*सद्गृहस्थ-सन्त परम्परा के अमर आलोकस्तम्भ : श्री श्री 1008 साकेतवासी श्री मौनी जी महाराज*
*नाम-साधना, लोकमंगल और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के अप्रतिम प्रणेता थे श्रीमौनी जी महाराज – डॉ. अभिषेक कुमार उपाध्याय*
जम्मू/कठुआ – परम श्रद्धेय प्रातः रमणीय श्री श्री 1008 साकेतवासी श्री मौनी जी महाराज के जीवन लीला के विषय में संक्षिप्त में चर्चा करते हुए जम्मू कश्मीर प्रान्त के मन्दिर एवं गुरुकुल सेवा योजना प्रमुख व श्री श्री 1008 श्री मौनी बाबा चैरिटेबल ट्रस्ट न्यास के मुख्य न्यासी पं डॉ. अभिषेक कुमार उपाध्याय ने महाराज श्री के विषय में सनातन धर्म संस्कृति एवं परम्परा में सन्तों का अवतरण ईश्वर की अहैतुकी कृपा के बिना। सम्भव नहीं है। ऐसे ही दिव्य अवतार थे श्रीमौनी जी महाराज।
भारतीय सनातन परम्परा में संत केवल किसी आश्रम अथवा मठ की सीमा तक सीमित व्यक्तित्व नहीं रहे हैं, अपितु वे युगधर्म के संवाहक, लोकमंगल के अधिष्ठाता तथा समाज की आध्यात्मिक चेतना के जागरण-पुरुष रहे हैं। जब-जब समाज दिशाहीनता, सांस्कृतिक विस्मृति अथवा आध्यात्मिक शैथिल्य की ओर अग्रसर हुआ है, तब-तब किसी न किसी संत-महापुरुष ने अपने तप, त्याग, आचरण एवं भगवन्नाम की महिमा से जनमानस को पुनः धर्ममार्ग पर प्रतिष्ठित किया है। ऐसे ही विलक्षण संतों की गौरवशाली परम्परा में *श्री श्री 1008 साकेतवासी श्री मौनी जी महाराज* का नाम अत्यन्त श्रद्धा, आदर एवं गौरव के साथ स्मरण किया जाता है।
*महर्षि भृगु की तपोभूमि, उत्तर प्रदेश के बागी (बलिया)* में अवतीर्ण पूज्य महाराज श्री ने यह सिद्ध कर दिया कि परमात्मप्राप्ति केवल संन्यासाश्रम का विशेषाधिकार नहीं, अपितु सद्गृहस्थ जीवन भी यदि *धर्म, तप, संयम एवं अखण्ड भगवन्नाम-स्मरण से आलोकित हो जाए, तो वही जीवन सिद्धत्व* का पथ बन जाता है। वे उन विरल महापुरुषों में थे जिन्होंने गृहस्थ रहते हुए भी वैराग्य, तपस्या और ईश्वरनिष्ठा का ऐसा अद्भुत समन्वय प्रस्तुत किया, जो आधुनिक समाज के लिए अनुकरणीय आदर्श है।
*पूज्य महाराज श्री, श्री अयोध्या धाम स्थित तपस्वी छावनी, श्रीरामघाट के परमश्रद्धेय सिद्ध संत श्री श्री 1008 श्री रामगुलाम दास जी महाराज (बलुईया बाबा) के दीक्षित शिष्य थे*। गुरु-कृपा एवं अखण्ड साधना के प्रभाव से उन्होंने आत्मानुभूति की उन ऊँचाइयों को प्राप्त किया, जिनका आधार केवल शास्त्रज्ञान नहीं, अपितु तपःपूत जीवन और भगवन्नाम के प्रति अनन्य समर्पण था।
महाराज श्री के जीवन का सर्वाधिक प्रेरणास्पद पक्ष उनकी *बारह वर्षों की हिमालय स्थित मौन एवं गुप्त साधना है*। लोकप्रशंसा से सर्वथा विरक्त रहकर उन्होंने आत्मशोधन, ईश्वरचिन्तन और अखण्ड नामजप को ही साधना का केन्द्र बनाया। हिमालय की दिव्य कन्दराओं में सम्पन्न यह तप केवल व्यक्तिगत सिद्धि का माध्यम नहीं था; वह भावी समाज के आध्यात्मिक पुनरुत्थान की मौन तैयारी थी। साधना-समापन के उपरान्त जब वे पुनः लोककल्याण के लिए समाज में अवतीर्ण हुए, तब उनका सम्पूर्ण जीवन *श्री सीताराम* नाम के अखण्ड संकीर्तन का पर्याय बन गया।
