पितृ-सूक्त आठवां मंत्र,प्रथम भाग-सत्रहवां अंक- आनंद शास्त्री

मित्रों ! इस ऋचा में ऋषि कहते हैं कि-
“येनः पूर्वे पितरः सोम्यासो ऽनुहिरेसोमपीथं वशिष्ठाः।
तैभिर्यमः र्सरराणो हवीर्ष्युशन्नुशभ्दिः प्रतिकाममत्तु।।”
अर्थात (यम के सोमपानोपरान्त)पुनश्च ऋषि कहते हैं कि सोमपान के योग्य हमारे वसिष्ठ कुल के सोमपायी पितर यहाँ उपस्थित हो गये हैं,वे हमें उपकृत करने के लिये आपस में  सहमत होकर और स्वयं उत्कंठित होकर यह राजा यम हमारे द्वारा समर्पित हविको अपनी इच्छानुसार ग्रहण करें।
यह तो आप सभी ने अभी तक अनुमान लगा ही लिया होगा कि पितर अर्थात धूममार्गीय जीवों पर अधिकार-“यम अर्थात काल” का ही होता है ! देवतादि और पितर इनके मध्य के सेतु को भी आप “यमराज”कह सकते हैं। ये भी कह सकते हैं कि पितरों को यमराज के अधीन रखा गया है जबकि देवताओं पर यम का कोई अधिकार नहीं है।
आपको स्मरण दिला दूं कि प्रसिद्ध ऋषि-“वाजश्रवा” ने अपने पुत्र नचिकेता को खीझकर कहा था कि-“मृत्यवे त्वा ददामीति !”
और यह भी स्मरण रखें कि नचिकेता का तृतीय प्रश्न था कि- “अस्तीत्येके नायमस्तीति चैके ?”अर्थात आत्मा की सत्ता है या नहीं ?
अर्थात मैं यह कहना चाहता हूँ कि जो सूक्त कहता है कि “सोमपीथं वशिष्ठाः” जो ब्रम्हवादी अथवा परमार्थ पथ पथिक होते हैं आप उन्हे ही-“वशिष्ठ-गोत्रीय” अथवा पितर कहें,तो ज्यादा उचित होगा ! मैं देवताओं और पितरों के अस्तित्व का समर्थक तो हूँ किन्तु सूक्ष्म अस्तित्वों का ! ये यमादि देवता तथा वशिष्ठादि पितर कल थे आज हैं,और आगे भी होते रहेंगे ! अब यदि किसी को शंका होती है कि वशिष्ठ जैसे ब्रम्हर्षियों की मुक्ति नहीं हुयी ! तो उन्हे आधुनिक विज्ञान का भी अध्ययन करना चाहिये-
मित्रों ! आज जिसे आप डीएनए कहते हैं ! मैं समझता हूँ कि उन ऋषियों के डीएनए हमारे आपके पूर्वजों में थे ! हममें हैं और हमारी पीढीयों में भी रहेंगे ! (अब यदि वे किसी लालच अथवा बलात्कार से वर्णशंकर बन जाते है ! अर्थात मुस्लिम-ईसाई बन जाते हैं ! उनके परिवार की स्त्रियों का विदेशी म्लेक्षों के डीएनए में मिश्रण हो जाता है तो वे वशिष्ठ नहीं रह सकते) अब यदि आप ये कहते हैं कि डीएनए तो स्थूल तत्त्वों को कहते हैं ! तो मैं मात्र इतना ही कहूँगा कि-हाँ ! बिल्कुल ! किन्तु सूक्ष्मतम स्थूल !और यही मेरे आपके जीव का रहस्मय लोक भी है। ये मृत्यु लोक अर्थात यमलोक का रहस्य है।
प्रिय मित्रों ! इस संदर्भ में मैं आपको कठ•उप•२•३•१७• के इस मंत्र को दिखाना चाहूँगा-
“तं विद्याच्छुक्रममृतं विद्याच्छुक्रममृतम्।।
हम आप,स्त्री-पुरुष दोनों ही हंस हैं ! हम अंतरिक्ष में,परमात्मा में, ह्यदयाकाशमें रहते हैं ! पृथिवीपर जन्म लेकर यज्ञ करते हैं और इस शरीर में तो  हम-आप एक अतिथि मात्र हैं। अभी यहाँ मैं यह कहना भी उचित समझता हूँ कि-“यमराज और धर्मराज”में वही भेद है जो अभियुक्त और पीड़ित की दृष्टि में- सच्चे न्यायाधीश के भयावह और न्याय पाकर संतुष्ट जनों के मध्य होता है।
