विश्वास के खंडहर पर खड़ी व्यवस्था:सन्नाटे में गूँजते सवाल और कठघरे में खड़ा नागरिक 

राजेश कुमार सिंह

नई दिल्ली -लोकतंत्र की बुनियाद किसी बहुमंजिला इमारत की तरह पत्थरों पर नहीं, बल्कि सरकार और नागरिकों के बीच ‘भरोसे’ के अदृश्य धागे पर टिकी होती है। जब यह धागा कमजोर होने लगता है, तो पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था हिल जाती है। समकालीन भारतीय परिदृश्य में समाज के एक बड़े वर्ग के भीतर पनपता असंतोष और सरकार के प्रति डगमगाता विश्वास किसी एक घटना की परिणति नहीं है। यह उन तमाम अनसुलझे सवालों, नीतिगत विरोधाभासों और अधूरी उम्मीदों का संचय है, जो लंबे समय से धरातल पर जवाब तलाश रहे हैं। एक जागरूक समाज में जनता का सत्ता से मोहभंग होना केवल एक राजनीतिक चुनौती नहीं, बल्कि पूरी शासन प्रणाली के लिए एक गंभीर चेतावनी है।

इस अविश्वास के केंद्र में सबसे पहली और गहरी चोट आर्थिक मोर्चे पर दिखाई देती है। बढ़ती महंगाई और बेरोज़गारी आज केवल सांख्यिकीय आंकड़े नहीं हैं, बल्कि हर आम परिवार की रोज़मर्रा की दर्दनाक हकीकत बन चुके हैं। जब एक पढ़ा-लिखा युवा रोजगार के लिए सालों-साल भटकता है और आम नागरिक को रसोई से लेकर बच्चों की पढ़ाई तक की बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, तो कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पर सवाल उठना लाजिमी है। इसके साथ ही, अमीर और गरीब के बीच चौड़ी होती आर्थिक खाई इस असंतोष को और गहरा कर देती है। जब समाज का एक बड़ा हिस्सा यह महसूस करने लगता है कि देश की आर्थिक नीतियां आम जनमानस के बजाय चंद बड़े कॉर्पोरेट और खास वर्गों के हितों को ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं, तो व्यवस्था के प्रति उसका समर्पण और विश्वास दोनों दरकने लगते हैं।

दूसरा गंभीर संकट हमारे सामाजिक ताने-बाने और नीतियों के आंतरिक विरोधाभास से उपजा है। आरक्षण,प्रतिनिधित्व और जातिगत राजनीति  के इर्द-गिर्द घूमती अंतहीन बहस ने समाज को एक ऐसे मुकाम पर ला खड़ा किया है जहां हर वर्ग खुद को उपेक्षित या असुरक्षित महसूस कर रहा है। जहां एक ओर हाशिए पर मौजूद समाज अपने अधिकारों, सुरक्षा और सटीक प्रतिनिधित्व (जैसे जातिगत जनगणना की मांग) को लेकर आशंकित है, वहीं दूसरी ओर सामान्य श्रेणी का एक बड़ा हिस्सा भी खुद को इस पूरी व्यवस्था की प्राथमिकताओं से बाहर पा रहा है। पहचान की इस राजनीति ने समुदायों के बीच की खाई को चौड़ा किया है। जब सरकारें इन सामाजिक टकरावों को थामने और एक सर्वसमावेशी माहौल बनाने में विफल रहती हैं, तो प्रशासनिक विफलता सीधे तौर पर सत्ता के इकबाल को कमजोर करती है।

इससे भी बढ़कर, लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख पर उठते सवाल सबसे चिंताजनक पहलू हैं। किसी भी जीवंत लोकतंत्र में संवैधानिक और स्वायत्त संस्थाओं की निष्पक्षता न्याय की आखिरी उम्मीद होती है। लेकिन पिछले कुछ समय में जिस तरह से इन संस्थाओं पर राजनीतिक नियंत्रण, एकतरफा कार्रवाई और स्वायत्तता के हनन के आरोप लगे हैं, उसने आम नागरिक के मन में एक गहरा संशय पैदा कर दिया है। जब लोगों को यह लगने लगे कि कानून की देवी की आंखें केवल एक तरफ देख रही हैं और जांच एजेंसियां राजनीतिक औजार मात्र बनकर रह गई हैं, तो पूरी न्याय प्रणाली से विश्वास कम होने लगता है।

व्यवस्था से यह अलगाव तब और चरम पर पहुंच जाता है जब चुनावी वादों की चकाचौंध और धरातल की हकीकत के बीच का अंतर साफ दिखने लगता है। चुनाव के समय किए गए बड़े-बड़े वादे—जैसे बेहतर और सस्ती शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं और पारदर्शी प्रशासन—जब ज़मीनी स्तर पर दम तोड़ते नज़र आते हैं, तो जनता ठगा हुआ महसूस करती है। पारदर्शिता का अभाव, जवाबदेही से बचने की प्रवृत्ति और स्थानीय स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार इस अविश्वास की आग में घी का काम करते हैं। नागरिक अब केवल नारों से संतुष्ट होने के मूड में नहीं है; वह अपने जीवन स्तर में वास्तविक बदलाव चाहता है।

सत्ता में बैठे कर्णधारों को यह बखूबी समझना होगा कि जनता का विरोध, प्रदर्शन या नाराजगी केवल तात्कालिक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं है। यह व्यवस्था को सुधारने और उसमें सुधार की गुंजाइश तलाशने की एक मूक पुकार है। सरकारों को अपनी प्राथमिकताओं का गंभीरता से पुनर्मूल्यांकन करना होगा। नीतियां केवल विज्ञापनों में या राजनीतिक विमर्श में नहीं, बल्कि ज़मीनी स्तर पर न्यायसंगत और पारदर्शी दिखनी चाहिए। भरोसा एक ऐसी पूंजी है जिसे केवल खोखले दावों से नहीं, बल्कि निरंतर संवाद, संवेदनशीलता और पूरी तरह से निष्पक्ष शासन प्रणाली से ही दोबारा कमाया जा सकता है। समय रहते शासन और नागरिक के बीच की इस बढ़ती खाई को पाटना न केवल मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान के लिए, बल्कि हमारे लोकतांत्रिक भविष्य के अस्तित्व के लिए भी बेहद अनिवार्य है।

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