पानीपत, हरियाणा से विशेष प्रतिनिधि द्वारा एक रिपोर्ट। जहां अधिकांश लोग पीएचडी पूरी करने और प्रोफेसर बनने के बाद सुरक्षित करियर को प्राथमिकता देते हैं, वहीं हरियाणा के प्रगतिशील किसान डॉ. जयपाल तंवर ने परंपरागत सोच से अलग राह चुनी। दो विषयों में पीएचडी करने और करीब पांच वर्षों तक असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्य करने के बाद उन्होंने वर्ष 2014 में नौकरी छोड़कर खेती को अपना पेशा बनाया। आज उनकी यह पहल न केवल उन्हें करोड़ों रुपये की आय दे रही है, बल्कि दर्जनों लोगों के लिए रोजगार का भी स्रोत बन चुकी है।
पानीपत जिले के आसनखुर्द गांव निवासी डॉ. तंवर ने खेती की शुरुआत बिना अपनी जमीन के की थी। उन्होंने लीज पर जमीन लेकर महज एक एकड़ क्षेत्र में पॉलीहाउस के माध्यम से लाल और पीली शिमला मिर्च तथा खीरे की खेती शुरू की। पहले ही सीजन में लगभग 22 हजार किलोग्राम शिमला मिर्च का उत्पादन हुआ और उन्हें करीब 12 लाख रुपये का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ।
सफलता से प्रेरित होकर उन्होंने उन पॉलीहाउसों को भी लीज पर लिया, जिन्हें अन्य किसान नुकसान की आशंका के कारण छोड़ चुके थे। बेहतर प्रबंधन, आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक खेती के बल पर उन्होंने इन्हें लाभकारी उद्यम में बदल दिया। वर्तमान में डॉ. तंवर लगभग 70 एकड़ क्षेत्र में खेती कर रहे हैं, जिसमें 35 एकड़ पॉलीहाउस और नेट हाउस जैसी हाईटेक संरचनाओं के अंतर्गत है।
आधुनिक तकनीक और नवाचार बनी सफलता की कुंजी
डॉ. तंवर अपनी खेती में ड्रिप इरीगेशन, पॉलीहाउस, नेट हाउस और ओपन फार्मिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग करते हैं। वे लाल, पीली और हरी शिमला मिर्च, चेरी टमाटर, इंग्लिश लेट्यूस, विभिन्न पत्तेदार सब्जियां, रंगीन फूलगोभी, ब्रोकली, खरबूजा, तरबूज तथा लिली जैसे फूलों की खेती करते हैं। इसके अलावा कई एग्जॉटिक सब्जियां भी उगाते हैं, जिनकी बाजार में विशेष मांग रहती है।
‘फार्म टू टेबल’ मॉडल से बनाई अलग पहचान
डॉ. तंवर की पहचान केमिकल-फ्री और उच्च गुणवत्ता वाली सब्जियों के उत्पादक के रूप में स्थापित हो चुकी है। उन्होंने अपना स्वयं का ब्रांड विकसित किया है और ‘फार्म टू टेबल’ मॉडल पर कार्य कर रहे हैं, जिसके तहत खेत से सीधे उपभोक्ताओं तक ताजा उत्पाद पहुंचाए जाते हैं। उनकी उपज दिल्ली-एनसीआर की आवासीय सोसाइटियों, सुपरमार्केट्स और विभिन्न फूड चेन तक नियमित रूप से पहुंचती है।
खेती से नौकरी से दस गुना अधिक आय
डॉ. तंवर के अनुसार, आधुनिक तकनीकों और सरकारी योजनाओं का लाभ लेकर वे प्रति एकड़ 10 से 12 लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ अर्जित कर रहे हैं, जबकि पारंपरिक खेती में यह आंकड़ा काफी कम रहता है। अनुकूल बाजार परिस्थितियों में उन्हें सालाना 1.5 से 2 करोड़ रुपये तक का मुनाफा होता है, जबकि औसतन एक करोड़ रुपये की आय सुनिश्चित रहती है।
रोजगार सृजन में भी निभा रहे महत्वपूर्ण भूमिका
एक समय अकेले खेती की शुरुआत करने वाले डॉ. जयपाल तंवर आज 35 से अधिक स्थायी और 50 से 60 लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार उपलब्ध करा रहे हैं। उनकी सफलता इस बात का प्रमाण है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण, नवाचार और आधुनिक तकनीकों के माध्यम से खेती को अत्यंत लाभकारी व्यवसाय में बदला जा सकता है।
डॉ. तंवर की कहानी उन युवाओं और किसानों के लिए प्रेरणास्रोत है जो खेती को घाटे का सौदा मानते हैं। उन्होंने साबित कर दिया है कि यदि खेती को व्यवसायिक दृष्टिकोण, तकनीकी ज्ञान और बाजार की समझ के साथ किया जाए तो यह क्षेत्र भी अपार संभावनाओं से भरा हुआ है।