अभियुक्त अपने कर्म-दण्ड को पाकर यमराज में भयावह आकृति की कल्पना करते हैं ! वहीं पीड़ित को उनमें सौम्य धर्मराज का दर्शन होता है। और इस ऋचा में स्पष्ट कहते हैं कि-“सोम्यासो ऽनुहिरे सोमपीथं वशिष्ठाः”अर्थात सोमपान के योग्य हमारे वसिष्ठ कुल के सोमपायी पितर यहाँ उपस्थित हो गये हैं, ! अर्थात इसमें भी आप शंका नहीं कर सकते कि मात्र सोमपायी पितर ही आये हैं ऐसा नहीं है ! इस सोमपान के याचक भी साथ में हैं। वशिष्ठ अर्थात उत्तम कार्यकर्ता पूर्वज जहाँ धर्मराज के संरक्षण में आदर पूर्वक भ्रमणार्थ आये हैं वहीं उन्हीं के पीछे-पीछे दुष्ट कर्म कर्ता हमारे ही पूर्वज उनके पीछे आधिदैविक तापों को सहते हुए यमदूतों द्वारा धकेले जाते हुवे अनादर पूर्वक भूखे-प्यासे आये हैं ! यही उनकी नियति है। अभी मैं एकबात और भी कहूँगा,जैसे कि दुर्योधन,दुःशाषन, चंगेजखाँ, तैमूरलंग,औरंगजेब,बाबर, अलाऊद्दीन खिलजी, गोरी, जीसस, गजनवी,हिटलर,जनरल डायर,अफजल गुरू,अयातुल्ला खुमैनी,मृतक आतंकवादी,तालिबानी  ये कौन हैं ? क्या ये हमारे अर्थात मानव के पूर्वज नहीं हैं ?
हाँ ! पुरखे तो ये भी हमारे हैं ! क्योंकि हमारे पूर्वज ही इनके पुरखे हुवा करते थे ! बस इनके डीएनए अलग हैं ! ये हैवान हैं ! और ऐसे ही हैवान और शैतान हमारे अपने डीएनए में भी हमारे अपने कुछ लोग भी हैं ! जो इनसे भी बडे पिशाच हैं !और इनके लिये भी इसी ऋचा में व्यवस्था की गयी है- इस सोमरस तथा हविष्य के अधिकारी कौन हैं ! यह निर्णय यमराज अथवा धर्मराज को करना है ! और कैसे करना है, इसे भी मैं आपसे समझता हूँ ! जैसे कि मैं अपने को वैदिक तथा कुलाचारी मानता हूँ तो-“गोमांस और शूकर,भेंड,बकरी,मछली,मुर्गे” अर्थात सभी प्रकार के मांसों को मैं अभक्ष्य समझने के कारण- और अपनी धर्मभीरुता के कारण उनके हाँथ से स्पर्श की हुयी भोज्य सामग्रियों को अस्पृश्य समझता हूँ और न्याय की दृष्टि से ये बिलकुल उचित भी है।
किन्तु उनमें किसी के लिये शूकर मांस भले ही त्याज्य हो ! किन्तु गोमांस तो दोनों के लिये ही भक्ष्य-पदार्थ हैं ? तो वे तो भेद कर सकते हैं किन्तु मुझ वैदिक संस्कृति के संवाहक का आहार अर्थात मेवे, सब्जियाँ,मिष्ठान्न,फरसाण,वनस्पतियाँ, फल, अन्नादि तो सभी के लिये भक्ष्य हैं ! अर्थात उन्हे मेरी पाकशाला में निर्मित भोक्ष्य पदार्थों से प्रेम है ! वे तो इसके इच्छुक हैं ही ! मुझे मछली,गाय और स्वर की चर्बी देखकर उल्टी आती है किन्तु उनके मुख से शक्कर की चाशनी,दधि,धृत देखकर ही लार टपकने लगती है ! अभी एक बात और भी है ! मेरी पंञ्क्ति में तो वे बैठना चाहेंगे ही ! किन्तु मैं आपसे पूछता हूँ कि क्या आप उनकी पंक्ति में बैठ सकते हो ?
