शिलचर, मंगलवार। गुरुचरण विश्वविद्यालय के बंगला विभाग के तत्वावधान में मंगलवार को 40वां शहीद जगन-यीशु (दिव्येंदु दास एवं जगन्मय देव) आत्मबलिदान दिवस श्रद्धा और गरिमा के साथ मनाया गया।
कार्यक्रम के प्रथम चरण में विश्वविद्यालय परिसर स्थित शहीद वेदी पर शहीद जगन-यीशु के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की गई। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. निरंजन राय, रजिस्ट्रार डॉ. विद्युत कांति पाल, शैक्षणिक रजिस्ट्रार डॉ. अभिजीत नाथ, असम विश्वविद्यालय के बंगला विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. विश्वतोष चौधरी, कछार कॉलेज के अंग्रेजी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष संतोष चक्रवर्ती, वित्त अधिकारी रणविजय दास सहित विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के शिक्षक-शिक्षिकाओं और विद्यार्थियों ने श्रद्धांजलि अर्पित की।
इसके बाद विश्वविद्यालय के सभागार में आयोजित स्मरण सभा में उपस्थित विशिष्ट अतिथियों का उत्तरीय पहनाकर स्वागत किया गया।
स्वागत भाषण में शैक्षणिक रजिस्ट्रार डॉ. अभिजीत नाथ ने कहा कि 19 मई को 5 ज्येष्ठ के रूप में भी स्मरण किया जाना चाहिए। उन्होंने 1986 के भाषा आंदोलन को बंगला तिथि के अनुसार मनाने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि यह दिन केवल बराक घाटी के भाषा शहीदों को ही नहीं, बल्कि मातृभाषा के लिए बलिदान देने वाले पूरे भारत के सभी शहीदों को श्रद्धापूर्वक याद करने का अवसर है। उन्होंने विश्व की सभी मातृभाषाओं के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए कहा कि इस वर्ष शहीद जगन-यीशु के आत्मबलिदान की 40वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है।
विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार डॉ. विद्युत कांति पाल ने दिवस के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मातृभाषा के प्रति सम्मान रखना चाहिए तथा भाषा की गरिमा और अधिकारों की रक्षा के प्रति जागरूक रहना चाहिए।
असम विश्वविद्यालय के बंगला विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. विश्वतोष चौधरी ने कहा कि हमारी संस्कृति, सभ्यता और अस्तित्व की बुनियाद मातृभाषा है। राष्ट्रीय चेतना भी मातृभाषा से गहराई से जुड़ी हुई है। उन्होंने 1961 के भाषा संबंधी सर्कुलर के लंबे समय तक दबे रहने के बाद फिर से सामने आने के इतिहास का उल्लेख किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि बराक घाटी के लोगों का असमिया भाषा अथवा किसी अन्य भाषा और उसके भाषाभाषी लोगों से कोई विरोध नहीं है।
प्रो. चौधरी ने विश्व की पहली महिला मातृभाषा सेनानी शहीद कमला भट्टाचार्य को श्रद्धापूर्वक याद किया। उन्होंने कहा कि यह दिन आत्ममंथन का भी दिन है। अंग्रेजी भाषा से किसी प्रकार का विरोध नहीं है; विरोध अंग्रेजियत की मानसिकता से होना चाहिए, अंग्रेजी भाषा से नहीं।
मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित कछार कॉलेज के अंग्रेजी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष संतोष चक्रवर्ती ने कहा कि भाषा और संस्कृति के संरक्षण के प्रति समाज को जागरूक रहना होगा। दुनिया की प्रत्येक भाषा के प्रति समान सम्मान का भाव होना चाहिए। उन्होंने आशा व्यक्त की कि भविष्य में भाषा शहीदों की सूची और लंबी न हो।
अध्यक्षीय संबोधन में कुलपति प्रो. निरंजन राय ने भाषा शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए 1986 के भाषा आंदोलन की घटनाओं को याद किया। उन्होंने कहा कि उस समय बराक घाटी में तीसरी भाषा के रूप में असमिया थोपने के प्रयास के विरोध में भाषा आंदोलन शुरू हुआ था। उन्होंने बताया कि उस समय वे शिक्षा संरक्षण समिति के स्वयंसेवक के रूप में आंदोलन से जुड़े थे। समिति ने शांतिपूर्ण तरीके से काले झंडे दिखाकर विरोध प्रदर्शन करने का निर्णय लिया था, लेकिन इसी शांतिपूर्ण आंदोलन पर गोलीबारी की गई।
कुलपति ने उस समय की घटनाओं का विस्तार से उल्लेख करते हुए कहा कि मातृभाषा का संरक्षण और सम्मान प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मातृभाषा को दिए गए महत्व का भी उल्लेख किया।
पूरे कार्यक्रम का संचालन डॉ. उत्तम पालुआ ने किया।