मथुरा/वृंदावन। ब्रज की पावन भूमि वृंदावन स्थित लगभग 90 वर्ष पुरानी हासानन्द गौशाला आज भी भारतीय गौ-परंपरा, आयुर्वेदिक जीवनशैली और शुद्ध खाद्य संस्कृति को जीवंत बनाए हुए है। गौशाला परिसर में संचालित ‘मधुरामृत घी उत्पादन केंद्र’ में देसी गाय के A2 दूध से पारंपरिक देसी बिलोना पद्धति द्वारा शत-प्रतिशत शुद्ध एवं प्राकृतिक घी तैयार किया जाता है। यहां आधुनिक तकनीक का उपयोग केवल गुणवत्ता बनाए रखने और स्वच्छ पैकेजिंग के लिए किया जाता है, जबकि घी निर्माण की मूल प्रक्रिया आज भी भारतीय परंपरा के अनुरूप अपनाई जाती है।
प्रेरणा भारती डिजिटल न्यूज़ नेटवर्क के विशेष प्रतिनिधि दिलीप कुमार ने उत्पादन केंद्र का भ्रमण कर निर्माण प्रक्रिया का अवलोकन किया तथा केंद्र के प्रमुख मनोज कुमार पांडेय से विस्तृत बातचीत कर घी निर्माण के प्रत्येक चरण की जानकारी प्राप्त की।
दूध की जांच से शुरू होती है निर्माण प्रक्रिया
मनोज कुमार पांडेय ने बताया कि घी निर्माण की शुरुआत गौशाला से प्राप्त ताजा A2 दूध से होती है। सबसे पहले दूध का वजन किया जाता है, उसके बाद उसकी गुणवत्ता और शुद्धता की वैज्ञानिक जांच की जाती है। जांच के उपरांत मशीन की सहायता से दूध और क्रीम को अलग किया जाता है। इसके बाद निर्धारित मात्रा में दही मिलाकर दूध को लगभग दो दिनों तक प्राकृतिक रूप से जमने के लिए रखा जाता है।
देसी बिलोना पद्धति से तैयार होता है मक्खन
दो दिन बाद पारंपरिक देसी बिलोना विधि से हाथों द्वारा मथकर मक्खन तैयार किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में किसी भी प्रकार के रसायन, प्रिजर्वेटिव, कृत्रिम रंग या अन्य मिलावटी पदार्थ का प्रयोग नहीं किया जाता। तैयार मक्खन को भी लगभग दो दिनों तक नियंत्रित तापमान में सुरक्षित रखा जाता है, जिससे उसकी गुणवत्ता बनी रहती है।
12 से 13 घंटे की धीमी आंच पर बनता है घी
घी निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण चरण मक्खन को घी में परिवर्तित करना है। मनोज कुमार पांडेय के अनुसार, इसमें चूल्हे का तापमान सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता है। लगभग 200 से 250 किलोग्राम मक्खन को लगातार 12 से 13 घंटे तक धीमी आंच पर पकाया जाता है। इसी नियंत्रित तापमान और धैर्यपूर्ण प्रक्रिया से घी का प्राकृतिक स्वाद, सुगंध, रंग और उसके औषधीय गुण सुरक्षित रहते हैं।
उन्होंने बताया कि घी बनने के बाद उसे तुरंत पैक नहीं किया जाता, बल्कि दो दिनों तक ठंडे कक्ष में रखा जाता है, जिससे उसमें प्राकृतिक रूप से दाने (ग्रेन्यूल्स) विकसित हो जाते हैं। इसके बाद घी को फिल्टर कर पूरी स्वच्छता के साथ विभिन्न आकार के जार एवं कंटेनरों में पैक किया जाता है। पूरी निर्माण प्रक्रिया में लगभग 6 से 7 दिन का समय लगता है, जबकि केंद्र में महीने में तीन बार घी तैयार किया जाता है।
एक किलो घी के लिए लगता है 25 से 30 लीटर A2 दूध
उत्पादन केंद्र के अनुसार एक किलोग्राम शुद्ध मधुरामृत घी तैयार करने में लगभग 25 से 30 लीटर A2 देसी गाय के दूध की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि इस घी की गुणवत्ता और शुद्धता सामान्य बाजार में उपलब्ध घी से अलग मानी जाती है।
गौशाला का अपना दूध, इसलिए गुणवत्ता पर पूरा भरोसा
मनोज कुमार पांडेय का कहना है कि मधुरामृत घी की सबसे बड़ी विशेषता इसका प्रमाणिक कच्चा माल है। घी निर्माण के लिए आवश्यक दूध किसी बाहरी स्रोत से नहीं खरीदा जाता, बल्कि हासानन्द गौशाला में संरक्षित प्रमाणिक देसी गायों से प्राप्त होता है। इससे दूध की शुद्धता और गुणवत्ता पर पूर्ण नियंत्रण बना रहता है।
उन्होंने बताया कि बाजार में उपलब्ध अधिकांश घी की तुलना में मधुरामृत घी अलग पहचान रखता है। कई लोग घरों में घी बनाते समय जानकारी के अभाव में मक्खन को अत्यधिक तापमान पर अधिक देर तक उबाल देते हैं, जिससे उसके प्राकृतिक एवं औषधीय गुण प्रभावित हो जाते हैं। जबकि मधुरामृत घी में तापमान और समय का विशेष ध्यान रखा जाता है, जिससे उसकी गुणवत्ता और प्राकृतिक गुण सुरक्षित रहते हैं।
स्वास्थ्य के प्रति भी बढ़ रहा लोगों का विश्वास
मनोज कुमार पांडेय ने बताया कि शुद्ध देसी गाय का A2 घी संतुलित मात्रा में सेवन करने पर स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है। उनका कहना है कि अनेक उपभोक्ता आंख, त्वचा और अन्य स्वास्थ्य संबंधी उपयोगों के लिए भी इस घी का प्रयोग करते हैं। हालांकि ऐसे स्वास्थ्य संबंधी लाभ व्यक्ति विशेष पर निर्भर करते हैं और किसी भी बीमारी के उपचार के लिए चिकित्सकीय सलाह आवश्यक है।
गौ-संरक्षण और भारतीय परंपरा का सशक्त केंद्र
हासानन्द गौशाला का मधुरामृत घी उत्पादन केंद्र केवल घी निर्माण की इकाई नहीं, बल्कि गौ-संरक्षण, भारतीय पारंपरिक खाद्य संस्कृति, ग्रामीण रोजगार और स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देने का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। यहां तैयार होने वाला शुद्ध A2 देसी घी गुणवत्ता, पारंपरिक निर्माण पद्धति और विश्वसनीयता के कारण उपभोक्ताओं के बीच लगातार अपनी अलग पहचान बना रहा है।
ब्रज की पावन भूमि पर संचालित यह केंद्र भारतीय परंपरा, गौ-सेवा और शुद्ध आहार की संस्कृति को आधुनिक समय में भी जीवित रखने का एक प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है।