इसी के साथ ऋचाके इस अंक को यहाँ विश्राम देता हूँ और शीघ्र ही इसके अगले अंक के साथ उपस्थित होता हूँ— आनंद शास्त्री सिलचर, सचल दूरभाष यंत्र सम्पर्कांक 6901375971″

पितृ-सूक्त आठवां मंत्र,द्वितीय भाग-अट्ठारहवां अंक-
मित्रों ! इस ऋचा में ऋषि कहते हैं कि-
“येनः पूर्वे पितरः सोम्यासो ऽनुहिरेसोमपीथं वशिष्ठाः।
तैभिर्यमः र्सरराणो हवीर्ष्युशन्नुशभ्दिः प्रतिकाममत्तु।।”
वैसे भी जो वशिष्ठ कुल के सोमपायी पितर होते हैं ! अर्थात जो शुद्ध सामग्री में विश्वास रखते हैं ! जिनमें परमार्थ मयी दृष्टि होती हैं ! अर्थात जो ब्रम्हर्षि होते हैं ! उनका ही अधिकार सोमपान अर्थात तर्पणादि हविष्यों को प्राप्त करने का होता है।
ऋषि कहते हैं कि ये पितर आपकी दो अंजुली जल के भूखे नहीं हैं-पितर लोक में धर्मराज द्वारा प्रदत्त उन्हें यथायोग्य श्रेष्ठतम सुख-सामग्री सदैव उपलब्ध है- तैभिर्यमः र्सरराणो”वे तो हमें उपकृत करने के लिये हमारे आह्वान पर आते हैं ! जैसे कि कभी कदाप मैं अपने मंदिर में किसी भोज का आयोजन करता हूँ तो परिचितों को आमंत्रित करता हूँ ! और जब काफी सारे लोग मुझसे प्रेम करने के कारण आ जाते हैं ! तो मैं इतराने लगता हूँ ! कि मैं कितना-“महाऽऽऽन” हूँ ! कितना धनाढ्य हूँ कि ये सब मेरे घर खाने को आये हैं ?

प्रिय मित्रों ! और इस भावना से किया हुवा श्राद्ध अथवा कि किसी भी प्रकार का भोज महापाप है ! ये जो लोग मेरे घर आये हैं ! जिन्होंने आपके आह्वान और आमंत्रण को स्वीकार किया वे तो आपको उपकृत करने को आये हैं ! अब एक बात और भी मैं आपसे समझने का प्रयास करता हूँ!!ऋषि कहते हैं कि- “हवीर्ष्युशन्नुशभ्दिः” हमारे द्वारा दी हुयी हविष्य को आप यम के द्वारा-अर्थात– आपने जो हविष्यान्न पितरों के निमित्त दिया वह यमराज के माध्यम से उन्हे प्राप्त होती है !अर्थात “यम” एक आप और उन पितरों के मध्य के सेतु हैं ! इस संदर्भ में मैं आपको ऋग्वेद•१०•१४•३• अर्थात-“यमसूक्त” की यह ऋचा दिखाता हूँ-
“मातली कव्यैर्यमो अङ्गिरोभिर्बृहस्पतिर्ऋक्वभिर्वावृधानः।
याँश्चदेवा वावुधुर्ये च देवान् त्स्वाहान्येस्वधयान्ये मदन्ति॥”
ये ऋचा स्पष्ट करती है कि इन्द्र,बृहस्पति आदि देवता-गण यम तथा अंगीरसादि पितरों के द्वारा-“कव्य” अर्थात हविष्य पाकर पुष्ट होते हैं!! एक धारणा लोगों में है कि-“हव्य तथा कव्य” में भी भेद है ?
