बेटी त्याग की मूरत है
सनातनी धार्मिक मान्यतानुसार ” यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: ” यानी जहाँ नारियों को पूजा जाता है वहाँ देवता निवास करते है लेकिन दहेज कुप्रथा के कारण बेटियों को परिवार का बोझ समझा जाता है जो कि सरासर गलत है। हम सब जानते है कि दहेज कुप्रथा के कारण न जाने हमारे कितने बहन, बेटियां यातनाएं सहते हुए बलि चढ़ गयी। कठोर कानून के साथ- साथ दहेज कुप्रथा को संपूर्ण रूप से तिरस्कार कर तथा शिक्षा का प्रचार- प्रसार कर हम दहेज रुपी दानव को जड़ से खत्म कर सकते हैं तब जाकर ही हर घर के आंगन मे बेटियों की खुशियाँ किलकारी मारेगी। बेटी साक्षात प्रेम,संस्कार, स्नेह, त्याग की मूरत होती है। घर मे बेटी का होना कितना आवश्यक है यह उन माता- पिता को महसूस होती है जिनके बेटी नही होती है और बेटी कितना महत्वपूर्ण है यह उन माता- पिता को मालूम है जिनको सिर्फ बेटियां है। बेटी अपने मायके और ससुराल दोनों घरों को समर्पण भाव से संभालती है। बेटी परम्परा,रीति- रिवाज आदि का धोतक है। बेटी परिवार के साथ-साथ समाज का धरोहर है। विपरीत परिस्थितियों में जब बेटी अपने वृद्ध माता- पिता के कंधे पर हाथ रखकर कहती है कि आप चिंता न करे अभी आपकी बेटी है न। यह सब सुनकर माता- पिता के हृदय मे कैसा महसूस होता है यह हम शब्दों मे बयां नहीं कर सकते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि बेटी को शिक्षा, कर्म, आर्थिक, सामाजिक अर्थात हर क्षेत्र मे पूरी आजादी देनी चाहिए और हर प्रकार के रुढ़िवादी, कुप्रथा के खिलाफ हमे लड़ाई लड़ कर इसे नेस्तनाबूद कर देना चाहिए।
पवन कुमार शर्मा ( शिक्षक)