करम पर्व पर विशेष – गोरख नाथ गुप्ता 

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 प्रकृति, आस्था और भाई-बहन के स्नेह का लोकपर्व करम पर्व।

भारत एक कृषि प्रधान देश है भारत में विभिन्न जन गोष्ठी भाषा के लोग निवास करते हैं।

करम पर्व भारत की समृद्ध लोक-संस्कृति, प्रकृति-पूजा और सामुदायिक जीवन का महत्वपूर्ण पर्व है। यह पर्व विशेष रूप से झारखंड, बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, असम तथा देश के अन्य क्षेत्रों में रहने वाले विभिन्न आदिवासी एवं लोकसमुदायों में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह पर्व पूर्व में केवल झारखंड एवं ओडिशा के कुछ जगहों पर सीमित थी।  प्रवासी अपने संस्कृति को बचाए रखा है। यह पर्व भाद्रपद शुक्ल पक्ष एकादशी को मनाया जाता है।इस पर्व को बिहार झारखंड में कुछ जगहों पर कर्मा धर्मा से मनाते है।करम पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के प्रति सम्मान, कृषि-समृद्धि की कामना, भाई-बहन के स्नेह, सामाजिक एकता और लोकपरंपराओं के संरक्षण का संदेश भी देता है।ग्रामीण और आदिवासी समाज के जीवन में प्रकृति का विशेष महत्व रहा है। जंगल, पेड़-पौधे, नदियां, खेत और वर्षा उनके जीवनएवंआजीवका से गहराई से जुड़े रहे हैं। इसी प्राकृतिक जीवन-दर्शन की अभिव्यक्ति करम पर्व में दिखाई देती है। पर्व के दौरान करम वृक्ष की डाली को विशेष रूप से पूजित किया जाता है। मान्यता है कि करम देवता सुख, समृद्धि, खुशहाली और परिवार की रक्षा के प्रतीक हैं।

करम पर्व की पौराणिक मान्यता है ‌।करम पर्व से जुड़ी अनेक लोककथाएं और मान्यताएं विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित हैं। इनमें करम देवता को कर्म, समृद्धि और जीवन के संरक्षण से जोड़ा गया है। लोककथाओं में सात भाइयों और उनकी बहनों की कथा विशेष रूप से सुनाई जाती है। कथा के अनुसार परिवार, श्रम, सम्मान और करम देवता के प्रति श्रद्धा से जुड़े व्यवहार के आधार पर सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

करम पर्व की कथाएं यह संदेश देती हैं कि मनुष्य को अपने कर्म, प्रकृति और सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति सजग रहना चाहिए। यही कारण है कि इस पर्व में धार्मिक आस्था के साथ-साथ लोकजीवन के नैतिक मूल्यों का भी समावेश दिखाई देता है।

करम वृक्ष की पूजा

करम पर्व का सबसे प्रमुख आकर्षण करम वृक्ष की पूजा है। पर्व के अवसर पर करम की डाल को विधि-विधान से लाकर पूजा स्थल पर स्थापित किया जाता है। महिलाएं और युवतियां विशेष रूप से पूजा में भाग लेती हैं। पूजा के दौरान पारंपरिक गीत गाए जाते हैं और करम देवता से परिवार तथा समाज की सुख-समृद्धि की प्रार्थना की जाती है।

करम वृक्ष प्रकृति और जीवन के बीच संबंध का प्रतीक माना जाता है। इसलिए करम पर्व का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी है कि पेड़-पौधों और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा की जाए। आज जब पर्यावरण संरक्षण पूरी दुनिया के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती है, तब प्रकृति के प्रति सम्मान की यह लोकपरंपरा और भी प्रासंगिक हो जाती है।

भाई-बहन के स्नेह का पर्व

करम पर्व में भाई-बहन के पारस्परिक प्रेम और मंगलकामना की भावना भी महत्वपूर्ण है। कई स्थानों पर बहनें अपने भाइयों के सुख, स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करती हैं। भाई भी बहनों के प्रति अपने स्नेह और जिम्मेदारी का भाव प्रकट करते हैं।

इस प्रकार करम पर्व पारिवारिक संबंधों को मजबूत करने का अवसर प्रदान करता है। बदलते सामाजिक परिवेश में जहां पारंपरिक सामुदायिक जीवन में बदलाव आ रहा है, वहां ऐसे पर्व परिवार और समाज के बीच भावनात्मक संबंधों को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

गीत-संगीत और नृत्य की विशेष परंपरा

करम पर्व की पहचान उसके लोकगीत और पारंपरिक झुमर नृत्य से भी होती है। पर्व की रात गांवों में युवक-युवतियां तथा महिलाएं पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन पर करम गीत गाते और नृत्य करते हैं। इन गीतों में प्रकृति, प्रेम, कृषि, परिवार, सामाजिक जीवन और करम देवता की स्तुति का भाव देखने को मिलता है।

ढोल, मांदल, नगाड़ा और अन्य पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन वातावरण को उत्सवमय बना देती है। कई स्थानों पर पूरी रात सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। लोकनृत्य और लोकगीत नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बनते हैं।

कृषि और करम पर्व,

करम पर्व का संबंध कृषि-जीवन से भी गहरा है। भारत के ग्रामीण समाज में खेती केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। अच्छी वर्षा, अच्छी फसल और परिवार की समृद्धि के लिए प्रकृति तथा देवताओं से प्रार्थना करने की परंपरा लोकपर्वों में दिखाई देती है।