हाँ ! भेद तो है ही ! बिलकुल जितना भेद आपके “दायें और बायें हाँथों”में है,उतना ही भेद है इनमें ! विधाता द्वारा अर्थात विधि-सम्मत नियमानुसार वे देवता गण उत्कर्ष को पाकर अर्थात-
“अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः।।”
आप द्वारा प्रदत्त हविष्य से तृप्त होते हुवे देवता पितरों को भी हव्य में भाग देते हैं ! आप ये जो-“स्वाहा” द्वारा आहुति देते हैं वो देवताओं के लिये है, तथा-“स्वधा” द्वारा यह आहुति पितरों को किन्तु  देवताओं के द्वारा और यम के माध्यम से प्राप्त होती है!!
जैसा कि -“स्वधा” शब्द स्वयं को स्पष्ट करता है कि-“स्व-स्व(स्वयं के अच्छे बुरे कर्मानुसार तद्नुसार निर्देषित अलग-अलग अच्छे-मिश्रित और बुरे इन तीन प्रकार के लोकों में गये-“स्व-धाम”में गये) अभी इसमें एक बात और भी हमें समझनी होगी- “हवीर्ष्युशन्नुशभ्दिः प्रतिकाममत्तु”इस हेतु पितरों को सहमत तथा उत्कण्ठित होना भी तो चाहिये ?
अर्थात ये निश्चित है कि पितर आपके द्वारा प्रदत्त हविष्य को यम के द्वारा लेने से अस्वीकार भी कर सकते हैं ! अर्थात आपके द्वारा किया हुवा तर्पण व्यर्थ भी हो सकता है ! और ऐसा क्यूँ ?
प्रिय मित्रों ! मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि कभी अपने माँ बाबा, बड़े-बुजुर्गों और पूर्वजों के संदर्भ में कोई भी कठोर वाणी मत कहना आप ! कहना तो छोड़ दो मन में ऐसे विचारों को भी लाना मत। वे जहाँ स्थूल हैं,वहीं मृत्योपरांत सूक्ष्म जीवी रूपों से भी हैं !वे सबकुछ जानते हैं ! कम से कम आपको तो अच्छे से जानते ही हैं ! आपका-उनके जीवित रहते उनके प्रति कैसा व्यवहार था ! कैसे उनसे बोलते थे ! कितनी उनके लाचार होने पर सेवा की ! उनके लिये कितना कठोर अथवा अच्छा विचार था ! कितना उनका उपहास किया अथवा प्रशंसा की ! उनपर आपकी दृष्टि थी अथवा उनकी सम्पत्ति पर आपकी दृष्टि थी ये आप चाहे कितने भी अच्छे तथा धार्मिक हों किन्तु यदि उन्होंने ये जान लिया कि आपके उनके प्रति कैसे मनोभाव हैं ! तो वे शायद जीवित रहते समाज की मर्यादाओं और आपकी निंदा न हो !
इसलिये घुट-घुट कर आपके दिये टुकड़ों को खाकर अपने आप को जीवित-मृतक तुल्य रख लें ! किन्तु मरने के बाद आप चाहे जितने धूम-धाम से उनकी अंत्येष्टि करो ! वार्षिक श्राद्धादि करो !