मूर्ति स्थापना का ये स्वप्न नहीं ! “संकल्प” है हमारा !

प्रिय मित्रों ! भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम महानायक अमर शहीद मंगल पांडे जी की १९५ वीं जयंती पर सर्व प्रथम मै उनके श्रीचरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूँ ! सन् १८५७ की क्रांति के संदर्भ में तद्कालीन फिरंगियों की यही मान्यता बन चुकी थी कि भारतीय जनमानस सदैव ही उच्चतम आदर्शवान महापुरुषों के पदचिह्नों पर चलता है ! और यह विडम्बना ही है कि इसके बिलकुल विपरीत वामपंथी इतिहासकारों के द्वारा क्षेपित ! अर्थात भारतीयता के विरोधी और कम्यूनिस्ट अर्थात जेएनयू के अंधबुद्धिजीवियों के कारण आज बराक उपत्यका के मंगल पांडे चौक पर उनकी मूर्ति स्थापना की योजना विलम्बित होती जा रही है, मैं समझता हूँ कि इसे ऐतिहासिक दर्पण में देखने की भी आवश्यकता है।
इसके मूल में दलितों के कन्धों पर बन्दूक रखकर फिरंगियों ने समूचे हिन्दू और मुस्लिम समुदाय को केवल क्रिश्चियन बनाने के लिये तद्कालीन अविभाजित बंगाल के कलकत्ता में सन् १८५२ के आसपास कारतूस फैक्ट्री प्रारम्भ की थी जिसमें दलित, आदिवासी संथाल एवं कुछेक मुस्लिमों के द्वारा गोलियों का निर्माण कराया जाता था।और इन लोगों को स्वयं ही यह नहीं पता था कि इन कारतूसों में गन-पाउडर के अलावा और क्या-क्या मिलाया जाता है।
ये वो कालखण्ड था जब मुगलिया सल्तनत के बचे खुचे चाटुकार ऐश ओ आराम में डूबकर बहादुर शाह जफर के हाथों इस्ट इंडिया कम्पनी के टुकड़ों पर हरम में मजबूर हिन्दू अपहृत बच्चियों के साथ जाम ऐ शेर पीने पिलाने में मदहोश थे ! और तब भी भारतीय जनमानस बहादुर शाह जफर नाम की कठपुतली को ही सुल्तान समझता था, और कुछ ऐसा ही हम यहाँ बराक उपत्यका के सभी निवासी येन केन प्रकारेण कम्यूनिस्टों के लिखे इतिहास के गुलाम बनकर अपने स्वर्णिम भूतकाल को भुलाकर मुगलों को और उनके साथ-साथ मिशनरियों अर्थात चर्च की भाषा मे रट चुके हैं।
मित्रों ! प्रत्येक समुदाय में आर्थिक संकट और बेरोजगारी के शिकार पहले भी लोग थे और आज भी हैं ! तद्कालीन इस्ट इंडिया कम्पनी का मुख्य कार्य था भारतीय सम्पत्ति को लूटना ! खनिज,मवेशियों और जंगलों को लूटकर धन इकट्ठा कर विदेश भेजना ! और ऐसा ही कांग्रेस सरकार के लोगों ने भी किया ! जो छोटे चोर होते हैं वे दिल्ली में बंगला और पैसे रखते हैं और बडे चोर दुबई में दुबकने की तैयारी करते हैं ।
खनिज सम्पदा का दोहन करने हेतु विशाल इम्फ्राइस्ट्रचर की आवश्यकता को देखते हुवे बुद्धिमान लुटेरे शेरशाह शूरी के इतिहास से शिक्षा लेकर इस्ट इंडिया कम्पनी ने बडे छोटे पुल और सडकों को बनवाकर आदिवासी क्षेत्रों को भी लूटना प्रारम्भ किया ! हमारे आदिवासी समुदाय ने उनकी घृणित मंशा को पहचान लिया और ३० जून १८५५ को संथाल (झारखंड) के लोगों ने हमारी संथाली महिलाओं के नेतृत्व में इस्ट इंडिया कम्पनी के विरुद्ध आवाज उठायी ! और तब फिरंगियों ने उन कबीलों के-चांद,भैरव,सिद्धू और कान्हू मूर्मू नामक चार आदिवासी समुदाय के सरदार के सगे भाईयों की धोखे से हत्या कर दी।
