एक दिन कौवे की सभा आम हुई
एकता पर चर्चा खुले आम हुई॥
हमे खूब मूर्ख बनाया जाता है
झूठी प्रसंशा कर
हमारे मूंह का निवाला सियार लूट ले जाता है॥
कोयल भी हमें खूब उल्लू बनाता है
हमारे ही घोंसले मे अण्डा दे जाता है
और हम परवरिश कर उनका वंश बढ़ाता है॥
हम केवल एकता के नाम पर चिल्लाते है
सिर्फ किसी के मरने पर ही कांव – कांव कर एकजुटता दिखाते है॥
झूंझलाते हुए कौवे के सरदार बोला-इन सब बातों मे नही है दम
चौकन्ना और कौशल मे सभी पक्षियों से आगे है हम॥
उड़ते- उड़ते कुएँ के पास रखा घड़ा देख लेते है
थोड़े पानी को भी घड़ा से ऊपर निकाल पी लेते है॥
इतने मे आखेटक एक तीक्ष्ण बाण चलाया
खून से लथपथ एक कौवा जमीन पर छटपटाया॥
सभी कांव- कांव कर जोरदार एकता दिखलाया
हुआ वही ढ़ाक के तीन पात, फिर सभी अपने- अपने स्वार्थ मे समाया॥
पवन कुमार शर्मा (शिक्षक)