गया पिण्डादि करो ! वे उसपर थूकने भी आयेंगे ! हो सकता है कि आपके लिये उन्होंने अनेकानेक पाप-पुण्य कर धन-वैभव जुटाया हो ! जिसके कारण वे आज अच्छे पितर लोक में अथवा कुम्भीपाक नर्क में सड रहे हों किंतु कुछ भी हो वो आपके पितर है ! जितना अभिमान आपमें है उससे थोडा अधिक ही उनमें भी होगा ! वो भूखे-प्यासे यमराज के साथ आपके द्वारा सम्पादित श्राद्ध में बिना मन के आये बैठे तो रहेंगे किन्तु वो-“पिण्डादि” नहीं लेंगे। और इसी के साथ इस ऋचा की प्रबोधिनी पूर्ण करता हूँ!!सूक्त की ९ वीं ऋचा के साथ पुनः उपस्थित होता हूँ!..– आनंद शास्त्री सिलचर, सचल दूरभाष यंत्र सम्पर्कांक 6901375971″

पितृ-सूक्त नौवां मंत्र,प्रथम भाग-उन्नीसवां अंक-
मित्रों ! वैसे मैं आपको यह भी बताना उचित समझता हूँ कि पिछली ८ ऋचायें पितरों की प्रशन्नता हेतु श्राद्धादि कर्मों में प्रार्थना हेतु की गयी हैं तथा ये आगे की ६ ऋचायें अग्नि से प्रार्थित हैं कि वे पितरों को लेकर हविष्य ग्रहण करने हेतु पधारने की कृपा करें-
“ये तातृषुर्देवत्रा जेहमानाहोत्राविदः स्तोमतष्टासो अर्कैः।आग्नेयाहिसुविदत्रेभिरर्वाङ्सत्यैः कव्यैः पितृभिर्धर्मसभ्दिः।।”
अर्थात-“अनेक प्रकार के हवि-द्रव्योंके ज्ञानी अर्कों से स्तोमोंकी सहायता से जिनका निर्माण किया है,ऐसे उत्तम ज्ञानी, विश्वासू और धर्म-नामक हविके पास बैठनेवाले”कव्य” नामक हमारे पितर देवलोक में स्वाँस लेने तक की अवधि में व्याकुल हो गये हैं ! उनको साथ लेकर हे अग्नि देव ! आप यहाँ उपस्थित हों।”
प्रिय मित्रों ! पुनश्च इस ऋचा में ऋषि कहते हैं कि-“होत्राविदः स्तोम तष्टासो अर्कैः”अर्थात विज्ञ ज्ञानी याजक तथा पुरोहितों द्वारा जिस नाना प्रकार के अर्कों से यह हविष्य आपके लिये बनायी गयी है।
अर्थात ये तो निश्चित है कि हविष्य में निर्मित “सोमरस” अर्कों द्वारा अर्थात द्रव्यों के सार-तत्त्व से ही निर्माण करने की परम्परा है ! जिसका अब लोप प्राय होता जा रहा है ! मुझे यहाँ बराक उपत्यका में कुछ धार्मिक पुरोहितों द्वारा दुर्गा पूजा,काली पूजा,अन्यान्य विशेष धार्मिक कर्मकांड के पश्चात आसन से उठने के पूर्व-“कारन” अर्थात बिना सोमपान( यहाँ के लिये शराब अर्थात दारू) पिये उठते ही नहीं ! उनके कथनानुसार पूजा पूर्ण हो ही नहीं सकती ! ऐसी स्थिति में मुझे गुनगुनाने का दिल करता है कि-“पण्डित जी ! मेरे मरने के बाद ! इतना सा कष्ट उठा लेना-मुख में मेरे गंगाजल की जगह थोडी मदिरा टपका देना” ये शराबियों के कारण अर्कों की निर्माण पद्धतियाँ इतनी दुःषित तथा भ्रष्ट हो चुकी हैं कि अर्कों और मद्य के भेद को भी सामान्य समाज न जानते हैं और न ही जानने की कोशिश ही करते हैं !