मंगल पांडे जी की विचारधारा भारतीय संस्कृति के मूल्यों पर केंद्रित थी ! वो युवा थे ! एक हिन्दू और ब्राम्हण होना उनके संस्कारों में था ! एक धार्मिक,नित्य-प्रति पूजा-पाठ करने वाले परिवार की सन्तान थे वे ! आपके पिता गांव के मन्दिर के पुजारी थे ! आप देखो– मंगल पाण्डे जी के प्रत्येक प्राप्त चित्र में उनके मस्तक पर त्रिपुण्ड और ह्रदय स्थल पर यज्ञोपवीत सुशोभित दिखता है ! और यही बात कम्यूनिस्टों और कांग्रेस को चुभती है। मंगल पांडे जी कहीं कहीं हिन्दुओं में व्याप्त जाति प्रथा के विरोधी थे वे ! मेरठ छावनी से लेकर बैरकपुर तक वे नित्य प्रति अपने साथियों के साथ-“श्रीमद्भगवद्गीता,शिव पुराण,राम चरित मानस” पर चर्चा करते थे ! उनके साथी उनके धार्मिक स्वभाव के प्रशंसक थे। कदाचित् इसी कारण वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अर्वाचीन सेक्युलर-“कार्टून-जीवी” लोगों को ऐसे चुभे कि उनके प्रति जनमानस को सदैव ही भ्रमित किया ! और अभी भी कर रहे हैं।
मैं समझता हूँ कि भारत वर्ष के सभी “नगरीय क्षेत्रों” में रहने वाले सवर्ण ! वे असमिया,बांग्ला अथवा कि हिन्दी भाषी समुदाय के हों इससे कोई भी फर्क नहीं पड़ता ! इनमें असुरक्षा की भावना रहती है ! ये साहुकार लोग हैं ! इनकी साहुकारी ने ही देश को गुलाम बनाया भी और रखा भी ! और दूसरी तरफ ग्रामीण अंचल में,आदिवासी क्षेत्रों में,चाय बागानों में रहने वाले सवर्णों में पहले से ही धार्मिकता के साथ-साथ शिक्षा के प्रति भी आकर्शण था ! उन्होंने थोडी बहुत शिक्षा ली और सेना इत्यादि में आ गये ! ऐसे ही हमारे मंगल पांडे जी भी थे।
वर्तमान परिवेश,परिदृश्य और हिन्दु समाज की स्थिति बराक उपत्यका में देखते हुवे ये सिद्ध होता है कि मंगल पांडे जैसे अद्भुत व्यक्तित्व की जीवनी और मूर्ति स्थापना समय की आवश्यकता है ! मित्रों ! ये कहने के पीछे मेरा मन्तव्य बिलकुल स्पष्ट है कि-“मंगल पांडे” जी एक ऐसे कुलीन योद्धा थे जो सभी जाति-पाति के साथियों को समान दृष्टि से देखते थे ! वे समाज के-” ब्राम्हण,क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र इन सभी के साथ अर्थात ब्राम्हण और नाॅन ब्राम्हण दोनों के प्रतिनिधि थे।
इसका ऐतिहासिक प्रमाण इस्ट इंडिया कम्पनी के का गजट स्वयं ही दबे छुपे शब्दों में स्वीकार करता है कि कलकत्ता की कारतूस फैक्ट्री में बनते गाय और सुवर की चर्बी से लेमीनेटेड कारतूस इसीलिये बनाये जाते थे कि कट्टर धार्मिक हिन्दूओं को जब कभी पता चलेगा कि उन्होंने तो प्रकारान्तर से गौ मांस मुख से स्पर्श कर ही लिया ! धर्म भ्रष्ट तो हो ही गये ! तो उनको क्रिश्चियन बनाना आसान होगा।
