हीनं दुष्यति इति-“हिन्दूः हिन्दी हिन्दुस्थानम्”
बच्चों ! ऋग्वेद अष्टम मण्लान्तर्गत महर्षि गालव के शिष्य महाराज-“सैन्धव” का उल्लेख प्राप्त होता है,जिन्होंने सिन्धु घाटी में चक्रवर्ती सम्राट की भूमिका दो सौ तीस वर्षों तक निभायी ! आपके साम्राज्य की सीमायें वियतनाम से फारस की खाड़ी अर्थात तथाकथित ईरान पर्यन्त! एवं ऋषि-भूमि(रूस) से उत्तरीय ध्रुव प्रान्त तक विस्तृत थी कालान्तर में अफ्रीका एवं अन्यान्य मरुभूमि से आये लोगों के उच्चारण में-“स के स्थान पर “ह” अपभ्रंशक होने के कारण उनके द्वारा इस भूमि के निवासियों को-“हिन्दवः” का नाम दिया गया ! ऐसा कुछेक तथाकथित अल्पबुद्धि इतिहासकारों का कहना है किन्तु भूमिगत सच्चाई यह है कि फारसीय कन्वर्टेड सभ्यता से साढे तीन हजार वर्ष पूर्व भी हमारे मनीषियों ने हमें-“हिन्दू” कहा है-
“हिमालयं समारभ्य यावत इन्दुसरोवरं।
तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते॥
हमारे इतिहास को मेकाॅले,ह्वेनसांग,फाह्यान,आइने अकबरी, मुगल नामा,ब्रिटिश,पुर्तगालियों, जवाहरलाल नेहरू(डिस्कवरी ऑफ इंडिया) से लेकर वामपंथी चोरों तक ने तोड मरोड़ कर अपभ्रंशित कर दिया ! क्षेपकों से हमारे ऐतिहासिक ग्रन्थों को उनके अनुसार ढालने की कोशिश की ! अन्यथा सच्चाई ये है कि हमारे पूर्वज अर्थात-“आर्य-अनार्य” अर्थात गिरिवासियों ! सुदूर वनांचल में निवास करने वाले लोगों की भाषा-“प्रकृति और हिन्दी के समीप प्राकृत” और नगरीय क्षेत्र निवासियों की भाषा-“प्राकृत और संस्कारित भाषा के समीप हिन्दी” थी। अर्थात आर्य बाहर से नहीं आये थे! अर्थात-“यूरेशिया”नामक कोई भी स्थान न है और न ही कभी था।
ये सभी जानते हैं कि अफ्रीका, अमेरिका और ऑस्ट्रेलियाई क्षेत्रों में हुवे भयावह भौतिकीय-दैवी आपदाओं के कारण वहां के असभ्य और हिंसक जंगली भटकते हुवे भारत आये और यहाँ बस गये जिनको-असभ्य अर्थात असुर” कहते हैं ! किन्तु हमारा दुर्भाग्य है कि वामपंथियों ने उनको ही -“मूल निवासी”की संज्ञा दे दी । और यहाँ के वास्तविक हम आदिवासी आर्यों को हमारे ही भाई अनार्य अर्थात गिरिवासियों से पृथक करने का पैशाचिक सफल षड्यंत्र किया।
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि पुरापाषाण युग पूर्व पृथ्वी पर आये किसी भीषण भूडोल से तद्कालीन पृथ्वी से पृथक होकर-“इन्दु” अर्थात चन्द्रमा की रचना हुयी एवं जिस स्थान से यह खण्ड विखण्डित हुवा वहाँ हुवे विशालकाय गड्ढे से धीरे-धीरे समुद्र का विस्तार होता गया, भूमि के अंतःस्थल से प्रस्फुटित आग के शोलों पर जब वर्षा की बौछारें गिरीं ! तो अग्नि और जल के संयोग से लवण की उत्पत्ति हुयी! और इस सेतु का नाम कालांतर में चन्द्रमा के कारण-“इन्दु महासागर अर्थात हिन्द महासागर “के नाम से विख्यात हुवा।