जबकि यह चरकादि आयुर्विदों द्वारा इसके अंतर को अनेक पुस्तकों में स्पष्ट रूप से पृथक-पृथक समझाया गया है। आप स्वयं ही विचार करें-“मृत संजीवनी सुरा,सुरा संजीवनी” जैसी जीवनदान देने वाली आयुर्वेदिक सुरा के लेबल लगाकर घटिया दर्जे की आयुर्वेदिक कम्पनियों ने महुआ की शराब बेचनी शुरू कर दी।
(१)=जैसेकि दशमूलारिष्ट,अशोकारिष्ट,अर्जुनारिष्ट,अश्वगंधा रिष्ट, धृतकुमार्यासव,त्रिफलासव,महामञ्जिष्ठासव आदि के निर्माण हेतु उनमें रखी जाने वाली काषठ औषधियों को एक घड़े में जल-मधु तथा खाँड़ के साथ रखकर उसमें धातकी-पुष्पों को डालकर–तदोपरान्त घड़े के मुख को कपड़-मिट्टी से भली-भाँति बंदकर ९० दिनों तक भूमि में गाड़ने के उपरान्त उन्हे निकालकर भली-भाँति छानकर चिकित्सकों के परामर्शोनुसार व्याधियों में सेवन का विधान है—ये-“अर्क” नहीं हैं ! और इन्हे आप मदिरा भी नहीं कह सकते ! ये आसव तथा अरिष्ट हैं।
(२)=और दूसरी तरफ सड कर फेंके जाने वाले अंगूर अथवा महुवे को सड़ाकर और अब तो उसमें यूरिया तथा आपकी ऐवरेडी जैसी बैटरियों के अंदर के कार्बन डालकर उनका पाताल-यंत्र से अर्क निकाला जाता है जिसे आप अब-“शराब” कहते हैं-यह भी “अर्क”नहीं है ! कीड़े पड़ जाते हैं इसमें ! और इसे ही लोग देवी-देवताओं को चढाकर अपने आपको धार्मिक होने का ढोंग करते हैं ! और पीकर-“गटर” में गिरते हैं।
(३)=पुदीना,तुलसी,सौंफ,खस,चन्दन,गुलाब,कमल,अजवाइन,
दूर्वा आदि अनेकानेक ताजी औषधियों को रात्रि-काल में जल और थोड़ी सी शर्करा के साथ भिंगो देते हैं तथा प्रातःकालमें पाताल यंत्र से उसका अर्क निकालते हैं ! अर्थात-“आसवन” करते हैं ! यह सांसारिक रूप से- आयुर्विज्ञान की दृष्टि से शुद्ध-अर्क कहा जाता है ! किन्तु-“सोमरस” यह भी नहीं है।
(४)= प्रिय मित्रों ! यज्ञ-भूमि में तत्काल ही अष्ट-वर्गादि औषधियों,सोमवल्ली,ब्राम्ही,कृष्णपर्णी आदि के निकाले हुवे अर्क में मधु तथा गो-दुग्ध को मिश्रित कर जिसको देवताओं को अर्पित करने हेतु निर्मित किया जाता है-“सोमरस” उसे कहते हैं !वैसे यव,दूर्वा,तिलमधु और खाँड का भी प्रयोग आप सोमरस हेतु करें तो भी यह शास्त्र सम्मत  है।
पुनश्च ऋषि कहते हैं कि-“ये तातृषुर्देवत्रा जेहमाना” ऐसे उत्तम ज्ञानी, विश्वासू जन ही-“होता” अथवा पुरोहित हो सकते हैं!!अर्थात श्राद्धादि कर्म पूर्णतया वैज्ञानिकीय विधियों से यदि किये जाते है तभी आपके पूर्वजों को वो आपकी यज्ञ-भूमि तक आकर्षित करने में सक्षम हो सकते है। आज मैं देखता हूँ कि जहाँ देखो वहाँ यज्ञादि कर्म हो रहे हैं; किन्तु ७० % याजक, पुरोहितों तथा ब्रम्हाओं को इन विधाओं में न कोई रुचि हैऔर न ही इनका ज्ञान। किन्तु यहाँ यह उल्लेखनीय है कि हमारे घुंघुर में आयोजित श्रीरूद्र महायज्ञ के अंतर्गत यज्ञाचार्य जी ने इसीप्रकार यथोपलब्ध सामग्रियों से सोमरस का निर्माण किया था।
ऋचा में आगे कहते हैं कि-“सत्यैःकव्यैःपितृभिर्धर्मसभ्दिः -धर्म-नामक हविके पास बैठने वाले”कव्य” नामक हमारे पितर देवलोकों में स्वाँस लेने तक की अवधि में व्याकुल हो गये हैं !
