वीरांगना रानी कित्तूर चेन्नम्मा: साहस, स्वाभिमान और स्वतंत्रता की अमर प्रतीक

कन्नड़ भूमि की वीरांगनाओं में अग्रिम पंक्ति में स्थान रखने वाली कित्तूर की रानी चेन्नम्मा स्वतंत्रता और स्वाभिमान की साक्षात प्रतिमूर्ति थीं। वे कित्तूर के प्रसिद्ध देसाई राजवंश के राजा मल्लसर्जा की छोटी रानी थीं। अपने छोटे-से राज्य की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए उन्होंने अंग्रेजों की विशाल सेना के विरुद्ध जिस साहस, वीरता और पराक्रम के साथ संघर्ष किया, उसने उन्हें अमर कीर्ति के शिखर पर पहुँचा दिया।

आज विस्तृत कर्नाटक के उत्तरी भाग के लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने के उद्देश्य से बेलगावी को राज्य की दूसरी राजधानी बनाया गया है। बेलगावी जिले का इतिहास अत्यंत गौरवशाली है। बेलगावी के किले के पत्थरों के बीच जब हवा बहती है, तो ऐसा लगता है मानो तलवारों की झंकार सुनाई दे रही हो। यहाँ के कण-कण में रानी चेन्नम्मा की वीरता आज भी जीवंत प्रतीत होती है।

रानी चेन्नम्मा का जन्म 23 अक्टूबर, 1778 को बेलगावी के निकट काकती नामक गाँव में हुआ था। बचपन से ही उन्होंने घुड़सवारी, तीरंदाजी और तलवारबाजी में निपुणता प्राप्त कर ली थी। कित्तूर के देसाई राजवंश के राजा मल्लसर्जा से विवाह के बाद वे कित्तूर की रानी बनीं। अपने छोटे-से राज्य की स्वतंत्रता और स्वाभिमान की रक्षा के लिए अंग्रेजों की विशाल सेना के विरुद्ध संघर्ष करने वाली यह वीरांगना आज भी हम सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

हम सामान्यतः भारत के स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत वर्ष 1857 से मानते हैं। लेकिन उससे लगभग 33 वर्ष पहले, वर्ष 1824 में ही इस वीरांगना ने ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध निर्भीक होकर मोर्चा खोल दिया था।

राजा शिवलिंगरुद्रसर्जा की मृत्यु उत्तराधिकारी के बिना हो जाने पर रानी चेन्नम्मा ने शिवलिंगप्पा को गोद लेकर अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। लेकिन धारवाड़ के कलेक्टर थैकरे ने इस गोद लेने की प्रक्रिया को अस्वीकार कर दिया और कित्तूर के राजकोष पर मुहर लगवा दी। रानी का यह संघर्ष किसी हठ का परिणाम नहीं था, बल्कि अपने अधिकारों की रक्षा का प्रश्न था!

ध्यान देने योग्य बात यह है कि रानी चेन्नम्मा ने सबसे पहले तलवार नहीं, बल्कि कलम उठाई। उन्होंने थैकरे, मुनरो और चैपलिन को समझौते और वार्ता के लिए पत्र लिखे। उन्होंने पड़ोसी रियासतों से भी सहायता माँगी। लेकिन जब शांति के सभी प्रयास विफल हो गए, तब उन्होंने अपनी रियासत की रक्षा के लिए सशस्त्र संघर्ष का मार्ग अपनाया।

23 अक्टूबर, 1824 को जब थैकरे की सेना ने कित्तूर के किले पर हमला किया, तब गुरु सिद्धप्पा के नेतृत्व में कित्तूर के वीर सैनिक अंग्रेजों पर टूट पड़े। रानी के अंगरक्षक अमटूर बालप्पा की गोली से थैकरे मारा गया। अंग्रेज अधिकारियों को बंदी बना लिया गया। लेकिन वार्ता का आश्वासन मिलने पर उन्हें रिहा कर देने के बावजूद अंग्रेजों ने अपना वचन नहीं निभाया और विशाल सेना के साथ दोबारा हमला कर दिया। अंततः कित्तूर को पराजय का सामना करना पड़ा। रानी चेन्नम्मा को उनकी बहुओं वीरम्मा और जानकीबाई के साथ बंदी बना लिया गया। बेलहोंगल में कैद के दौरान ही उनका निधन हो गया।

रानी चेन्नम्मा की गिरफ्तारी के बाद भी संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। उनके सेनापति संगोली रायन्ना ने अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई जारी रखी। अंततः उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया और 26 जनवरी, 1831 को फाँसी दे दी गई।

राष्ट्रभक्ति केवल नारे लगाने का नाम नहीं है; यह अपनी धरती के स्वाभिमान की रक्षा के लिए हर कीमत चुकाने को तैयार रहने का आदर्श है।

किले भले ही ढह गए, लेकिन लोगों के हृदय में स्वतंत्रता की आकांक्षा को कोई घेराबंदी समाप्त नहीं कर सकी। रानी चेन्नम्मा के संघर्ष की महत्ता केवल उनकी विजय में नहीं, बल्कि अन्याय के सामने सिर न झुकाने वाले उनके अटूट साहस में निहित है।

उनकी जयंती पर इस महान वीरांगना को स्मरण करने के साथ-साथ आइए, हम स्वतंत्रता, स्वाभिमान और राष्ट्र के सम्मान की रक्षा करने के अपने कर्तव्य को भी याद करें।

वीरांगना रानी कित्तूर चेन्नम्मा को उनकी जयंती पर शत्-शत् नमन! 🌺🙏

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