वह जो, संस्कृत-पालि-प्राकृत-अपभ्रंश-
अवहट्ट जैसे पड़ाव पार करते हुए अपनी आधुनिक, वैज्ञानिक तथा परिष्कृत वेशभूषा में अपनी चमक-दमक एवं धमक लिए विकास के सर्वांगीण आयामों को छू रही है।
वह जो, अपनी अनुभवी किंतु विश्रांति से दूर आंखों से कई भौगोलिक सीमाओं के परिसीमन, समायोजन एवं परिवर्तन की ना सिर्फ साक्षी रही, किंतु उसकी सटीक, मार्मिक एवं तार्किक व्याख्या भी कर चुकी है, कर रही है एवं निसंकोच करती रहेगी। तथा वह जो, कितने निरंकुश शासकों, तानाशाहों के आक्रमण के दंश एवं उन सरफिरो के पतन को कह रही है, कितने वीर जवानों के अद्भुत एवं अदम्य साहस का शब्द मात्र से सजीव चित्रण कर रही है।
और हां वह जो जीवन के हर भाव, हर स्थिति, हर रंग एवं हर विधा को विभिन्न माध्यमों से चाहे दृढ़ गद्य हो,चाहे लचकदार पद्य या गूढ़ अनुभव लिए आत्मकथा या दक्ष विद्वान द्वारा कही गई जीवनी या विशेष अनुभवों एवं यादो को समेटे संस्मरण या चित्रण के लिए आतुर एकांकी दर्शाते हुए….
हां वह जो हारते हुए पलों में भी जीतने की शक्ति दे जाए, या जीवटता से सराबोर कर दे या जो सुनिश्चित करें कि दुर्लभ कुछ भी नहीं है, अगम्य कुछ भी नहीं, अपरिहार्य कुछ भी नहीं है, अविजित कुछ भी नहीं है, अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, अनभिक्त कुछ भी नहीं, विचलित कुछ भी नहीं है……..
ये ही तो है हिंदी…..
मेरी मातृभाषा
शत-शत नमन
विश्वास राणा “GYPSY”