आप यह निश्चित रूप से मान लें कि जिस प्रकार आपकी हविष्य से तृप्त हुवे देवताओं के द्वारा हुयी वर्षा से आप तृप्त होते हैं ! और ऐसा श्रीकृष्ण जी ने गीता में कहा भी है। और यदि ये यज्ञादि क्रियायें शास्त्रोक्त विधाओं से न हों तो देवता क्लान्त तथा दुर्बल हो जायेंगे ! और वे क्लान्त, निर्बल तथा रूष्ट हुवे देवगण !और परिणातः वृष्टि-अनावृष्टि, भूमि-कम्प,जल-प्रलय,नैसर्गिक प्रकृति का पराभव,दुर्भिक्ष तथा नाना प्रकार की आपदायें हमें कष्ट देंगी ! और दैवीय शक्तियों के पराभव से आसुरी सम्पदाओं का विकास भी होगा ! उन्हे प्रोत्साहन मिलेगा ! इसी के साथ ऋचाके इस अंक को यहाँ विश्राम देता हूँ और शीघ्र ही इसके अगले अंक के साथ उपस्थित होता हूँ–आनंद शास्त्री सिलचर, सचल दूरभाष यंत्र सम्पर्कांक 6901375971″

पितृ-सूक्त नौवां मंत्र द्वितीय भाग-बीसवां अंक-
समादरणीय आत्म बंधुओं ! पुनश्च ऋषि कहते हैं कि-
“ये तातृषुर्देवत्रा जेहमानाहोत्राविदः स्तोमतष्टासो अर्कैः।आग्नेयाहिसुविदत्रेभिरर्वाङ्सत्यैः कव्यैः पितृभिर्धर्मसभ्दिः।।”
इस ऋचा के द्वितीय अंक में मैं आपसे-” सत्यैःकव्यैःपितृभि र्धर्मसभ्दिः”पर चर्चा करता हूँ ! ऋषि कहते हैं कि-“ऐसे उत्तम ज्ञानी, विश्वासू और धर्म-नामक हविके पास बैठनेवाले”कव्य” नामक हमारे पितर देवलोकों में स्वाँस लेने तक की अवधि में व्याकुल हो गये हैं !”अब मैं इसे आपसे समझता हूँ ! आप ज्योतिषीय अथवा शास्त्रीय किसी भी विधि से समझें,आप किसी भी मत-मतान्तर की दृष्टि से देखें ! आपकी आत्मा ये स्वीकार करेगी कि आपके पूर्वज आपसे संतुष्ट हैं अथवा असंतोष के कारण आपसे रूष्ट हैं।
जब किसी अपने आश्रित अथवा अपने शुभचिंतक की आप अवहेलना करोगे,तो भला उसे शाँति कैसे मिलेगी ? और यदि वो अशांत होंगे तो आपको या मुझे शाँति कैसे मिलेगी ?
अभी कुछ दिनों पूर्व मेरे पडोस में किसी का त्रयोदशाह था ! इस हेतु आचार्यों ने शय्यादानादि के संदर्भ में स्पष्ट कह दिया कि आप १५००० ₹ दे देना ! हम लोग पूरी सामग्री ले आयेंगे ! हमारी दक्षिणा आप पृथक से देना। अब ये सामग्रियों उनके सामाजिक स्तरानुसार कम से कम ४०००० ₹ की थीं ! तो यजमान सहर्ष सहमत हो गये।
(१)=और त्रयोदशाह पर पुरोहितों ने पुरानी शय्या,पात्र,आसन, वस्त्र, कलश,नारियल तक लाकर उन्हीं से पूरी विधि सम्पन्न करा दी ! न जाने कितने लोगों की शय्यादान से लेकर अन्यान्य कर्मकाण्डों में इन्ही एक सामग्रियों का उपयोग किया जाता रहा और आगे भी होता रहेगा ! और ऐसा ही-“गया,प्रयागराज संगम, हरिद्वार,कुरुक्षेत्र” में भी होता है। हमारे प्रसिद्ध मन्दिरों की यह स्थिति हो चुकी है कि-” मैं दो वर्ष पूर्व विन्ध्येश्वरी पीठ पर दर्शन हेतु गया था ! वहां पूजा सामग्री की सैकड़ों दुकानों पर -“दो सौ एक्यावन” ₹ में बहुत ही सुन्दर बडी फूल की माला,बहुत अच्छे स्तर की चुनरी,अगरबत्ती,दीपक,प्रसाद,सुहाग सामग्री,रोरी,सिन्दूर,चूडियां, प्रसाद सबकुछ उपलब्ध था ! ये उन्होंने सदाव्रत खोल रखा था ? अथवा सरकार ने पूजन सामग्री पर सब्सिडी दे रखी है ?
