मेरा नायक

— एक शिक्षक और उसके विद्यार्थी की समानांतर यात्रा

“समुद्र की अथाह गहराई और पहाड़ों की शांत ऊँचाई में एक अद्भुत समानता है—दोनों को जीतने के लिए साहस, धैर्य और अटूट विश्वास चाहिए।”

आज अरुणाचल प्रदेश की शांत वादियों में स्थित अपने विद्यालय के प्रधानाचार्य कक्ष में बैठा हूँ। बाहर बच्चों की चहल-पहल है, लेकिन मन अचानक तेरह वर्ष पीछे चला जाता है—गुजरात के भावनगर स्थित जवाहर नवोदय विद्यालय के उस छात्रावास में, जहाँ एक मुलाक़ात ने मेरे शिक्षक जीवन का अर्थ ही बदल दिया था।

जनवरी 2013 की बात है।

मैं एक युवा, उत्साही और सपनों से भरा पीजीटी जीवविज्ञान शिक्षक तथा हाउस मास्टर बनकर अपनी पहली नियुक्ति पर पहुँचा था। मन में यह विश्वास था कि मैं बच्चों को विज्ञान पढ़ाऊँगा, उन्हें अच्छे अंक दिलाऊँगा और उनका भविष्य सँवारूँगा।

लेकिन जीवन ने मेरे लिए एक अलग ही पाठ तैयार कर रखा था।

उसका नाम था अजय मायड़ा।

कक्षा नौ का वह दुबला-पतला, शांत और संकोची बालक बचपन में ही अपने पिता को खो चुका था। पिता का साया उठने के बाद उसके भीतर एक गहरा सन्नाटा घर कर गया था। पढ़ाई में पिछड़ता जा रहा था, किसी से खुलकर बात नहीं करता था और हमेशा सहमा-सहमा रहता था।

उसकी यही चुप्पी कुछ वरिष्ठ छात्रों के लिए उसे प्रताड़ित करने का कारण बन गई। छात्रावास में जब भी कोई सामान गुम होता, बिना किसी प्रमाण के उँगली उसी पर उठ जाती। धीरे-धीरे उस मासूम बच्चे पर “चोर” का ऐसा ठप्पा लगा दिया गया कि उसने स्वयं भी अपने अस्तित्व पर विश्वास खोना शुरू कर दिया।

एक सर्द रात छात्रावास का निरीक्षण करते हुए मैंने उसे ट्रंक रूम के पीछे अकेले बैठकर चुपचाप रोते देखा।

उसकी आँखों में आँसू ही नहीं थे, उम्मीद भी मर चुकी थी।

मैं उसके पास जाकर उसी ठंडी ज़मीन पर बैठ गया।

धीरे से कहा—

“अजय, मेरी तरफ देखो। लोग तुम्हारे बारे में क्या कहते हैं, उससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं जानता हूँ कि तुम कौन हो। मुझे तुम पर विश्वास है… और जब तक मैं हूँ, तुम्हें अकेले लड़ने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।”

शायद उसी रात मेरे भीतर का शिक्षक बदल गया।

उस दिन के बाद मैं केवल जीवविज्ञान पढ़ाने वाला शिक्षक नहीं रहा।

मैं उसके लिए एक संरक्षक बन गया।

अगले चार वर्षों तक, 2017 में उसके विद्यालय छोड़ने तक, हमने साथ-साथ संघर्ष किया।

जब भी कोई उसे अपमानित करता, मैं उसके साथ खड़ा होता।

जब उसका आत्मविश्वास टूटता, हम देर रात तक बैठकर पढ़ाई करते।

मैं उसे केवल जीवविज्ञान नहीं पढ़ाता था; मैं उसे यह विश्वास दिलाने की कोशिश करता था कि किसी इंसान की परिस्थितियाँ उसके भविष्य का निर्णय नहीं करतीं।

धीरे-धीरे बदलाव दिखाई देने लगा।

उसकी झिझक कम होने लगी।

उसकी आवाज़ में आत्मविश्वास लौट आया।

उसकी आँखों का डर दृढ़ संकल्प में बदलने लगा।

2017 में जब अजय ने जवाहर नवोदय विद्यालय, भावनगर से विदाई ली, तब वह वही डरा-सहमा बालक नहीं था जिसे दुनिया ने ठुकरा दिया था। अब उसके भीतर अपने सपनों को सच करने का साहस था।