करम पर्व भी इसी कृषि संस्कृति की अभिव्यक्ति है। किसान प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं और आने वाले समय में अच्छी फसल तथा खुशहाली की कामना करते हैं। इस दृष्टि से करम पर्व मेहनत, कृषि और प्रकृति के बीच संबंध को रेखांकित करता है।

महिलाओं की महत्वपूर्ण 

करम पर्व के आयोजन में महिलाओं की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय होती है। कई क्षेत्रों में महिलाएं उपवास रखती हैं, पूजा की तैयारी करती हैं, करम डाली की स्थापना करती हैं और पारंपरिक गीत गाती हैं। वे लोकपरंपराओं को एक पीढ़ी से दुसरी पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले करम गीतों में लोकजीवन की संवेदनाएं, परिवार के प्रति प्रेम और प्रकृति के प्रति सम्मान स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इस कारण करम पर्व को लोक-संस्कृति के संरक्षण में महिलाओं की महत्वपूर्ण भागीदारी का पर्व भी कहा जा सकता है।

करम पर्व का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामुदायिक एकता है। पर्व के दौरान लोग व्यक्तिगत भेदभाव से ऊपर उठकर सामूहिक रूप से पूजा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। गांवों में सामूहिक आयोजन से आपसी सहयोग और भाईचारे की भावना मजबूत होती है।

युवा पीढ़ी भी इन आयोजनों में बढ़-चढ़कर भाग लेती है। इससे उन्हें अपनी परंपरा, भाषा, लोकगीत, नृत्य और सांस्कृतिक विरासत को समझने का अवसर मिलता है। इस प्रकार करम पर्व सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक निरंतरता को बनाए रखने में योगदान देता है।

असम में करम पर्व

असम के विभिन्न क्षेत्रों में भी अलग-अलग समुदायों द्वारा करम पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। विशेष रूप से चाय बागान क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों के बीच इस पर्व की सांस्कृतिक उपस्थिति दिखाई देती है। चाय बागान श्रमिक समुदायों के लोकजीवन में करम पर्व सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा हुआ है।

पर्व के अवसर पर सामूहिक पूजा, पारंपरिक गीत, नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में शामिल होती हैं और युवक-युवतियां लोकनृत्य प्रस्तुत करते हैं। कई स्थानों पर स्थानीय सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाएं भी कार्यक्रम आयोजित कर नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं से जोड़ने का प्रयास करती हैं।

बदलते समय में करम पर्व

आधुनिकता और तेजी से बदलते सामाजिक जीवन के बावजूद करम पर्व की प्रासंगिकता बनी हुई है। आज के दौर में युवा शिक्षा, रोजगार और तकनीक के कारण अपने पारंपरिक परिवेश से दूर हो रहे हैं। ऐसे समय में करम जैसे लोकपर्व उन्हें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का काम करते हैं।

हालांकि आधुनिक आयोजन के साथ यह भी आवश्यक है कि पर्व की मूल भावना और परंपराओं को बनाए रखा जाए। केवल मनोरंजन तक सीमित रहने के बजाय करम पर्व के पीछे छिपे प्रकृति-सम्मान, सामाजिक एकता, श्रम, पारिवारिक संबंध और सांस्कृतिक संरक्षण के संदेश को नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है।

पर्यावरण संरक्षण 

आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, जंगलों की कमी और पर्यावरणीय असंतुलन जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे समय में प्रकृति और वृक्षों के प्रति सम्मान व्यक्त करने वाली लोकपरंपराएं विशेष महत्व रखती हैं।

करम पर्व हमें यह याद दिलाता है कि मानव जीवन प्रकृति से अलग नहीं है। पेड़-पौधे, जल, जंगल और जमीन की रक्षा करना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। पर्व के अवसर पर वृक्षारोपण, जंगलों की रक्षा और प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग का संकल्प लिया जाए तो इसकी सामाजिक उपयोगिता और बढ़ सकती है।

लोकसंस्कृति के संरक्षण की आवश्यकता

करम पर्व केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति का जीवंत दस्तावेज है। इसके गीत, नृत्य, कथाएं, वेशभूषा, पूजा-पद्धति और सामुदायिक आयोजन पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं।

इस विरासत को संरक्षित करना ।करम गीतों और लोककथाओं का दस्तावेजीकरण, पारंपरिक नृत्य प्रतियोगिताओं का आयोजन तथा युवा पीढ़ी की भागीदारी से इस परंपरा को भविष्य तक पहुंचाया जा सकता है।

करम पर्व प्रकृति, परंपरा, श्रम, परिवार और सामाजिक एकता का सुंदर संगम है। यह पर्व हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने, परिवार एवं समाज के प्रति अपने दायित्वों को समझने और अपनी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने की प्रेरणा देता है।

आज जब आधुनिक जीवनशैली के कारण अनेक लोकपरंपराएं धीरे-धीरे सीमित होती जा रही हैं, तब करम पर्व जैसी परंपराओं को जीवंत बनाए रखना केवल किसी एक समुदाय की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि भारत की विविधतापूर्ण लोक-संस्कृति के संरक्षण का सामूहिक प्रयास है।

करम पर्व का संदेश स्पष्ट है—प्रकृति का सम्मान करें, अपने कर्म को महत्व दें, रिश्तों को मजबूत बनाएं और अपनी सांस्कृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाएं। यही इस लोकपर्व की वास्तविक भावना और इसकी सबसे बड़ी सांस्कृतिक शक्ति है।

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