बच्चों ! हमारे पूर्वज इसी कारण अग्निर्देवता अर्थात यज्ञाग्नि की उपासना करते रहे हैं।यह भूमि ही क्या सूर्य चन्द्र भौमादि सभी नक्षत्र प्रज्वलित अग्नि के समान उद्दीप्त हैं और यह समूचा ब्रम्हाण्ड धीरे-धीरे इसी यज्ञाग्नि में सतत् हवन होती और पुनश्च यज्ञधूम से उठी आद्र उष्मा से पुनश्च हमारे आपके नक्षत्रों के जैसे अन्न को बार-बार उत्पन्न पालन और हवन करता रहा है इसी सृष्टि चक्र को श्रीमद्भगवद्गीता में–
“अन्नाद् भवन्ति भूतानी पर्जन्यादन्न सम्भवः।
यज्ञाद् भवन्ति पर्जन्या यज्ञ कर्म समुद्भवः ॥
कर्म ब्रम्ह भवोत्वृद्धि ब्रम्हाक्षरः समुद्भवः ।
तस्मात सर्व गतं ब्रम्ह नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितः॥
ऐसा कहा गया है।
हिमालयी क्षेत्रीय विस्तृत श्रृंखला का आंकलन अभी तक जैमिनीय शास्त्री अर्थात अपभ्रंश-“जाग्रफी के विद्वान” करने में असमर्थ रहे हैं। प्राचीन काल से परम्परागत रूप से प्राच्य- “श्रुतियों की स्मृतियों” के आधार पर पाषाण एवं भोजपत्रों के साथ-साथ पीपल पत्र की झिल्लियों पर, नाना प्रकार के मृत पशुओं के चर्मपत्र पर हमारे आदर्श पूर्वजों ने प्राकृतिक भाषा में अर्थात चित्रों के साथ-साथ नाना स्वर और व्यञ्जनों के द्वारा जिन निबंधों को ! जिन गीतों को गाया उसे -ऋग्वेदादि नाना ग्रन्थों”के नाम से हम जानते हैं। हमारे शास्त्रों ने सभी संशयों का समाधान परोक्ष अपरोक्ष दोनों प्रकार से किया है,शास्त्र रूपी नेत्रों के प्रकाश में सबकुछ स्पष्ट है किन्तु जिनकी आँखों पर अपनी महान हिन्दू संस्कृति के प्रति नकारात्मक पट्टी बंधी है उन अंधों को कुछ नहीं दिखता–
“अनेकसंशयोच्छेदि परोक्षार्थस्य दर्शकम् ।
सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव सः॥”
बच्चों ! आपने अभी दिनांक नौ सितम्बर २०२४ को सुना होगा कि प्रिंसेस एलिजाबेथ के निधनोपरान्त उनकी बरसी पर-“इष्ट इंडिया कंपनी” ने ब्रिटिश सरकार के लिये -“सिक्के” बनाये ! ये वही कम्पनी है जिसने कभी धोखे से हमपर राज किया था ! हमारी आपसी फूट के कारण हमपर शासन किया था ! हमारे देश का नाम उनके दरिन्दों ने-“इन्डिया” रखा था ! और आज उसी ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को मात्र ७५ वर्षों में रसातल पर छोड़ सन् २०२६ में हमारी अर्थव्यवस्था विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था बन चुकी है मैं समझता हूँ कि-“हीनं दुष्यति इति-“हिन्दूः हिन्दी हिन्दुस्थानम्”जो अपनी हिनता का परित्याग कर दें ! जो अपने दोषों को त्याग दें वे”हिन्दू हिन्दी और हिन्दुस्थानी हैं–“आनंद शास्त्री सिलचर, सचल दूरभाष यंत्र सम्पर्क सूत्रांक 6901375971
