सोनभद्र के ग्रामीण परिवेश से राष्ट्रीय राजनीति तक पहुँचे पूर्व सांसद एवं पूर्व मनोनीत राज्यसभा सदस्य श्री राम शकल का सार्वजनिक जीवन सेवा, संगठन, सामाजिक समरसता और जनप्रतिबद्धता का उदाहरण
प्रेरणा भारती, विशेष संवाददाता
भारतीय लोकतंत्र के लंबे इतिहास में ऐसे जनप्रतिनिधियों की भूमिका विशेष महत्व रखती है, जिन्होंने राजनीति को व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का माध्यम न बनाकर समाज और राष्ट्र की सेवा का साधन माना। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद से राष्ट्रीय राजनीति तक पहुँचे श्री राम शकल का सार्वजनिक जीवन इसी परंपरा का उल्लेखनीय उदाहरण है।
लगभग पांच दशकों के सार्वजनिक जीवन में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक, भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ कार्यकर्ता, तीन बार लोकसभा सदस्य तथा राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत राज्यसभा सदस्य के रूप में विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया। उनका राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन सादगी, अनुशासन, सामाजिक समरसता, संवैधानिक मूल्यों और वंचित वर्गों के प्रति प्रतिबद्धता के लिए जाना जाता है।
साधारण कृषक परिवार से शुरू हुई यात्रा
श्री राम शकल का जन्म 21 मार्च 1963 को उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद के शिल्पी ग्राम में एक साधारण कृषक परिवार में हुआ। ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े श्री शकल ने बचपन से ही सीमित संसाधनों, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और ग्रामीण एवं वंचित समाज की समस्याओं को करीब से देखा। इन अनुभवों ने उनके व्यक्तित्व में संवेदनशीलता, आत्मानुशासन और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना को मजबूत किया।
उन्होंने गोरखपुर विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एम.ए. की शिक्षा प्राप्त की। विद्यार्थी जीवन से ही वे अध्ययन, सामाजिक गतिविधियों और राष्ट्र निर्माण से जुड़े विषयों में रुचि रखते थे।
आपातकाल के दौर ने उनके राजनीतिक और सामाजिक चिंतन को गहराई से प्रभावित किया। लोकतांत्रिक मूल्यों, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक जागरण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संगठनात्मक जीवन से जोड़ा।
प्रचारक के रूप में संगठन और समाज के बीच सेतु
1986 से 1996 तक क्षेत्रीय प्रचारक के रूप में श्री राम शकल ने विभिन्न क्षेत्रों में संगठनात्मक जिम्मेदारियां निभाईं। इस दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में संगठन विस्तार, सामाजिक समरसता, सेवा कार्य, युवा जागरण और राष्ट्रहित से जुड़े अभियानों में उनकी सक्रिय भूमिका रही।
उनका संगठनात्मक कार्य केवल संगठन के विस्तार तक सीमित नहीं था। वे समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संवाद और विश्वास स्थापित करने पर विशेष जोर देते रहे। अनुसूचित जाति एवं जनजाति समाज, किसान, श्रमिक, युवा और ग्रामीण आबादी के बीच उनकी सक्रियता ने उन्हें जमीनी स्तर पर व्यापक जनसंपर्क प्रदान किया।
उनकी कार्यशैली में सादगी, अनुशासन और संवाद को विशेष महत्व मिला। पद और प्रतिष्ठा की अपेक्षा उन्होंने संगठन तथा समाज के हित को प्राथमिकता दी।
तीन बार लोकसभा में जनता का विश्वास
संगठनात्मक जीवन के अनुभवों के बाद श्री राम शकल सक्रिय संसदीय राजनीति में आए। 1996 में उत्तर प्रदेश के रॉबर्ट्सगंज संसदीय क्षेत्र से पहली बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। इसके बाद 1998 और 1999 के आम चुनावों में भी जनता ने उन्हें अपना प्रतिनिधि चुना।