आप सभी जानते हैं कि अर्वाचीन भारतवर्ष में चर्मकार्य एवं स्वक्षतादि में दक्षता प्राप्त व्यक्ति को-“चर्मकार,भंगी,मेहतर”आदि उपनाम दिये गये थे ! इस संदर्भ में अपने स्वयं के जीवन का एक उदाहरण रखना प्रासंगिक होगा ! लगभग ५० वर्ष पूर्व तब मैं गुजरात में बहुदक सन्यासी जीवन में था,राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सम्बद्ध था ! कदाचित्-“कलोल”नामक गांव में हमारे एक वरिष्ठ स्वयंसेवक थे  मेरा उनके घर रात्रि विश्राम था, प्रातः जब मैं उठा तो देखा कि वो और घर की महिलाएं घर पर नहीं हैं ! लगभग आठ बजे वे लोग आये ,तत्काल स्नान करने के उपरांत मेरे पास आये और चाय के साथ रोटी भी ! मैं बोला इतनी सुबह कहाँ गये थे ? वे बोले मैं गांव का-“मेहतर” हूँ ! झाडू लगाकर,कूडा फेंककर,दो मृत पशुओं को ठिकाने लगाने के बाद-“संघ की शाखा” से अभी आया ! और औरतें मैला फेंकने गयी थीं !  सच कहता हूँ मेरा ह्रदय और मस्तिष्क ही नहीं अपितु समूचा व्यक्तित्व उन सभीके श्रीचरणों में ऐसा झुका कि आजीवन उन कर्मयोद्धाओं का ॠणी रहूँगा।
बिलकुल इसी प्रकार कलकत्ता गन फैक्ट्री में-“मातादीन भंगी”नामक एक महान व्यक्ति थे ! जिन्हें वहाँ कारतूस निर्माण में लगाया गया था ! वे वहां की घृणित सच्चाई जान चुके थे ! और मेरठ छावनी उनको कारतूस लेकर वहां देने के लिये भेजा गया था ! सायंकाल मन्दिर में सामूहिक आरती के पश्चात जब मंगल पांडे जी साथियों के साथ राम चरित मानस पढ रहे थे उसी अवसर पर मातादीन जी ने उनके समक्ष कलकत्ता फैक्ट्री की सच्चाई बता दी कि किस प्रकार वहाँ से हमारे धर्म को भ्रष्ट करने का षड्यंत्र ये-“फिरंगी” कर रहे हैं ! और फिर-
“जिस हिन्दू का खून न खौला,खून नहीं वो पानी है।
देश धर्म  के काम न आयी, वो बेकार  जवानी   है॥”
पूरी रात ग्लानि की आग में झुलसते अपने साथियों के साथ सुबह सुबह जब सैनिकों को ट्रेनिंग के लिये-“चांद मारी”में  बन्दूक में कारतूस भरने को दिये गये ! जो गाय और सुवर की चर्बी से लेमीनेटेड थे ! जिन्हें दांतों से खोलना था ! और ! मंगल पाण्डे ने ऐसा करने से इनकार कर दिया ! अंग्रेज ऑफिसर के डांटने पर अपनी बन्दूक उसपर तान दी ! और गरज कर बोले- साथियों ! “फिरंगी को मारों !”,”भारत माता की जय” ये वो आवाज थी जिसकी प्रतिध्वनि ने समूचे देश को जगाती हुयी सात समंदर पार अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला कर रख दी।
किन्तु दुर्भाग्य है हम बराक उपत्यका के गुलाम लोगों का जिन्होंने वो आवाज नहीं सुनी ! हमारे विद्वान बुद्धिजीवी वर्ग ने,हमारे जन प्रतिनिधियों,हिन्दी,बांग्ला,असमिया भाषी लोगों को वो आवाज नहीं सुनाई दी ! हमारे राजनैतिक दल,स्थानीय संघ के लोगों,भारत सेवा आश्रम,हमारे डाक्टर,शिक्षक,पत्रकार,हमारे विद्यार्थी और हमारे यशस्वी मुख्यमंत्री जी ने नहीं सुनी ?
