छोटी सर्कस वाली (कृतक कथा) 

    छोटी सर्कस वाली (कृतक कथा) 

रेल गाड़ी अपनी रफ्तार से आगे बढ़ रही थी। अंदर बैठे मुसाफिर  एक आठ – दस साल की छोटी सी लड़की के सर्कस देख रहे थे। लड़की कभी उछल- कुद करती तो कभी छोटे से लोहे के रिंग मे से अपने पूरे शरीर को आर- पार कर तरह – तरह के करतब दिखा रही थी। करतब समाप्त करने के बाद लड़की एक – एक मुसाफिर के आगे हाथ  फैलाई किसी ने दो – पांच रुपए दिए तो किसी ने कहा काम क्यों नहीं कर लेती हो? तो किसी ने मदद देने के बजाय दुत्कार दिया।अंत मे लड़की खिड़की के पास बैठे एक सज्जन के आगे हाथ फैलाई। सज्जन ने स्नेहपूर्वक पूछा बेटी तुम्हारी घर कहाँ है? और घर मे कौन- कौन है? लड़की ने जवाब दी – अगले स्टेशन के एक झोपड़ पट्टी मे मेरा घर है और घर मे मै और मेरी माँ रहती है। सज्जन ने कहा- बेटी आज मै एक ऐसी चीज दूंगा जो आजतक किसी ने नही दिया है तुझे। लड़की मे उत्सुकता बढ़ गई आखिर ऐसी क्या चीज है! संयोग से सज्जन को भी अगले स्टेशन पर उतरना था। सज्जन उस छोटी- सी लड़की के पीछे- पीछे उसके घर पहुंचे और उसकी माँ से अनुमति लेकर उस लड़की का नाम समीप के विधालय मे लिखवा दिए तथा एक  कागज के टुकड़ा मे अपना मोबाइल नंबर लिखकर दिए और बोले किसी भी सूरत मे पढ़ाई बीच मे मत छोड़ना किसी प्रकार के बाधा आए तो किसी के मोबाइल से मुझे फोन करना मै बाधा दूर करने का प्रयास करूँगा। बेटी यही वह चीज है जिसे मै तुझे देने को कहा था। समय बितता गया। वर्षों बाद लड़की बारहवीं की पढ़ाई पूरी कर प्राईमरी स्कूल मे सरकारी शिक्षिका की नौकरी पा गई। अब हाथ मे मोबाइल हो जाने से तकनीक के माध्यम से नम्बर निकालकर एक दिन लड़की उस सज्जन को फोन की और  बोली अंकल जी नमस्कार! आप मुझे पहचाने? मै वही लड़की जो  वर्षो पहले रेलगाड़ी मे सर्कस करते मिली थी और आज आप ही के कृपा से मै पढ़ कर सरकारी शिक्षिका की नौकरी पा गई हूँ। यह सुनते ही सज्जन के सीना खुशी से चौड़ा हो गया। सज्जन ने कहा- मै एक शिक्षक होने के नाते बहुत- सारे विधार्थी को डाक्टर, इंजीनियर बनाए परन्तु सही मायने मे किसी को शिक्षा दी वह तुम हो बेटी। मेरा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ है। तुम्हारी तरक्की सुनकर मेरा हृदय गदगद हो गया।
पवन कुमार शर्मा  (शिक्षक)
दुमदुमा (असम)
मो.नं. 9954327677

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