सवाल यह नहीं है कि भ्रष्टाचार कम क्यों नहीं हो रहा। असली सवाल यह है कि भ्रष्टाचारी शासन, प्रशासन और समाज में प्रभावशाली क्यों बने हुए हैं?
भ्रष्टाचार आज केवल रिश्वत लेने-देने की समस्या नहीं रह गया है। यह धीरे-धीरे एक ऐसी व्यवस्था का रूप ले चुका है, जिसमें नियमों को दरकिनार करने वाले, सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग करने वाले और अपने प्रभाव का इस्तेमाल निजी लाभ के लिए करने वाले लोग कई बार व्यवस्था के भीतर ही संरक्षण प्राप्त करते दिखाई देते हैं। यही स्थिति लोकतंत्र, प्रशासन और समाज—तीनों के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
भ्रष्टाचार तब और खतरनाक हो जाता है, जब वह व्यक्तिगत अपराध न रहकर संगठित तंत्र का रूप ले लेता है। ऊपर से नीचे तक यदि किसी काम को कराने के लिए अनौपचारिक लेन-देन, सिफारिश, दलाली या कमीशन की व्यवस्था बन जाए, तो ईमानदार व्यक्ति सबसे अधिक परेशान होता है। उसे अपने अधिकार के लिए भी किसी न किसी दरवाजे पर दस्तक देनी पड़ती है।
विडंबना देखिए—जो लोग व्यवस्था की कमजोरियों का लाभ उठाते हैं, वही सार्वजनिक मंचों से ईमानदारी, पारदर्शिता और नैतिकता का उपदेश देते नजर आते हैं। जनता के सामने आदर्शों की बातें और पर्दे के पीछे नियमों से समझौता—यह दोहरा चरित्र समाज के विश्वास को कमजोर करता है।
भ्रष्टाचार का दायरा भी केवल सरकारी कार्यालयों तक सीमित नहीं है। निर्माण कार्यों से लेकर खरीद-बिक्री, ठेकों से लेकर लाइसेंस, भूमि से लेकर विभिन्न सेवाओं तक—जहां भी अत्यधिक विवेकाधिकार, अपारदर्शिता और जवाबदेही की कमी होगी, वहां भ्रष्टाचार के लिए रास्ता बन सकता है। लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि बिना प्रमाण किसी व्यक्ति, अधिकारी, नेता, व्यापारी या ठेकेदार को भ्रष्ट घोषित न किया जाए। आरोपों की जांच हो, प्रमाण सामने आएं और दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई हो।
असल चुनौती केवल भ्रष्टाचारियों को पकड़ने की नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार को लाभहीन और जोखिमपूर्ण बनाने वाली व्यवस्था खड़ी करने की है। इसके लिए पारदर्शी प्रक्रियाएं, डिजिटल सेवाएं, सरकारी खरीद में खुलापन, स्वतंत्र और प्रभावी जांच, समयबद्ध न्याय, शिकायतकर्ताओं की सुरक्षा तथा दोषियों की संपत्ति और हितों की उचित जांच जैसे उपाय आवश्यक हैं।
साथ ही समाज को भी आत्ममंथन करना होगा। रिश्वत देने वाला यदि यह सोचकर पैसे देता है कि उसका काम जल्दी हो जाएगा, और लेने वाला यह मानता है कि पकड़े जाने की संभावना नगण्य है, तो भ्रष्टाचार का चक्र चलता रहेगा। इसलिए केवल व्यवस्था को दोष देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। नागरिक, अधिकारी, जनप्रतिनिधि और कारोबारी—हर स्तर पर जवाबदेही आवश्यक है।
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई किसी एक सरकार, किसी एक विभाग या किसी एक संस्था की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। यह संस्थागत सुधार और सामाजिक संकल्प—दोनों का विषय है। कानून का शासन तभी मजबूत होगा, जब कानून सभी पर समान रूप से लागू हो और प्रभावशाली व्यक्ति भी जवाबदेही से बाहर न हो।
आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या हम ऐसी व्यवस्था बना सकते हैं, जहां ईमानदारी मजबूरी नहीं बल्कि सम्मान का कारण बने और भ्रष्टाचार लाभ का रास्ता नहीं, बल्कि निश्चित कानूनी जोखिम बने?
यदि व्यवस्था में पारदर्शिता होगी, निर्णय प्रक्रिया पर निगरानी होगी, शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई होगी और दोषियों को राजनीतिक, प्रशासनिक या सामाजिक प्रभाव के बावजूद कानून का सामना करना पड़ेगा, तभी स्थिति बदल सकती है।
वरना ‘चोरी और सीना जोरी’ का यह सिलसिला चलता रहेगा—और सबसे अधिक नुकसान उस आम नागरिक का होगा, जो ईमानदारी से अपने अधिकार और अपने हिस्से की सुविधा पाने की उम्मीद करता है।
भ्रष्टाचार का अंत केवल भाषणों से नहीं होगा। उसके लिए ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जिसमें भ्रष्टाचार करना कठिन, छिपाना असंभव और सिद्ध होने पर बच निकलना लगभग नामुमकिन हो। यही सुशासन की पहली कसौटी है।