शहीद मंगल पांडे जी की मूर्ति स्थापित करने की आवश्यकता इसलिए है कि जैसे हमारे बच्चे-“नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, रविन्द्रनाथ टैगोर,सरदार भगत सिंह,चन्द्र शेखर आजाद,स्वामी विवेकानंद जी” की मूर्तियों को देखते हैं ! तो वे उनका इतिहास जानने की कोशिश करते हैं ! और इससे मिली प्रेरणा उनके जीवन को -“राष्ट्र भक्ति” से ओतप्रोत कर देती है।
आदरणीय मित्रों ! मैं तो अब वृद्ध हो चुका ! आयु की चौहत्तरवीं सीढी पर थके कदमों से बराक उपत्यका के लोगों की यथासम्भव सेवा करने की आश में और आगे बढने की कोशिश कर रहा हूँ ! मातादीन भंगी को तो इस्ट इंडिया कम्पनी ने १९ मई को तोप के मुँह से बांधकर उडा दिया था ! और ऐसे ही कुछ फिरंगी अर्थात फिरकी की तरह नाचने वाले दल बदलू अर्थात-“बदलू खाँ” जिसने धोखे से मंगल पाण्डे जी को घायल होने पर बन्दी बनवाया था ! कुछ ऐसे ही लोग हमारे समाज को ! जन प्रतिनिधियों को ! मुख्यमंत्री जी को-“गुमराह” कर रहे हैं ! हमारी ये मुहीम ! “स्वतंत्रता के प्रथम अमर बलिदानी वीर मंगल पांडे जी” की मूर्ति स्थापना का ये स्वप्न नहीं ! “संकल्प” है हमारा ! मैं मर भी गया तो पुनर्जन्म लेकर आऊँगा ! जैसे १९९८ में जाने के बाद २०१४ में अपने अधूरे कार्य को पूरा करने आया ! वैसे ही बार-बार आऊँगा ! और इसी बराक उपत्यका में आता रहूँगा ! जबतक फिरंगियों को भगा नहीं पाया ! मंगल पाण्डे की मूर्ति स्थापना नहीं करवा पाया ! घुसपैठियों से बराक की रक्षा नहीं कर पाया ! तबतक आप सभी हिन्दू भाईयों की चरण-सेवा करने हेतु तन-मन और धन से आपके साथ! दिलीप जी के साथ! हमारे अध्यक्ष जवाहर लाल जी के साथ ! हमारे जन प्रतिनिधियों के साथ! और हमारे यशस्वी मुख्यमंत्री श्रीमान हेमन्तो बिस्वशर्मा जी के साथ सदैव खडा रहूँगा !-“स्वतंत्रता के प्रथम अमर शहीद मंगल पांडे जिन्दाबाद ! भारत माता की जय ! वन्दे मातरम”- “आनंद शास्त्री”

घुसपैठियों से व्यापारिक सम्बन्धों का दुष्परिणाम ….
भारतीय नागरिकों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु राष्ट्र वादी प्रबुद्ध जनता के अनेकानेक संगठनों के तत्त्वावधान में अनेक बार इस तथ्य पर जोर दिया गया है,चर्चा की गयी है कि भारतीयता पर विश्वास न रखने वाले लोगों-व्यक्तित्वों से व्यापारिक सम्बन्ध समाप्त करने के अतिरिक्त अन्य कोई भी विकल्प नहीं है।हमारे यशस्वी मुख्यमंत्री श्रीमान हेमन्तो बिस्वशर्मा जी के इस विचार का मैं स्पष्ट रूप से समर्थन करता हूँ कि केवल बंगाल अर्थात मींया के कारण ! पाकिस्तान अतिक्रमित सींध और पंजाब के मिंया घुसपैठियों के कारण, रोहिंग्या मिंया घुसपैठियों के कारण हमारे उत्पादों का मूल्य बढता है ! और इनकी कमी होती है ! अधिकांशतः खुदरा सब्जी, फल,मछली,चाट,दर्जी,ऑटो रिपेयर्स, मजदूर,मछुआरे,फुटपाथ पर दुकानें लगाये बैठे विक्रेता मिंया होते हैं ! पहली बात तो ये है कि ये फल और सब्जियों को थूक लगाकर बेचना एक जेहाद समझते हैं और दूसरी बात ये जानबूझकर खाद्य पदार्थों में अनावश्यक कीटनाशक रसायनों का उपयोग कर हमें बीमारी बांटना अपना कर्तव्य समझते हैं ।
मुख्यमंत्री जी के विचार को एक उदाहरण द्वारा सरलतापूर्वक इसे यूँ भी समझ सकते हैं कि बराक उपत्यका में हम हिन्दी भाषी अर्थात-“देश वाले” हैं। बांग्ला भाषी हमारे प्रयाग,काशी आदि-आदि गंगा पार के निवासी हैं ! और बांग्लादेश से आये हमारे बांग्ला भाषी हिन्दू यहाँ के मूल निवासी हैं ! बंगाल मिंया ने तो १९४७ के विभाजन में ही अपने अन्यान्य पूर्ण अमानवीय कृत्य से पृथक इस्लामिक देश बना लिया।