पूज्य महाराज श्री का सम्पूर्ण संदेश अत्यन्त सरल किन्तु गूढ़ था— *कलियुग में भगवन्नाम ही सर्वश्रेष्ठ आश्रय है*। उन्होंने न किसी जटिल साधना-पद्धति का आग्रह किया और न ही दुरूह दार्शनिक विमर्शों का; उन्होंने सामान्य जन को केवल श्रीसीताराम नाम का अवलम्बन प्रदान किया। उनके द्वारा संचालित अखण्ड *श्री सीताराम, श्री सीताराम, श्री सीताराम* नामसंकीर्तन ने असंख्य परिवारों को आध्यात्मिक आधार प्रदान किया तथा समाज को भक्ति, शान्ति और सदाचार के सूत्र में पिरोया।
महाराज श्री केवल एक आध्यात्मिक पुरुष ही नहीं, अपितु भारतीय सांस्कृतिक चेतना के सशक्त संवाहक भी थे। उन्होंने देश के विविध तीर्थक्षेत्रों एवं ग्रामों में *श्री सीताराम नामसंकीर्तन, श्री सियाराम विवाहोत्सव तथा श्रीराम कलेवा* जैसे कार्यक्रमों का सूत्रपात कर लोकजीवन को पुनः राममय बनाने का महान अभियान चलाया। इन आयोजनों ने केवल धार्मिक अनुष्ठान का स्वरूप ही नहीं ग्रहण किया, बल्कि *भारतीय परिवार व्यवस्था, सामाजिक समरसता, लोकपरम्परा और सांस्कृतिक निरन्तरता* को भी नवीन ऊर्जा प्रदान की।
विशेषतः उनकी जन्मभूमि बलिया में विगत लगभग *छिहत्तर वर्षों से पौष मास के प्रथम शनिवार* से प्रारम्भ होकर सम्पन्न होने वाला *श्रीसीताराम नामसंकीर्तन एवं श्री दुल्हा सरकार की भव्य बारात, संत-समाज के सान्निध्य में सम्पन्न श्री सियाराम विवाहोत्सव* तथा उससे सम्बद्ध समस्त आयोजन आज भी उनकी दिव्य प्रेरणा के सजीव प्रतीक हैं। यह केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, अपितु लोकसंस्कृति, सामाजिक सहभागिता और सनातन जीवनमूल्यों का अनुपम महोत्सव है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता का संरक्षण कर रहा है।
बिहार सहित देश के अनेक क्षेत्रों में आज भी महाराज श्री की प्रेरणा से प्रारम्भ हुए नामसंकीर्तन, मानसपाठ एवं विवाहोत्सव के आयोजन निरन्तर चल रहे हैं। यह किसी संत के प्रभाव की सामान्य परिणति नहीं, बल्कि उनके द्वारा स्थापित आध्यात्मिक परम्परा की जीवन्तता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। कोई भी महापुरुष तभी युगपुरुष कहलाता है, जब उसके विगत हो जाने के उपरान्त भी उसके संस्कार समाज में सतत प्रवाहित होते रहें। इस दृष्टि से पूज्य मौनी जी महाराज का जीवन भारतीय संतपरम्परा की अक्षुण्ण धरोहर है।
