1993 से 2026 तक: अलविदा जंतर-मंतर ने देखा सब कुछ,अब खुद इतिहास बन गया

 राजेश कुमार सिंह / नई दिल्ली

जंतर-मंतर सिर्फ एक सड़क नहीं, इस देश के लोकतंत्र की आखिरी चौपाल था।ग्यारह (11) अक्टूबर 2026 की तारीख इतिहास में दर्ज हो गई। दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय की विशेष समिति की सिफारिश पर वह आदेश जारी कर दिया, जिसका डर सालों से था ,जंतर-मंतर अब आधिकारिक विरोध-प्रदर्शन स्थल की सूची से हटा दिया गया है। उसे डीनोटिफाई कर दिया गया है। सरकार ने विकल्प दिए हैं – रामलीला मैदान, बुराड़ी का विशाल मैदान और पूर्वी दिल्ली का सीबीडी ग्राउंड।

काग़ज़ पर या यूँ कहे फाइल में यह जगह का बदलाव है, पर इस देश के लोकतंत्र के लिए यह एक युग का अंत है।यहाँ पत्थर नहीं, यादें बोलती हैं,जंतर-मंतर का इतिहास 1993 से शुरू होता है, जब सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी कि संसद के पास बोट क्लब पर प्रदर्शन नहीं होंगे, और दिल्ली की आवाजों के लिए एक कोना तय किया गया। तब से यह 100 मीटर की पट्टी ही हिंदुस्तान की सबसे बड़ी अदालत बन गई।

सच्चाई ये है कि यहा ईंट- पत्थर नहीं बल्कि आवाज़ें बसती थी।आप याद कीजिए ?

2011 का अगस्त: अन्ना हजारे नाम का एक बूढ़ा अपनी गांधी टोपी में अनशन पर बैठा। मंच छोटा था, पर देश बहुत बड़ा हो गया। यहीं से ‘मैं भी अन्ना’ का नारा निकला और यहीं से एक नई पार्टी का जन्म हुआ जो आज दिल्ली की सत्ता पर है।

2012 का दिसंबर: निर्भया कांड के बाद जब पूरा देश गुस्से में था, तो जंतर-मंतर पर जलने वाली मोमबत्तियों ने सर्दी की रात को भी गर्म कर दिया था। यहाँ खड़े हर लड़के-लड़की की आँख में एक ही सवाल था – क्या मेरी बहन सुरक्षित है?

2016 से 2024 तक: यहाँ तमिलनाडु के किसान अपनी सूखी फसल और खोपड़ियाँ लेकर बैठे, तो कभी पूर्व सैनिक OROP के लिए धरने पर बैठे। यहीं पहलवान बेटियों ने न्याय के लिए रातें गुजारीं। बेरोजगार युवाओं ने थाली बजाई तो आशा वर्करों ने अपनी फटी साड़ियों में हक माँगा।

इस फुटपाथ ने प्रधानमंत्री देखे,और फुटपाथ पर सोने वालों को भी इसने सुना है कि लोकतंत्र कितना शोर करता है।यह स्थल  संसद से महज़ सिर्फ 2 किलोमीटर दूर थी। इसका जादू यही था, यहाँ से लगने वाला नारा सीधा सत्ता के कानों में गूँजता था।अब सरकार का तर्क है कि  लुटियंस दिल्ली में शोर नहीं होना चाहिए,प्रदर्शन से ट्रैफिक जाम होता है, सुरक्षा को खतरा है।तर्क सही हो सकता है।बुराड़ी मैदान बहुत बड़ा है, रामलीला मैदान ऐतिहासिक है।पर क्या कोई भी मैदान उस एहसास की भरपाई कर पाएगा जहाँ से संसद की दीवारें सिर्फ़ दो किलोमीटर दूर दिखती हो? सही मायने में जंतर-मंतर का असली ताक़त उसकी जगह नहीं,उसकी निकटता थी,सत्ता के कान के ठीक पास चीखने की हिम्मत ।हालाँकि सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र सुविधा देखकर चलता है?जब आप किसी की आवाज को शहर के सबसे व्यस्त चौराहे से उठाकर शहर के सबसे सुनसान कोने में भेज देते हैं, तो आप उसे जगह नहीं, उसकी ताकत से बेदखल कर देते हैं। बुराड़ी में हजारों लोग चिल्लाएंगे भी तो उनकी आवाज यमुना पार ही रह जाएगी, नॉर्थ ब्लॉक तक नहीं पहुंचेगी।जंतर-मंतर की ताकत उसकी जमीन में नहीं, उसकी प्रतीकात्मकता में थी। वहाँ खड़ा एक अकेला आदमी भी खुद को संसद के बराबर महसूस करता था। उसे लगता था कि लोकतंत्र में उसकी भी जगह है। वह पोस्टर जो जनपथ से लेकर जंतर-मंतर तक लगे थे, वही तो लोकतंत्र थे।

कल से वहाँ बैरिकेड हट जाएंगे, लाउडस्पीकर उतर जाएंगे, पुलिस की वैन नहीं होगी। टूरिस्ट आएंगे और 1724 में बने महाराजा जयसिंह के यंत्रों की फोटो खींचकर चले जाएंगे। कोई नहीं जान पाएगा कि इन यंत्रों के बगल वाले फुटपाथ पर इस देश के भविष्य की कितनी इबारतें लिखी गई थीं।पर जो लोग वहाँ बैठे ,रोए, लड़े-उनके लिए यह सड़क हमेशा देश का सबसे बड़ा मंच ही रहेगा।इसलिए इस मंच को अलविदा कहना आसान नहीं होगा।तुम सिर्फ एक प्रदर्शन स्थल नहीं थे। तुम इस देश के आम आदमी का सबसे सस्ता, सबसे सच्चा और सबसे आखिरी मंच थे, जहाँ बिना टिकट के भी लोकतंत्र देखा जा सकता था।

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