— अशोक वर्मा
मेदली (सेपिंजुरी) चाय बागान के अंतर्गत स्थित तिलभूम चाय बागान में हीरालाल प्रजापति का जन्म हुआ। वे चार भाइयों में तीसरे थे। उनके माता-पिता दोनों ही चाय बागान के श्रमिक थे। आर्थिक अभाव के कारण परिवार में शिक्षा का अनुकूल वातावरण नहीं था। बड़े दोनों भाइयों की पढ़ाई अधिक आगे नहीं बढ़ सकी, किंतु हीरालाल ने बचपन से ही शिक्षा को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया।
हर व्यक्ति के भीतर आगे बढ़ने की क्षमता होती है, परंतु उस क्षमता को परिश्रम, अनुशासन और दृढ़ निश्चय से ही साकार किया जा सकता है। कुछ लोगों में यह चेतना बचपन से ही जागृत हो जाती है और हीरालाल प्रजापति उन्हीं व्यक्तित्वों में से एक थे।
उन्होंने तिलभूम पाठशाला से प्राथमिक शिक्षा पूरी की और उसके बाद एम.ई. स्कूल में प्रवेश लिया। एम.ई. उत्तीर्ण करने के बाद वे दुर्ल्लभछोड़ा में अपने एक रिश्तेदार के घर रहने लगे और वहाँ के उच्च विद्यालय में तीन वर्ष तक अध्ययन किया। परिस्थितियाँ अनुकूल न रहने पर वे पुनः अपने चाय बागान लौट आए और सोनाखीरा चाय बागान स्थित श्री प्रसाद राय हाई स्कूल में दाखिला लिया। उस समय इस विद्यालय के समर्पित शिक्षकों के अथक प्रयासों के कारण माध्यमिक परीक्षा का परिणाम अत्यंत उत्कृष्ट रहता था। यहीं से माध्यमिक शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने करीमगंज कॉलेज में प्रवेश लेने का दृढ़ संकल्प किया।
श्रमिक परिवार की आर्थिक कठिनाइयाँ उनके मार्ग में बड़ी बाधा थीं, किंतु आत्मविश्वास और दृढ़ इच्छाशक्ति के सामने अभाव भी हार मान लेते हैं। हीरालाल करीमगंज कॉलेज में प्रवेश लेने में सफल हुए और उन्हें निम्बार्क आश्रम में रहने का स्थान मिल गया। भोजन और अन्य आवश्यकताओं की कमी के बावजूद उन्होंने अपना अध्ययन जारी रखा। उन्होंने प्री-यूनिवर्सिटी परीक्षा वाणिज्य संकाय से उत्तीर्ण की और तत्पश्चात तीन वर्षीय बी.कॉम. पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया।
इसी दौरान उनका परिचय इचाबिल के शंभु कानू से हुआ। शंभु कानू के व्यक्तित्व से वे दो क्षेत्रों में विशेष रूप से प्रभावित हुए—पहला, रंगमंच और नाट्य गतिविधियाँ; दूसरा, चाय बागान के श्रमिक समाज के उत्थान के लिए संगठनात्मक जागरण। दोनों ने मिलकर चाय बागानों के विद्यार्थियों को संगठित करने का अभियान प्रारंभ किया। वे विभिन्न चाय बागानों का दौरा कर छात्र संगठन की शाखाएँ स्थापित करने लगे। इसी क्रम में उनका संपर्क असम के छात्र संगठनों के पदाधिकारियों से भी हुआ।
असम के श्रमिक छात्र संगठन के आह्वान पर हीरालाल प्रजापति और शंभु कानू तत्कालीन राजधानी शिलांग स्थित श्रमिक छात्रावास पहुँचे, जहाँ संगठन को सशक्त बनाने तथा उसकी कार्यप्रणाली निर्धारित करने के उद्देश्य से विस्तृत विचार-विमर्श किया गया।
एक ओर छात्र संगठन की गतिविधियाँ चलती रहीं तो दूसरी ओर नाट्याभ्यास और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तैयारियाँ भी जारी रहीं। हीरालाल का दृढ़ विश्वास था कि शिक्षा के प्रसार के बिना किसी भी समाज या समुदाय का वास्तविक विकास संभव नहीं है।
आर्थिक कठिनाइयों के कारण जब उनकी उच्च शिक्षा बीच में ही रुक गई, तब भी उन्होंने समाजसेवा का मार्ग नहीं छोड़ा। चाय बागान के एक अन्य युवक के सहयोग से उन्होंने एक हिंदी पाठशाला की स्थापना की। उसी समय तत्कालीन विधायक विश्वनाथ उपाध्याय के प्रयासों से बराक क्षेत्र में हिंदी विद्यालयों को असम सरकार से मान्यता मिलने लगी थी। हीरालाल द्वारा स्थापित विद्यालय को एक शिक्षक पद की स्वीकृति भी मिली। उल्लेखनीय है कि उन्होंने स्वयं वह पद स्वीकार करने के बजाय अपने सहयोगी को यह अवसर प्रदान किया। उनकी इस उदारता और निस्वार्थ भावना ने स्थानीय समाज में उनके प्रति सम्मान और विश्वास को और अधिक बढ़ा दिया।
शंभु कानू के साथ मिलकर उन्होंने जिले के चाय बागानों के युवाओं और विद्यार्थियों को संगठित किया तथा अन्याय और शोषण के विरुद्ध सक्रिय भूमिका निभाई।
समाजहित के प्रति उनकी निष्ठा का ही परिणाम था कि बाद में उन्हें तिलभूम स्थित वेंचर हाई स्कूल में हिंदी शिक्षक के रूप में आमंत्रित किया गया। कई वर्षों तक उन्होंने अत्यंत अल्प मानदेय पर भी धैर्य और समर्पण के साथ शिक्षण कार्य किया। अंततः विद्यालय को सरकारी मान्यता प्राप्त हुई और उन्हें नियमित रूप से हिंदी शिक्षक का पद मिला। निर्धारित समय पर सेवानिवृत्त होने के बाद भी वे विभिन्न सामाजिक और शैक्षिक गतिविधियों से जुड़े हुए हैं तथा अपनी सामर्थ्य के अनुसार समाजसेवा में निरंतर योगदान दे रहे हैं।
हीरालाल प्रजापति का जीवन इस सत्य का सशक्त उदाहरण है कि श्रमिक परिवार में जन्म लेने वाला व्यक्ति भी कठिन परिश्रम, शिक्षा और अटूट संकल्प के बल पर जीवन में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त कर सकता है। आज उनके सभी बच्चे शिक्षित, प्रतिष्ठित और आर्थिक रूप से सुदृढ़ जीवन व्यतीत कर रहे हैं। उनका संघर्षपूर्ण जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
बांग्ला से हिंदी अनुवाद: दिलीप कुमार