*आषाढ़ शुक्ल अष्टमी, गुप्त नवरात्र के पावन अवसर पर वर्ष 1986 में पूज्य महाराज श्री ने देहावसान नहीं, अपितु साकेतगमन* किया। किंतु संतों का प्रस्थान केवल शरीर का होता है; उनके विचार, उनके संस्कार और उनका आध्यात्मिक प्रभाव कालातीत हो जाता है। आज भी उनके उपदेश समाज को दिग्भ्रमित होने से बचाते हैं और भगवन्नाम की ओर उन्मुख करते हैं। उनके लाखों श्रद्धालु एवं अनुयायी आज भी श्रीसीताराम नामजप को जीवन का आधार बनाकर आत्मिक शान्ति, नैतिक दृढ़ता और आध्यात्मिक उन्नति का अनुभव कर रहे हैं।
वर्तमान समय भौतिक उन्नति के साथ-साथ मानसिक अशान्ति, पारिवारिक विघटन, सांस्कृतिक विस्मरण और नैतिक अवमूल्यन की चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे संक्रमणकाल में पूज्य मौनी जी महाराज का जीवन और संदेश पूर्वापेक्षा अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। उन्होंने सिद्ध किया कि समाज का वास्तविक पुनर्निर्माण किसी बाह्य क्रान्ति से नहीं, अपितु चरित्र, संस्कार और भगवन्नाम के जागरण से होता है। उनका सम्पूर्ण जीवन इस सनातन सत्य का मूर्त उदाहरण है कि जब व्यक्ति अपने अंतःकरण को नामस्मरण से पवित्र करता है, तभी परिवार, समाज और राष्ट्र भी स्वतः सुदृढ़ होते हैं।
इसी पुण्य परम्परा के निर्वाहार्थ पूज्य महाराज श्री की 41वीं साकेतवास पुण्यतिथि के पावन अवसर पर *20–21 जुलाई 2026 को बिहार प्रदेश के श्रीनगर, पिहुली मंदिर (जनपद सिवान) स्थित श्री रामजानकी मन्दिर* में *श्रीसीताराम नामसंकीर्तन, अखण्ड श्रीरामचरितमानस पाठ, सुन्दरकाण्ड पाठ, सामूहिक श्रीहनुमान चालीसा, संत-प्रवचन, भजन-संध्या तथा महाप्रसाद-भण्डारे* का भव्य आयोजन सम्पन्न होगा। यह आयोजन *श्री रामजानकी मन्दिर के महन्त श्री श्री 108 श्री राघव दास जी महाराज* एवं *श्री श्री 1008 श्री मौनी बाबा चैरिटेबल ट्रस्ट न्यास* तथा बिहार प्रदेश के समस्त श्रद्धालु शिष्यों एवं भक्तों के समर्पित सहयोग से सम्पन्न हो रहा है। यह केवल एक पुण्यतिथि समारोह नहीं, बल्कि महाराज श्री द्वारा स्थापित नाम-साधना एवं लोकमंगल की परम्परा का पुनर्स्मरण और उसके प्रति सामूहिक संकल्प का महोत्सव है।
पूज्य श्री मौनी जी महाराज का जीवन हमें यह संदेश देता है कि संतत्व का वास्तविक स्वरूप वेशभूषा में नहीं, अपितु आचरण में निहित होता है; समाज का कल्याण उपदेशों से अधिक उदाहरणों से होता है; और युगों तक जीवित वही रहते हैं, जो अपने जीवन को स्वयं के लिए नहीं, बल्कि लोकमंगल, धर्मसंरक्षण और भगवन्नाम के प्रसार के लिए समर्पित कर देते हैं।
उनकी 41वीं साकेतवास पुण्यतिथि पर यही हमारी श्रद्धांजलि होगी कि हम उनके द्वारा प्रदर्शित नाम-स्मरण, सदाचार, सांस्कृतिक संरक्षण, सामाजिक समरसता तथा लोककल्याण के आदर्शों को अपने जीवन में आत्मसात करें। यही उनके तप, त्याग और दिव्य जीवन के प्रति सच्ची कृतज्ञता होगी और यही भारतीय संतपरम्परा के प्रति हमारी विनम्र श्रद्धांजलि भी।