इस प्रकार उन्होंने 11वीं, 12वीं और 13वीं लोकसभा में लगातार तीन कार्यकाल पूरे किए।
लगातार तीन बार लोकसभा के लिए चुना जाना उनके प्रति क्षेत्र की जनता के विश्वास और उनके जनसंपर्क की व्यापकता को दर्शाता है। संसद में उन्होंने अपने क्षेत्रीय सरोकारों को राष्ट्रीय मुद्दों से जोड़ते हुए सोनभद्र, पूर्वांचल तथा आदिवासी एवं ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याओं को प्रमुखता से उठाया।
किसानों, श्रमिकों, अनुसूचित जाति एवं जनजाति समुदायों, ग्रामीण विकास, सिंचाई, सड़क, पेयजल, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे विषय उनके संसदीय सरोकारों में प्रमुख रहे।
राज्यसभा में भी जारी रहा जनहित का स्वर
लोकसभा के तीन कार्यकालों के बाद जुलाई 2018 में भारत के राष्ट्रपति द्वारा श्री राम शकल को राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया। जुलाई 2024 तक उन्होंने उच्च सदन के सदस्य के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभाईं।
राज्यसभा में उन्होंने विशेष उल्लेख (Special Mention) सहित विभिन्न संसदीय माध्यमों से सोनभद्र, पूर्वांचल और देश के वंचित वर्गों से संबंधित विषयों को सदन में उठाया।
सिंचाई, ग्रामीण आधारभूत संरचना, आदिवासी क्षेत्रों का विकास, किसानों की समस्याएं, रोजगार, क्षेत्रीय संपर्क, औद्योगिक विकास और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दे उनके संसदीय हस्तक्षेप के प्रमुख विषय रहे।
उनकी संसदीय शैली में अध्ययन, तथ्य, संयम और समाधानपरक दृष्टिकोण को विशेष स्थान मिला। वे संसद को केवल राजनीतिक बहस का मंच न मानकर जनसमस्याओं के समाधान और नीति निर्माण का महत्वपूर्ण माध्यम मानते रहे।
संसदीय समितियों में सक्रिय भागीदारी
श्री राम शकल ने विभिन्न संसदीय समितियों में भी सक्रिय भूमिका निभाई। श्रम एवं कल्याण संबंधी संसदीय समिति में रहते हुए उन्होंने असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों, खदान मजदूरों, अनुसूचित जाति एवं जनजाति समुदायों और श्रमिक कल्याण से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखी।
पेट्रोलियम एवं रसायन संबंधी संसदीय समिति में उनकी भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। ऊर्जा एवं खनिज संसाधनों से समृद्ध सोनभद्र का प्रतिनिधित्व करने के कारण ऊर्जा, औद्योगिक विकास और स्थानीय जनहित से जुड़े प्रश्न उनके लिए विशेष महत्व रखते थे।
इसके अलावा खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों से संबंधित सलाहकार समिति में भी उन्होंने भागीदारी की और ग्रामीण क्षेत्रों में आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता तथा गरीब परिवारों से जुड़े विषयों पर अपनी बात रखी।
सोनभद्र और पूर्वांचल के विकास को प्राथमिकता
सोनभद्र प्राकृतिक संसाधनों, ऊर्जा और खनिज संपदा से समृद्ध क्षेत्र है, लेकिन लंबे समय तक यहां के अनेक ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्र बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझते रहे। श्री राम शकल ने अपने संसदीय जीवन में इस विरोधाभास को लगातार रेखांकित किया।
उनका जोर रहा कि प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध क्षेत्र के लोगों को भी सड़क, बिजली, पेयजल, सिंचाई, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाओं का लाभ मिले।
उन्होंने संसद, संबंधित मंत्रालयों और प्रशासनिक स्तर पर क्षेत्र की विकास आवश्यकताओं को सामने रखने का प्रयास किया। उनका मानना रहा कि किसी भी क्षेत्र का वास्तविक विकास तभी संभव है, जब आधारभूत संरचना मजबूत हो और विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।
सड़क और ग्रामीण संपर्क पर जोर
