मतदाता सूची की शुद्धता, वास्तविक मतदाताओं के अधिकार और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर उठते सवाल
विशेष संपादकीय
मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों को लेकर ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाने वालों के व्यवहार पर सवाल उठाना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है वास्तविक मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा करना। लोकतंत्र में चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता सर्वोपरि है। यदि किसी पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची से छूट गया है, तो उसे सूची में शामिल कराने का पूरा अधिकार है। लेकिन इस समस्या के समाधान के बजाय यदि इसे राजनीतिक टकराव और अराजकता का माध्यम बनाया जाता है, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति होगी।
निर्वाचन आयोग द्वारा चलाए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक शुद्ध और अद्यतन बनाना है। मृत मतदाताओं के नाम हटाना, एक से अधिक स्थानों पर दर्ज नामों की जाँच करना तथा अपात्र प्रविष्टियों की पहचान करना किसी भी निष्पक्ष चुनावी व्यवस्था का आवश्यक हिस्सा है। हालांकि, इस प्रक्रिया में किसी वास्तविक और पात्र मतदाता का नाम गलती से हट जाए, तो उसकी शिकायत का त्वरित और निष्पक्ष समाधान भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए। मतदाता सूची की शुद्धता और नागरिक के मताधिकार की रक्षा—दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।
मताधिकार के प्रति जागरूकता जरूरी
भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में मताधिकार केवल एक संवैधानिक अधिकार नहीं, बल्कि नागरिक की लोकतांत्रिक भागीदारी का आधार भी है। इसलिए प्रत्येक नागरिक को समय-समय पर मतदाता सूची में अपना नाम जाँचना चाहिए। यदि नाम छूट गया है, तो निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार उसे जुड़वाने के लिए आवेदन करना चाहिए। शिकायत दर्ज कराने, आपत्ति प्रस्तुत करने और अपील करने की व्यवस्थाएँ इसी उद्देश्य से बनाई गई हैं।
यह अपेक्षा करना उचित नहीं कि किसी नागरिक का नाम सूची से हट जाने पर वह चुपचाप बैठा रहे। लेकिन यह भी सही नहीं कि प्रत्येक त्रुटि को बिना पर्याप्त प्रमाण के व्यापक चुनावी षड्यंत्र का प्रमाण मान लिया जाए। किसी भी गंभीर आरोप के समर्थन में तथ्य, दस्तावेज और विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक हैं।
मतदान के प्रति जागरूकता किसी एक धर्म, जाति या समुदाय की बपौती नहीं है। देश के विभिन्न सामाजिक और आर्थिक वर्गों के लोग अपने मताधिकार का उपयोग करते हैं। इसलिए किसी पूरे समुदाय को गैर-जिम्मेदार और किसी दूसरे समुदाय को अधिक जागरूक घोषित करना समस्या का समाधान नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि प्रत्येक नागरिक अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सजग बने।
जातिवाद और धर्मनिरपेक्षता का विरोधाभास
भारतीय राजनीति की एक बड़ी विडंबना यह है कि अनेक अवसरों पर जाति और समुदाय चुनावी विमर्श के केंद्र में आ जाते हैं, जबकि नागरिकता, राष्ट्रहित और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी जैसे व्यापक विषय पीछे छूट जाते हैं। कुछ लोग धर्म के प्रश्न पर उदासीन रहते हैं, लेकिन जातिगत पहचान को लेकर अत्यधिक संवेदनशील दिखाई देते हैं। राजनीतिक दल भी कई बार इसी प्रवृत्ति का लाभ उठाकर मतदाताओं को जाति और समुदाय के आधार पर संगठित करते हैं।
धर्मनिरपेक्षता का अर्थ किसी समुदाय विशेष के प्रति पक्षपात या विरोध नहीं, बल्कि सभी नागरिकों के प्रति समान व्यवहार है। इसी प्रकार, किसी समुदाय की राजनीतिक पसंद को उसके सभी सदस्यों की एक जैसी मानसिकता मान लेना भी उचित नहीं है। लोकतंत्र में नागरिक की पहचान और अधिकारों का सम्मान होना चाहिए, न कि उसे केवल किसी चुनावी गणित का हिस्सा बनाकर देखा जाना चाहिए।
मतदाता सूची में अनियमितताओं की निष्पक्ष जाँच हो
मतदाता सूची में यदि मृत व्यक्तियों के नाम, दोहरी प्रविष्टियाँ या ऐसे लोगों के नाम पाए जाते हैं जो कानूनी रूप से मतदान के पात्र नहीं हैं, तो नियमानुसार उनकी जाँच और आवश्यक कार्रवाई होनी चाहिए। इसी तरह, किसी पात्र भारतीय नागरिक का नाम गलत तरीके से हटाया गया हो, तो उसे बहाल करने के लिए प्रभावी व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिए।
यहाँ एक बुनियादी अंतर समझना आवश्यक है—किसी व्यक्ति का नाम सूची में होना और उसका मतदान के लिए कानूनी रूप से पात्र होना अलग-अलग प्रश्न हैं। किसी व्यक्ति को केवल उसके धर्म, भाषा, जातीय पहचान या अल्पसंख्यक होने के आधार पर न तो संदेह के घेरे में रखा जा सकता है और न ही उसे अनुचित संरक्षण दिया जा सकता है। पात्रता का निर्धारण कानून और प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए।
यदि किसी विदेशी नागरिक का नाम अवैध रूप से मतदाता सूची में दर्ज है, तो कानून के अनुसार उसकी जाँच होनी चाहिए। लेकिन किसी व्यक्ति को केवल उसके मूल, भाषा या समुदाय के आधार पर विदेशी घोषित करना भी उचित नहीं होगा। राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना ही कानून के शासन की कसौटी है।
SIR पर राजनीति या तथ्यों की पड़ताल?
विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर उठे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि कितने नाम हटाए गए, उनमें से कितने अपात्र थे और कितने वास्तविक मतदाताओं के नाम गलती से हटे। इन प्रश्नों का उत्तर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि निर्वाचन आयोग के आँकड़ों, पारदर्शी प्रक्रिया और स्वतंत्र जाँच से मिलना चाहिए।
यदि किसी राजनीतिक दल या संगठन को लगता है कि SIR के दौरान बड़े पैमाने पर अनियमितताएँ हुई हैं, तो उसे ठोस प्रमाण प्रस्तुत करने चाहिए। निर्वाचन आयोग से जवाब माँगना, संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक करने की माँग करना और कानूनी उपाय अपनाना लोकतांत्रिक अधिकार हैं। लेकिन केवल आरोपों के आधार पर पूरे आयोग को दोषी ठहराना या किसी समाचार रिपोर्ट को अंतिम सत्य मान लेना विवेकपूर्ण दृष्टिकोण नहीं कहा जा सकता।
दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया पारदर्शी हो, पात्र मतदाताओं को पर्याप्त अवसर मिले और शिकायतों का समयबद्ध निपटारा हो। चुनावी संस्था की विश्वसनीयता केवल आरोपों को खारिज करने से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जाँच और प्रमाण-आधारित जवाबदेही से मजबूत होती है।
लोकतंत्र में वास्तविक मतदाता ही निर्णायक
भारतीय लोकतंत्र में चुनावी जीत का आधार मतदाताओं का विश्वास होना चाहिए। यदि किसी दल को लगता है कि मतदाता सूची में सुधार से उसका चुनावी गणित प्रभावित होगा, तो उसे जनता के बीच अपने काम और नीतियों के आधार पर समर्थन हासिल करना चाहिए। इसी तरह, यदि कोई दल मतदाता सूची में गड़बड़ी का आरोप लगाता है, तो उसे प्रमाणों के साथ अपनी बात रखनी चाहिए।
यह दावा करना कि SIR के कारण किसी विशेष दल की जीत या हार निश्चित हो जाएगी, तब तक केवल राजनीतिक अनुमान है, जब तक उसके समर्थन में ठोस प्रमाण न हों। चुनावी परिणाम अनेक कारकों से प्रभावित होते हैं। इसलिए मतदाता सूची के पुनरीक्षण को किसी दल की जीत या हार से सीधे जोड़कर देखना वास्तविक मुद्दे से ध्यान भटकाने जैसा है।
अंततः, लोकतंत्र में न तो किसी पात्र नागरिक का मताधिकार छीना जाना चाहिए और न ही चुनावी प्रक्रिया को अपात्र मतदाताओं के नामों से प्रभावित होने दिया जाना चाहिए। इन दोनों उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कानूनसम्मत प्रक्रिया, पारदर्शिता और नागरिक जागरूकता अनिवार्य हैं।
निष्कर्ष: वोट की चिंता के साथ विवेक भी जरूरी
‘वोट चोरी’ जैसे गंभीर आरोपों को न तो बिना जाँच के स्वीकार किया जाना चाहिए और न ही वास्तविक शिकायतों को राजनीतिक शोर कहकर खारिज किया जाना चाहिए। सही रास्ता है—तथ्यों की जाँच, निर्वाचन आयोग की जवाबदेही, पात्र मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा और कानून के अनुसार अपात्र प्रविष्टियों को हटाना।
लोकतंत्र केवल मतदान के दिन अपनी उँगली पर स्याही लगवाने से मजबूत नहीं होता। इसके लिए नागरिकों को जागरूक, राजनीतिक दलों को जिम्मेदार और चुनावी संस्थाओं को पारदर्शी होना पड़ता है।
यदि मतदाता सूची में किसी का नाम छूटा है, तो उसे अपना अधिकार पाने के लिए आगे आना चाहिए। यदि गड़बड़ी हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए। और यदि किसी ने बिना प्रमाण के व्यापक धांधली का आरोप लगाया है, तो उससे भी तथ्यों के आधार पर जवाब माँगा जाना चाहिए।
आखिरकार, लोकतंत्र में केवल वोट की रक्षा ही जरूरी नहीं है; विवेक, निष्पक्षता और सत्य के प्रति प्रतिबद्धता की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है। क्योंकि जब राजनीति में तथ्यों की जगह आरोप और विवेक की जगह पूर्वाग्रह ले लेते हैं, तब सबसे बड़ा नुकसान लोकतंत्र का होता है।