ मानसिक अशान्ति, नैतिक भ्रम, पारिवारिक विघटन, सामाजिक असंतुलन तथा मूल्य-संकट भी गहराता जा रहा है। ज्ञान का विस्तार हुआ है, परन्तु विवेक का विकास उसी अनुपात में नहीं हुआ। सूचना (Information) ने बुद्धि को तीक्ष्ण बनाया है, किन्तु गुरु ही बुद्धि को प्रज्ञा में रूपान्तरित करते हैं। यही कारण है कि आधुनिक युग में सद्गुरु की आवश्यकता पहले से अधिक अनुभव की जा रही है।

भगवद्गीता का यह दिव्य वचन आज भी उतना ही प्रासंगिक है—

*श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।*

*ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥*

श्रद्धा, संयम और साधना—ये तीनों सद्गुरु की कृपा से ही पुष्ट होते हैं। गुरु मनुष्य को बाह्य उपलब्धियों के साथ-साथ आन्तरिक संतुलन का भी बोध कराते हैं। वे बताते हैं कि सफलता का वास्तविक मूल्य तभी है जब वह सत्य, सेवा, करुणा और धर्म से संयुक्त हो।

भारतीय गुरु-परम्परा का एक अन्य अद्भुत आयाम यह है कि वह वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को आत्मसात् करती है। गुरु का हृदय किसी जाति, भाषा, प्रदेश या सम्प्रदाय की सीमाओं में आबद्ध नहीं होता; वह समस्त सृष्टि को एक परिवार के रूप में देखता है। इसीलिए हमारे ऋषियों ने उद्घोष किया—

*अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।*

*उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥*

गुरु का जीवन इसी उदारता का प्रत्यक्ष उदाहरण होता है। उनका तप व्यक्तिगत नहीं, लोकमंगल के लिए होता है; उनका ज्ञान आत्मप्रदर्शन के लिए नहीं, समाज-निर्माण के लिए होता है।

यदि भारत ने विश्व को वेद, उपनिषद्, योग, आयुर्वेद, दर्शन, गणित, ज्योतिष, संगीत, अध्यात्म और जीवन-दर्शन प्रदान किया, तो उसके मूल में गुरु-शिष्य परम्परा की अविरल धारा ही प्रवाहित रही है। यही परम्परा वशिष्ठ, विश्वामित्र, याज्ञवल्क्य, वेदव्यास, पतञ्जलि, शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, चाणक्य, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द और असंख्य ऋषि-महापुरुषों के माध्यम से युगों से मानवता का मार्ग आलोकित करती रही है।

गुरुपूर्णिमा हमें केवल गुरु का पूजन करना नहीं सिखाती, अपितु यह आत्मपरीक्षण का भी दिवस है। यह अवसर है स्वयं से प्रश्न करने का—

* क्या हमारे जीवन में विनय बढ़ा है?

* क्या हमारे व्यवहार में सत्य, करुणा और सेवा का विस्तार हुआ है?

* क्या हम गुरु के उपदेशों को अपने आचरण में उतार सके हैं?

* क्या हमारा ज्ञान समाज और राष्ट्र के लिए उपयोगी बन रहा है?

यदि इन प्रश्नों के उत्तर सकारात्मक हैं, तभी गुरुपूर्णिमा का उत्सव सार्थक है। अन्यथा पूजा केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है।

संत तुलसीदास ने गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए कहा— *बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।*

*महामोह तम पुंज जासु बचन रविकर निकर॥*

गुरु नररूप में ईश्वर की करुणा हैं। उनके वचन अज्ञानरूपी अन्धकार को सूर्यकिरणों की भाँति दूर कर देते हैं। यही गुरुतत्त्व का परम रहस्य है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि गुरुपूर्णिमा केवल एक धार्मिक आयोजन न रह जाए, बल्कि वह आत्मसंस्कार, चरित्र-निर्माण, राष्ट्र-जागरण और मानव-कल्याण का लोकमंगल पर्व बने। जब प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में किसी सद्गुरु के आदर्शों को धारण करेगा, तभी परिवार संस्कारित होंगे, समाज समरस होगा, राष्ट्र सशक्त बनेगा और विश्व में शान्ति एवं सद्भाव की स्थापना सम्भव होगी।

अन्ततः गुरुपूर्णिमा हमें यह स्मरण कराती है कि जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि धन, पद, यश या सत्ता नहीं, अपितु सद्गुरु की कृपा, आत्मज्ञान की ज्योति, शुद्ध चरित्र और लोकमंगल के प्रति समर्पित जीवन है। गुरु वह दीप हैं जो स्वयं जलकर असंख्य जीवनों को आलोकित करते हैं; वे वह सेतु हैं जो जीव को शिव से, सीमित को असीम से और मनुष्य को उसके परम स्वरूप से जोड़ देते हैं।

आइए, इस पावन गुरुपूर्णिमा पर हम केवल गुरु के चरणों में पुष्प ही अर्पित न करें, अपितु अपने अहंकार, आलस्य, अज्ञान और अविवेक का भी समर्पण करें। सत्य को जीवन का आधार, सेवा को साधना, करुणा को स्वभाव, ज्ञान को आचरण और धर्म को कर्तव्य बनाकर गुरु-परम्परा के गौरव को अक्षुण्ण रखने का संकल्प लें। यही गुरुपूर्णिमा की वास्तविक साधना, सच्ची गुरुदक्षिणा और सनातन संस्कृति के प्रति हमारी विनम्र श्रद्धांजलि होगी।

तमसो मा ज्योतिर्गमय।

लेखक-  डॉ. अभिषेक कुमार उपाध्याय मुख्य न्यासी श्री श्री 1008 श्री मौनी बाबा चैरिटेबल ट्रस्ट न्यास व गुरुकुल एवं मन्दिर सेवा योजना प्रमुख जम्मू कश्मीर प्रान्त।

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