यूजीसी के नये नियमन से उबाल क्यों है

यूजीसी के नये नियमन से उबाल क्यों है

राधा रमण
यूजीसी यानी यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) ने शायद सोचा भी
न होगा कि 13 जनवरी 26 को जारी उसके नये नियमन (रेगुलेशन) से देशभर में
उबाल हो जाएगा। उसने तो नया नियमन सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद लागू किया
था, लेकिन समाज का एक धड़ा उद्वेलित हो उठा है। सरकार बहादुर चुप हैं और
शिक्षा मंत्री मूकदर्शक। यहां तक की विपक्ष की भी बोलती बंद है, लेकिन विरोध बढ़ता
ही जा रहा है। उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने
अपने पद से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी है तो मूर्धन्य कवि कुमार विश्वास ने
दिवंगत कवि रमेश रंजन मिश्र की कविता का उल्लेख करते हुए कहा है कि
‘चाहे तिल लो या ताड़ लो राजा,
राई लो या पहाड़ लो राजा ;
मैं अभागा सवर्ण हूं, मेरा
रोयां-रोयां उखाड़ लो राजा।‘
दरअसल, वर्ष 2019 में हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला और महाराष्ट्र की
एक महिला चिकित्सक डॉ पायल तडवी ने जातीय उत्पीड़न से तंग होकर आत्महत्या
कर ली थी। नतीजतन, सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी को ऐसा नियमन बनाने का निर्देश
दिया था, जिससे कॉलेज में पढ़ाई के दौरान छात्रों का उत्पीड़न रोका जा सके। इसी
दौरान आईआईटी ने एक स्टडी की जिसमें पाया गया कि ‘वंचित जातियों के 75
प्रतिशत छात्र कॉलेज में भेदभाव का शिकार होते हैं।‘
ऐसा नहीं है कि विश्वविद्यालयों में जातीय आधार पर छात्रों के उत्पीड़न रोकने के
लिए पहले से नियम नहीं थे। साल 2012 में हिमाचल प्रदेश में रैगिंग के दौरान एक
छात्र की हत्या के बाद 17 दिसंबर 2012 से यूजीसी ने मान्यता प्राप्त सभी
विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में रैगिंग और उत्पीड़न रोकने के लिए नियम तय किये
थे। ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस’ नाम के नियम
सिर्फ सुझाव और जागरूकता के लिए थे। उसमें सजा का कोई प्रावधान नहीं था।
लेकिन शिकायत झूठी पायी जाने पर जुर्माना और दंड का प्रावधान अवश्य था।
अधिकांश मामलों में रैगिंग करने या उत्पीड़न की शिकायत मिलने पर संस्थान द्वारा
चेतावनी देकर छोड़ दिया जाता था। दोबारा शिकायत मिलने पर उत्पीड़न करने वाले

छात्रों के अभिभावक को कॉलेज प्रशासन पत्र भेज दिया करता था और मामला सुलझ
जाता था। कॉलेज प्रशासन की मनाही के बावजूद शिक्षण संस्थानों में रैगिंग चोरी-छुपे
होती रहती थी। आज भी जारी है। पहले छात्रों के बीच इतनी कटुता भी नहीं होती थी।
इसका मकसद छात्रों के बीच हास-परिहास करना होता था।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और यूजीसी के नियमन
पिछले साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी को कॉलेजों में जातीय भेदभाव की
शिकायतों का डाटा इकठ्ठा करने तथा नया नियमन बनाने का निर्देश दिया था।
उसके बाद यूजीसी ने फीडबैक लेने के लिए एक ड्राफ्ट जारी किया, जिस पर ओबीसी
के छात्रों ने आपत्ति जताई और एससी-एसटी छात्रों के साथ ओबीसी के छात्रों को भी
जांच समिति में शामिल करने की मांग की। इससे पहले दिसंबर 25 में संसद की
शिक्षा, महिला, बाल और युवा संबंधी मामलों की संसदीय समिति ने यूजीसी और
सरकार को सौंपी अपनी रिपोर्ट में समता समिति में ओबीसी को शामिल करने की
सिफारिश कर दी। इस समिति के अध्यक्ष मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और
राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह हैं। अपने ड्राफ्ट के विश्लेषण, ओबीसी छात्रों की मांग
और संसदीय समिति की सिफारिश के आधार पर यूजीसी ने इस साल 13 जनवरी को
नये नियमन की अधिसूचना जारी कर दी। दो दिन बाद 15 जनवरी से यूजीसी से
मान्यताप्राप्त कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में नये लागू कर दिये गए हैं।
नये नियमन में क्या है खास
1. नये नियमन के तहत यूजीसी से मान्यताप्राप्त हर कॉलेज में इक्वल अपारच्युनिटी
सेंटर यानी समता समिति (इओसी) की स्थापना अनिवार्य कर दी गयी है। समिति
में एससी, एसटी, विकलांग, महिला के अलावा ओबीसी के सदस्य होंगे। इनका
कार्यकाल दो वर्षों का होगा। विशेष आमंत्रित सदस्यों में भी उन्हीं वर्गों के सदस्य
होंगे। हालांकि उनका कार्यकाल एक वर्ष का होगा। अध्यक्ष कॉलेज के प्राचार्य होंगे।
2. नये नियमन के तहत शिकायत मिलने के बाद समिति की रिपोर्ट पर कॉलेज के
प्राचार्य अथवा यूनिवर्सिटी के उप कुलपति एक्शन लेंगे। जिसके खिलाफ शिकायत
होगी उसकी डिग्री रोक दी जाएगी, आपराधिक मुकदमा चलाया जाएगा और
आर्थिक दंड लगाया जाएगा। शिकायत झूठी होने पर भी शिकायतकर्ता के खिलाफ

कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। पहले गलत शिकायत करने पर आर्थिक दंड लगाया
जाता था, जिसे अब समाप्त कर दिया गया है।
3. हर कॉलेज में एक इक्विटी स्क्वायड नाम की एक संस्था बनायी जाएगी जिसका
काम कॉलेज में निगरानी करना और जाति के आधार पर भेदभाव को रोकना
होगा। ख़ास बात यह कि जाति आधारित भेदभाव में केवल एससी, एसटी और
पिछड़ी जाति के लोग आएंगे।
4. शिकायत आने पर समता समिति को 24 घंटे के भीतर बैठक बुलाकर 15 दिनों
में कॉलेज प्राचार्य को कार्रवाई की सिफारिश करनी होगी। प्राचार्य 7 दिनों के भीतर
उप कुलपति को रिपोर्ट करेंगे।
5. समता समिति को हर साल यूजीसी को कार्रवाई रिपोर्ट देनी होगी।

विरोध का कारण
विरोध का बड़ा कारण यह है कि समता समिति में एससी, एसटी, विकलांग, महिला और
ओबीसी सदस्य होने के कारण उनके छात्रों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो सकेगी, बल्कि
उस समुदाय का शिकायतकर्ता होने के कारण अगड़ी जाति (भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत और
कायस्थ) के छात्र हमेशा निशाने पर रहेंगे। उनका पक्ष भी नहीं सुना जा सकेगा। नौकरियों में
आरक्षण लागू होने के कारण नौकरियां पहले ही उनके हाथ से निकल गईं, अब पढ़ाई करना
भी उनके लिए दुष्कर हो जाएगा। फिर, यदि उन पर आपराधिक मुकदमा दर्ज कर लिया
जाता है तो उनका भविष्य बर्बाद हो जाएगा। सामाजिक कार्यकर्ता सूर्यकेश्वर सिंह इसे समाज
के लिए आत्मघाती कदम बताते हैं।
इसे लेकर करणी सेना ने देशव्यापी विरोध का ऐलान किया है। उत्तर प्रदेश, राजस्थान और
दिल्ली में अगड़ी जाति के छात्रों ने विरोध करना शुरू कर दिया है। कॉलेजों में उथल-पुथल है,
विरोध प्रदर्शन जारी है। भाजपा में अगड़ी जाति, जो पार्टी का कोर वोटर रहा है के तीसरी-
चौथी पंक्ति के नेताओं ने इस्तीफा देना शुरू कर दिया है। एनडीए और राष्ट्रीय स्वयं सेवक
संघ (आरएसएस) का कोई बड़ा नेता मुंह खोलने को तैयार नहीं है। ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ का नारा
देने वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी इस मुद्दे पर मौन हैं। विपक्ष भी
हक्का-बक्का है। उसे अपने वोट बैंक की चिन्ता है। हां, विरोध करने वालों की सूची में प्रखर
हिन्दू नेता प्रवीण तोगड़िया जरूर शामिल हो गए हैं। हालांकि तोगड़िया की हनक अब पहले
की तरह नहीं है। उधर, छात्रों का आंदोलन बढ़ता ही जा रहा है। फिलहाल, पिछड़ी और वंचित
जाति के छात्रों की प्रतिक्रिया नहीं आयी है। अगर वह भी मुखर हो गए तो कौन रोकेगा।

अगर, समय रहते इस पर पुनर्विचार नहीं किया गया तो विरोध की आग ज्वालामुखी बन
सकती है।

Leave a Comment