बच्चों ! ऋग्वेद अष्टम मण्लान्तर्गत महर्षि गालव के शिष्य महाराज-“सैन्धव” का उल्लेख प्राप्त होता है,जिन्होंने सिन्धु घाटी में चक्रवर्ती सम्राट की भूमिका दो सौ तीस वर्षों तक निभायी ! आपके साम्राज्य की सीमायें वियतनाम से फारस की खाड़ी अर्थात तथाकथित ईरान पर्यन्त! एवं ऋषि-भूमि(रूस) से उत्तरीय ध्रुव प्रान्त तक विस्तृत थी कालान्तर में अफ्रीका एवं अन्यान्य मरुभूमि से आये लोगों के उच्चारण में-“स के स्थान पर “ह” अपभ्रंशक होने के कारण उनके द्वारा इस भूमि के निवासियों को-“हिन्दवः” का नाम दिया गया ! ऐसा कुछेक तथाकथित अल्पबुद्धि इतिहासकारों का कहना है किन्तु भूमिगत सच्चाई यह है कि फारसीय कन्वर्टेड सभ्यता से साढे तीन हजार वर्ष पूर्व भी हमारे मनीषियों ने हमें-“हिन्दू” कहा है-
“हिमालयं समारभ्य यावत इन्दुसरोवरं।
तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते॥
हमारे इतिहास को मेकाॅले,ह्वेनसांग,फाह्यान,आइने अकबरी, मुगल नामा,ब्रिटिश,पुर्तगालियों, जवाहरलाल नेहरू(डिस्कवरी ऑफ इंडिया) से लेकर वामपंथी चोरों तक ने तोड मरोड़ कर अपभ्रंशित कर दिया ! क्षेपकों से हमारे ऐतिहासिक ग्रन्थों को उनके अनुसार ढालने की कोशिश की ! अन्यथा सच्चाई ये है कि हमारे पूर्वज अर्थात-“आर्य-अनार्य” अर्थात गिरिवासियों ! सुदूर वनांचल में निवास करने वाले लोगों की भाषा-“प्रकृति और हिन्दी के समीप प्राकृत” और नगरीय क्षेत्र निवासियों की भाषा-“प्राकृत और संस्कारित भाषा के समीप हिन्दी” थी। अर्थात आर्य बाहर से नहीं आये थे! अर्थात-“यूरेशिया”नामक कोई भी स्थान न है और न ही कभी था।
ये सभी जानते हैं कि अफ्रीका, अमेरिका और ऑस्ट्रेलियाई क्षेत्रों में हुवे भयावह भौतिकीय-दैवी आपदाओं के कारण वहां के असभ्य और हिंसक जंगली भटकते हुवे भारत आये और यहाँ बस गये जिनको-असभ्य अर्थात असुर” कहते हैं ! किन्तु हमारा दुर्भाग्य है कि वामपंथियों ने उनको ही -“मूल निवासी”की संज्ञा दे दी । और यहाँ के वास्तविक हम आदिवासी आर्यों को हमारे ही भाई अनार्य अर्थात गिरिवासियों से पृथक करने का पैशाचिक सफल षड्यंत्र किया।
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि पुरापाषाण युग पूर्व पृथ्वी पर आये किसी भीषण भूडोल से तद्कालीन पृथ्वी से पृथक होकर-“इन्दु” अर्थात चन्द्रमा की रचना हुयी एवं जिस स्थान से यह खण्ड विखण्डित हुवा वहाँ हुवे विशालकाय गड्ढे से धीरे-धीरे समुद्र का विस्तार होता गया, भूमि के अंतःस्थल से प्रस्फुटित आग के शोलों पर जब वर्षा की बौछारें गिरीं ! तो अग्नि और जल के संयोग से लवण की उत्पत्ति हुयी! और इस सेतु का नाम कालांतर में चन्द्रमा के कारण-“इन्दु महासागर अर्थात हिन्द महासागर “के नाम से विख्यात हुवा।