आज बांग्लादेशी घुसपैठियों को भारतीय नागरिक कहने वाली कांग्रेस ये भूल जाती है कि -“जिन्ना और सुहरावर्दी” दोनों ही कांग्रेसी थे जिन्होंने इस्लामिक  पाकिस्तान बनाया ! तो सावरकर ,नाथूराम गोडसे और हमारे आदर्श बंगाली महावीर-“गोपाल मुखर्जी” जी क्यों नहीं हो सकते ? हिन्दुस्थान हिन्दुओं का है और इसे हिन्दू राष्ट्र की औपचारिक रूप से घोषित होने की भी आवश्यकता नहीं है।
यहाँ रहने वाले मुस्लिमों की कम से कम आधी संख्या घुसपैठियों की है ! अर्थात यहाँ के प्रत्येक उत्पाद और जन सुविधाओं का दोहन,शोषण और मूल्य में व्यापारिक न्यूनतम लाभांश यदि केवल २०% भी मान लिया जाए तो आज बाजार में बिकती ८०₹ प्रति कीलो की सब्जी का लाभांश १६₹ का आधा ८₹ अर्थात स्वयमेव ही ७२ रुपये हो जायेगा। अर्थात यहाँ के हम भारतीय नागरिकों को २५% अधिक सरकारी सेवा और संसाधन मिलेंगे!व्यापार,नौकरी,आवास,शिक्षा,स्वास्थ्य आदि-आदि सुविधायें भी २५% अधिक अच्छी और सुगमता से मिलेंगी।
पर्यावरण में गुणात्मक सुधार होगा ! ट्रैफिक कम हो जायेगा ! सडकें अधिक दिन चलेंगी ! नकारात्मक उर्जा कम हो जायेगी ! अपराध ५०% से अधिक कम हो जायेंगे। महिलाओं का उत्पीड़न बिलकुल समाप्त हो जायेगा। गो वंश की हत्या और तश्करी के साथ-साथ हमारी पीढियों को बर्बाद करने वाली भयानक ड्रग्स आनी बन्द हो जायेंगी ! घुसपैठियों पर लगाम लगने से पुलिस प्रशासन और सुरक्षा पर होने वाले भारी भरकम व्यय में ॠणात्मक कमी आयेगी !
ये बिलकुल सत्य है कि मींया प्रत्येक वस्तु के दाम बढाकर बेचते हैं! और हिन्दु ग्राहकों से ! विशेष रूप से हिन्दू महिलाओं से बहुत ही घटिया और तिरस्कार पूर्वक व्यवहार करते हैं ! मैं जानता हूँ ! ये कडवी सच्चाई है कि ये लोग चीकन,मछली आदि में उसे ताजी रखने के नाम पर घातक रसायनों का उपयोग कर विशेष रूप से हिन्दू बस्तियों में बेचते हैं ! ये बकरे के नाम पर गौमांस भी बेचते हैं ! ये लोग बकरों को एक से दो दिन पहले नेफ्थालिन की गोली खिला देते हैं जिससे उनकी किडनी फूल हो जाती है ! अधिक प्यास लगने से वे अधिक पानी पीते हैं जिससे शरीर फूल जाता है ! मांस का वजन बढ जाता है ! जिस मांस को खाने से हमारी बराक उपत्यका में किडनी और लीवर की समस्याओं के साथ-साथ ह्रदय रोग हिन्दू समुदाय में गुणात्मक रूप से बढता जा रहा है।यहाँ यह कहना भी मैं उचित समझता हूँ कि भाषायी आधार पर असम में मिंया केवल बंगाल हैं ! इन्होंने छल पूर्वक असमिया सीख ली और अपने-आप को असमिया कहते फिरते हैं ! यहाँ कच्ची चीजों के अधिकतर आढतिया यही हैं ! थोडा सा भी कहीं भूस्खलन होने पर ये लोग गोहाटी का रास्ता बन्द होने के बहाने से मनमानी मूल्य वृद्धि करते हैं ! प्रिय मित्रों ! मैं आप सभी से आग्रह करता हूँ कि इन घुसपैठियों के हांथों बिकती सब्जी,फल आदि का बहिष्कार कर स्वयं अपने लोगों को इस व्यवसाय में लगायें ! ये प्रतिज्ञा करें कि हम किसी भी घुसपैठिये से कोई भी वस्तु न क्रय करेंगे न ही इन्हें किसी भी नौकरी में रखेंगे।
साथ ही मैं अपने माननीय जनप्रतिनिधियों से आग्रह करता हूँ कि आप भी हमारे मुख्यमंत्री जी के वक्तव्यात्मक निर्देश को ध्यान में रखते हुवे मिंया समुदाय का समर्थन करने की अपेक्षा अपने उस घोषणा पत्र का स्मरण करें जिससे प्रभावित होकर बराक उपत्यका की जनता ने आपको भारी मतों से विजयी बनाया था–“आनंद शास्त्री”

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