सोनभद्र का बड़ा भूभाग पहाड़ी और वन क्षेत्र में आता है। ऐसे में अनेक गांवों तक बेहतर सड़क संपर्क लंबे समय से चुनौती रहा है। श्री शकल ने ग्रामीण संपर्क मार्गों, पुल-पुलियों तथा दूरस्थ क्षेत्रों को मुख्य मार्गों से जोड़ने की आवश्यकता को प्रमुखता दी।
उनके अनुसार सड़क केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि विपणन, रोजगार और प्रशासनिक पहुंच की आधारभूत कड़ी है। इसी सोच के साथ उन्होंने ग्रामीण संपर्क व्यवस्था को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
ग्रामीण विद्युतीकरण को भी उन्होंने विकास की बुनियादी आवश्यकता माना। उनका दृष्टिकोण था कि बिजली की उपलब्धता शिक्षा, कृषि, छोटे उद्योग और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
पेयजल और सिंचाई को बनाया प्रमुख जनसरोकार
सोनभद्र की भौगोलिक परिस्थितियों के कारण कई क्षेत्रों में पेयजल और सिंचाई की समस्या गंभीर रही है। श्री राम शकल ने इसे केवल विकास का मुद्दा नहीं, बल्कि सीधे जनजीवन से जुड़ा प्रश्न माना।
उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल सुविधाओं के विस्तार, हैंडपंपों की स्थापना एवं पुनर्स्थापन तथा जल उपलब्धता से संबंधित योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर दिया।
कृषि के लिए सिंचाई को आवश्यक मानते हुए उन्होंने कनहर सिंचाई परियोजना सहित क्षेत्र की प्रमुख सिंचाई योजनाओं को गति देने की आवश्यकता उठाई। उनका मानना था कि सिंचाई व्यवस्था मजबूत होने से कृषि उत्पादन बढ़ेगा, किसानों की आय में वृद्धि होगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
वंचित समाज की आवाज को प्राथमिकता
श्री राम शकल के सार्वजनिक जीवन की एक प्रमुख विशेषता यह रही कि उन्होंने सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की समस्याओं को लगातार प्राथमिकता दी। दलित, आदिवासी, किसान, श्रमिक, ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग उनके जनसरोकारों के केंद्र में रहे।
उनका विश्वास रहा कि लोकतंत्र की सफलता केवल चुनाव कराने से सुनिश्चित नहीं होती, बल्कि तब होती है जब समाज के अंतिम व्यक्ति को न्याय, सम्मान और विकास के समान अवसर प्राप्त हों।
राजनीति से आगे लोकसेवा की पहचान
श्री राम शकल के सार्वजनिक जीवन को केवल चुनावी उपलब्धियों या संसदीय पदों के आधार पर देखना उनके व्यक्तित्व को सीमित करना होगा। उनका लगभग पांच दशक लंबा सफर संगठन, समाज और संसद—तीनों क्षेत्रों में निरंतर सक्रियता का परिचायक है।
प्रचारक के रूप में संगठन और समाज के बीच काम करने से लेकर तीन बार लोकसभा सदस्य और छह वर्षों तक राज्यसभा के मनोनीत सदस्य के रूप में उन्होंने अलग-अलग भूमिकाओं में सार्वजनिक दायित्व निभाया।
उनकी पहचान एक ऐसे जनप्रतिनिधि के रूप में बनी, जिसने सादगी, अनुशासन, संवाद, संवैधानिक मर्यादा और जनसेवा को सार्वजनिक जीवन की आधारशिला माना।
निष्कर्ष
श्री राम शकल की यात्रा सोनभद्र के एक सामान्य ग्रामीण परिवार से शुरू होकर राष्ट्रीय संसद तक पहुंचने और लंबे समय तक सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहने की यात्रा है। यह यात्रा बताती है कि जमीनी स्तर पर निरंतर संपर्क, संगठनात्मक अनुशासन और समाज के प्रति प्रतिबद्धता किस प्रकार किसी व्यक्ति को राष्ट्रीय जिम्मेदारियों तक पहुंचा सकती है।
उनका सार्वजनिक जीवन इस विचार को रेखांकित करता है कि जनप्रतिनिधि की वास्तविक पहचान उसके पद से नहीं, बल्कि जनता के प्रति उसकी संवेदनशीलता, सार्वजनिक आचरण और जनहित के लिए किए गए कार्यों से होती है।
राष्ट्रसेवा, सामाजिक समरसता, संसदीय गरिमा और जनकल्याण के इन मूल्यों के साथ श्री राम शकल की सार्वजनिक यात्रा भारतीय लोकतांत्रिक जीवन में एक उल्लेखनीय अध्याय के रूप में देखी जा सकती है।