विद्यालय से निकलने के बाद हमारी राहें अलग हो गईं, लेकिन संघर्ष और मेहनत हमारे साझा साथी बने रहे।

अजय ने उच्च शिक्षा प्राप्त की और अथक परिश्रम के बाद मर्चेंट नेवी में अधिकारी बनने का अपना सपना साकार किया।

मैंने भी शिक्षा के क्षेत्र में अपनी यात्रा जारी रखी। वर्ष 2023 में मुझे जवाहर नवोदय विद्यालय में प्रधानाचार्य के रूप में कार्य करने का अवसर मिला। असम के सिलचर में मेरी पहली नियुक्ति हुई, जहाँ वर्षों से लंबित विद्यालय की भूमि अतिक्रमण की जटिल समस्या के समाधान की जिम्मेदारी मिली। धैर्य, संवाद और सामूहिक प्रयासों से उस चुनौती का समाधान संभव हुआ। बाद में मैंने स्वेच्छा से देश के अत्यंत दुर्गम क्षेत्र, अरुणाचल प्रदेश, में सेवा देना चुना, जहाँ आज भी शिक्षा को समाज परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम मानकर कार्य कर रहा हूँ।

कुछ दिन पहले मेरे मोबाइल पर अजय का संदेश आया।

उसने अपनी एक तस्वीर भेजी थी।

सफेद वर्दी में, एक विशाल जहाज़ के डेक पर खड़ा, आत्मविश्वास से भरा हुआ।

मैं देर तक उस तस्वीर को देखता रहा।

मेरी आँखें नम हो गईं।

इसलिए नहीं कि वह अधिकारी बन गया था।

बल्कि इसलिए कि वह वही इंसान बन गया था, जिसकी क्षमता पर मैंने तेरह वर्ष पहले विश्वास किया था।

उसी क्षण मन में कुछ पंक्तियाँ स्वतः उतर आईं—

“अँधियारी रातों में जो विश्वास का लंगर डाला था,

वही आज जीवन की दिशा दिखाने वाला कम्पास बन गया।

तुमने अथाह समुद्रों को अपना मार्ग बनाया,

और मैंने कठिन पहाड़ों के बीच अपना कर्तव्य निभाया।”

लोग अक्सर कहते हैं कि मैंने अजय का जीवन बदल दिया।

लेकिन सच इससे कहीं अधिक सुंदर है।

अजय ने भी मेरा जीवन बदल दिया।

उसने मुझे सिखाया कि शिक्षा केवल ज्ञान देने का माध्यम नहीं है; यह किसी टूटे हुए बच्चे के भीतर विश्वास जगाने की सबसे बड़ी शक्ति है।

आज मैं एक प्रधानाचार्य हूँ।

मेरे पास पद है, जिम्मेदारियाँ हैं और अनेक प्रशासनिक उपलब्धियाँ भी हैं।

लेकिन यदि कोई मुझसे पूछे कि मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है, तो मेरा उत्तर केवल एक होगा—

अजय मायड़ा।

क्योंकि किसी शिक्षक की सबसे बड़ी सफलता उसके पद, पुरस्कार या प्रमोशन से नहीं मापी जाती।

उसकी सबसे बड़ी पहचान उन विद्यार्थियों से होती है, जिनके जीवन में उसने विश्वास का एक दीप जला दिया।

आज अजय दुनिया के महासागरों को नाप रहा है।

मैं भारत के सुदूर पहाड़ों में बच्चों के भविष्य को सँवारने का प्रयास कर रहा हूँ।

हमारी मंज़िलें अलग हैं।

लेकिन हमारी यात्रा का आधार एक ही है—

विश्वास।

और जब भी मैं उस सफेद वर्दी में मुस्कुराते हुए अपने उस विद्यार्थी की तस्वीर देखता हूँ, तो मन गर्व से भर उठता है।

आज वह केवल मेरा विद्यार्थी नहीं है।

अजय मायड़ा मेरा नायक है।

विश्वास राणा प्रधानाचार्य 

जवाहर नवोदय विद्यालय बीकाम

अरुणाचल प्रदेश 

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