बच्चों ! हमारे पूर्वज इसी कारण अग्निर्देवता अर्थात यज्ञाग्नि की उपासना करते रहे हैं।यह भूमि ही क्या सूर्य चन्द्र भौमादि सभी नक्षत्र प्रज्वलित अग्नि के समान उद्दीप्त हैं और यह समूचा ब्रम्हाण्ड धीरे-धीरे इसी यज्ञाग्नि में सतत् हवन होती और पुनश्च यज्ञधूम से उठी आद्र उष्मा से पुनश्च हमारे आपके नक्षत्रों के जैसे अन्न को बार-बार उत्पन्न पालन और हवन करता रहा है इसी सृष्टि चक्र को श्रीमद्भगवद्गीता में–
“अन्नाद् भवन्ति भूतानी पर्जन्यादन्न सम्भवः।
यज्ञाद् भवन्ति पर्जन्या यज्ञ कर्म समुद्भवः ॥
कर्म ब्रम्ह भवोत्वृद्धि ब्रम्हाक्षरः समुद्भवः ।
तस्मात सर्व गतं ब्रम्ह नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितः॥
ऐसा कहा गया है।
हिमालयी क्षेत्रीय विस्तृत श्रृंखला का आंकलन अभी तक जैमिनीय शास्त्री अर्थात अपभ्रंश-“जाग्रफी के विद्वान” करने में असमर्थ रहे हैं। प्राचीन काल से परम्परागत रूप से प्राच्य- “श्रुतियों की स्मृतियों” के आधार पर पाषाण एवं भोजपत्रों के साथ-साथ पीपल पत्र की झिल्लियों पर, नाना प्रकार के मृत पशुओं के चर्मपत्र पर हमारे आदर्श पूर्वजों ने प्राकृतिक भाषा में अर्थात चित्रों के साथ-साथ नाना स्वर और व्यञ्जनों के द्वारा जिन निबंधों को ! जिन गीतों को गाया उसे -ऋग्वेदादि नाना ग्रन्थों”के नाम से हम जानते हैं। हमारे शास्त्रों ने सभी संशयों का समाधान परोक्ष अपरोक्ष दोनों प्रकार से किया है,शास्त्र रूपी नेत्रों के प्रकाश में सबकुछ स्पष्ट है किन्तु जिनकी आँखों पर अपनी महान हिन्दू संस्कृति के प्रति नकारात्मक पट्टी बंधी है उन अंधों को कुछ नहीं दिखता–
“अनेकसंशयोच्छेदि परोक्षार्थस्य दर्शकम् ।
सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव सः॥”
बच्चों ! आपने अभी दिनांक नौ सितम्बर २०२४ को सुना होगा कि प्रिंसेस एलिजाबेथ के निधनोपरान्त उनकी बरसी पर-“इष्ट इंडिया कंपनी” ने ब्रिटिश सरकार के लिये -“सिक्के” बनाये ! ये वही कम्पनी है जिसने कभी धोखे से हमपर राज किया था ! हमारी आपसी फूट के कारण हमपर शासन किया था ! हमारे देश का नाम उनके दरिन्दों ने-“इन्डिया” रखा था ! और आज उसी ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को मात्र ७५ वर्षों में रसातल पर छोड़ सन् २०२६ में हमारी अर्थव्यवस्था विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था बन चुकी है मैं समझता हूँ कि-“हीनं दुष्यति इति-“हिन्दूः हिन्दी हिन्दुस्थानम्”जो अपनी हिनता का परित्याग कर दें ! जो अपने दोषों को त्याग दें वे”हिन्दू हिन्दी और हिन्दुस्थानी हैं–“आनंद शास्त्री सिलचर, सचल दूरभाष यंत्र सम्पर्क सूत्रांक 6901375971
आनंद शास्त्री