बोनस से ज्यादा जरूरी है सालभर रोजगार और बागान का भविष्य: कमलेश सिंह

शिव कुमार शिलचर, 03 अक्टूबर: दुर्गा पूजा से पहले चाय बागानों में बोनस को लेकर जहां श्रमिकों के बीच उत्सुकता रहती है, वहीं इस वर्ष डर्बी चाय बागान में 12 प्रतिशत बोनस को लेकर कुछ श्रमिकों में असंतोष देखने को मिला है। कुछ श्रमिक 20 प्रतिशत बोनस की मांग कर रहे हैं। इसी मुद्दे को लेकर डर्बी चाय बागान के रेजिडेंट डायरेक्टर कमलेश सिंह ने प्रबंधन का पक्ष सामने रखा है।कमलेश सिंह के अनुसार, डीएम ग्रुप ऑफ एस्टेट्स के अधीन डर्बी, रतनपुर, मणिपुर और पाथिनिटी सहित चार चाय बागान हैं। उनका कहना है कि समूह करीब 48 वर्षों से चाय उद्योग से जुड़ा है और इस दौरान बोनस का समझौता संबंधित बागानों की श्रमिक पंचायत और प्रबंधन के बीच आपसी सहमति से होता आया है।उन्होंने कहा कि उनके अनुसार बोनस का विषय केवल एक बार मिलने वाली रकम तक सीमित नहीं है, बल्कि बागान की आर्थिक स्थिति, उत्पादन, श्रमिकों की उपस्थिति और पूरे वर्ष रोजगार उपलब्ध कराने की क्षमता से भी जुड़ा हुआ है।कमलेश सिंह ने कहा कि बोनस कानून के तहत न्यूनतम बोनस का प्रावधान है और कंपनी की आर्थिक स्थिति तथा उपलब्ध प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए प्रबंधन बोनस और एक्स-ग्रेशिया के माध्यम से श्रमिकों को भुगतान करता रहा है। उनके अनुसार, उनके समूह में 1990 के दशक से उपस्थिति से जुड़े एक्स-ग्रेशिया की व्यवस्था भी लागू रही है।

उनका कहना है कि इस व्यवस्था में अधिक दिनों तक काम करने वाले श्रमिकों को अपेक्षाकृत अधिक लाभ मिलता है। प्रबंधन का तर्क है कि इससे श्रमिकों की उपस्थिति और कार्य के प्रति प्रोत्साहन बढ़ता है।

20 प्रतिशत बोनस को लेकर उठ रही मांग पर कमलेश सिंह ने कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा की गई घोषणा को वह सरकार की ओर से की गई स्वैच्छिक घोषणा के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार, निजी चाय बागानों की आर्थिक परिस्थितियों की तुलना सीधे सरकारी व्यवस्था से नहीं की जा सकती।

उन्होंने कहा कि डीएम ग्रुप के बागानों को वर्तमान में करोड़ों रुपये का वार्षिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। उनके अनुसार, समूह के स्तर पर यह नुकसान लगभग 12 से 15 करोड़ रुपये सालाना तक पहुंचता है, बावजूद इसके श्रमिकों को पूरे वर्ष रोजगार उपलब्ध कराने और बागान को चालू रखने का प्रयास किया जाता है।कमलेश सिंह ने कहा कि चाय उत्पादन का मौसम खत्म होने के बाद भी उनके बागानों में श्रमिकों को रोजगार देने का प्रयास किया जाता है। उनके मुताबिक, उत्पादन बंद रहने की अवधि में भी मजदूरी और बागान के रखरखाव का खर्च जारी रहता है, जबकि उस समय उत्पादन से आय नहीं होती।उन्होंने कहा कि कई बागानों में इस अवधि में श्रमिकों की उपस्थिति कम कर दी जाती है, लेकिन उनके समूह में लंबे समय से श्रमिकों को रोजगार उपलब्ध कराने की कोशिश की जाती रही है।उनके अनुसार, बागान को सुरक्षित रखना, सड़क, आवास, स्वास्थ्य, रोजगार और अन्य जरूरी व्यवस्थाओं को बनाए रखना भी प्रबंधन की जिम्मेदारी है। उनका कहना है कि यदि बागान का रखरखाव नहीं होगा तो धीरे-धीरे उत्पादन और रोजगार दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

कमलेश सिंह ने चाय उद्योग की मौजूदा आर्थिक स्थिति पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि उत्पादन लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि चाय की कीमत उसी अनुपात में नहीं बढ़ रही है। उनके मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों से उद्योग को लगातार आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है।

उन्होंने बराक वैली के चाय बागानों की भौगोलिक और उत्पादन संबंधी परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां की जमीन और प्राकृतिक परिस्थितियां अपर असम के कई चाय क्षेत्रों से अलग हैं। उनके अनुसार, इस वजह से उत्पादन और चाय की गुणवत्ता पर भी प्रभाव पड़ता है।

उन्होंने कहा कि चाय उद्योग को बचाने के लिए सरकार, प्रबंधन, श्रमिक संगठन और श्रमिकों को मिलकर दीर्घकालिक समाधान पर विचार करना होगा।

श्रमिकों के लिए संदेश देते हुए कमलेश सिंह ने कहा कि बोनस महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण यह है कि बागान लगातार चलता रहे और आने वाली पीढ़ियों के लिए रोजगार का माध्यम बना रहे।

उन्होंने कहा कि यदि बागान आर्थिक रूप से कमजोर होकर बंद हो जाते हैं तो इसका सीधा असर सिर्फ श्रमिकों पर ही नहीं, बल्कि आसपास के बाजार, छोटे व्यापारियों और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

कमलेश सिंह ने कहा कि उनका उद्देश्य श्रमिकों को किसी प्रकार की मुफ्त सुविधा देने के बजाय ऐसा वातावरण तैयार करना है, जहां श्रमिक काम करके नियमित आय अर्जित कर सकें और अपने परिवार का बेहतर ढंग से पालन-पोषण कर सकें।डर्बी चाय बागान में बोनस को लेकर पैदा हुए मौजूदा असंतोष के बीच प्रबंधन ने श्रमिकों और उनके प्रतिनिधियों के साथ बातचीत तथा आपसी समझ को महत्वपूर्ण बताया है।

कमलेश सिंह के अनुसार, वर्षों से पंचायत और प्रबंधन के बीच आपसी समझ के आधार पर बोनस का निपटारा होता रहा है। उनका कहना है कि इसी प्रक्रिया से बागान की वास्तविक आर्थिक स्थिति और श्रमिकों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए समाधान निकालने की कोशिश की जाती रही है।

उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा विवाद में बाहरी हस्तक्षेप की संभावना से वह चिंतित हैं और उनका मानना है कि बागान से जुड़े मुद्दों का समाधान बागान प्रबंधन, श्रमिकों और उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों के बीच बातचीत से होना चाहिए।

कमलेश सिंह ने अंत में चाय बागान की युवा पीढ़ी से अपील की कि वे बागान के भविष्य को सुरक्षित रखने पर ध्यान दें। उनके मुताबिक, चाय उद्योग बराक वैली और असम के लिए रोजगार का एक महत्वपूर्ण माध्यम है और इसे बचाना सभी संबंधित पक्षों की साझा जिम्मेदारी है।

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