(२)=मैं देखता हूँ कि जब भी मैं कभी किसी आध्यात्मिक उद्देश्य से किसी वस्त्र तथा पात्रादि जिन्हे आचार्यों को दान देना हो !अथवा कि मंदिरों में चढाना हो ! तो सस्ते और बिल्कुल घटिया स्तर की सामग्रियों का ही हम आप चयन करते हैं। मित्रों ! इसका क्या अर्थ होता है ? जिस प्रकार हम अपनी पत्नी के लिये पांच हजार की साडी और माँ के लिये दो सौ की साडी लाते हैं, और देवी माँ को चढाने के लिये दस रुपये की चुनरी लाते हैं! अपने और अपने बच्चों के लिये ब्रान्डेड कपडे ! पिताजी के लिये चार सौ रुपये के कपडे,भगवान जी के लिये बीस रुपये का गमछा और पण्डित जी के लिये ढूंढ कर सौ रुपये की धोती लाते हैं ?
(३)=जब भी हम दोनों अपने लिये चावल-दाल सब्जी बनाते हैं  तो बैठकर चश्मा लगाकर कायदे से उनमें से कंकड़-पत्थर बीनकर धोकर तब पकाता हूँ,किन्तु यज्ञ हेतु तिल,जौ आदि सामग्रियों के साथ ऐसा तो नहीं करता ? आध्यात्मिक कार्यों में हम घटिया सामग्री क्यों ढूंढते हैं ?
(४)=आचार्य गण भी अपनी मन मर्जी से दक्षिणा पहले ही नियत कर लेते हैं ! और यदि वे ऐसा नहीं करते तब तो मैं उनके अथक परिश्रम को नजरअंदाज करता हुवा उन्हे कम से कम दक्षिणा देने का घृणित प्रयास करता हूँ। हम और वे दोनों ही आकण्ठ भ्रष्टाचार में डूब चुके हैं !
(५)=योग्य आचार्यों को मैं मँहगे होंगे ये सोचकर मंत्र, उच्चारण, विधियों से अनभिज्ञ लोगों से कर्मकाण्डादि कराता हूँ ! तो वो तो अधूरी होगी ही।
प्रिय मित्रों ! भूखे हैं आपके पूर्वज ! आपके देवता निर्बल होते जा रहे हैं ! यज्ञादि श्रेष्ठ कर्म अपनी शास्त्रीय विधाओं की दयनीय स्थिति पर आपके ऋषि अश्रुपात कर रहे हैं ! न जाने कब से आपकी अँजली उन्हें नही मिली ! वे धर्म-वेदी पर बैठकर आपकी राह देख रहे हैं। और ऐसी स्थिति में निःसंदेह उनका श्राप हमको लगेगा ही ! जैसा कि आप जानते हैं कि मैंने ज्योतिष शास्त्र का षट्शास्त्रों के गहन अध्ययन किया है ! मैंने देखा है कि कदाचित् इसी कारण तीस प्रतिशत से भी अधिक जातक-“कालसर्प योग और नाना पितृदोषों” से पीडित हैं ! वे ब्रम्हकपाल,नारायणी शिला से लेकर त्रयम्बकेश्वर-नासिक तक की परिक्रमा लगाते ही रहते हैं ! कारण है उसका- वे अतृप्त आत्मायें हमें भी चैन से जीने नहीं देंगी ! तो इस हेतु हम-आप क्या कर सकते हैं,ये एक यक्ष प्रश्न है।
और इसका उत्तर मैं आपके साथ मिलकर ढूंढने की कोशिश करता हूँ ! और जहाँ तक मैं समझता हूँ तो इनका उत्तर यह पितृसूक्त ही अपनी अगली ऋचाओं के माध्यम से हमें देगा ! क्योंकि त्रिकालदर्शी हमारे ऋषियों को प्रथम ही इन संभावनाओं का आभास हो चुका था। आगे पुनश्च ऋषि कहते हैं कि -“आग्नेयाहि सुविदत्रेभिरर्वाङ् सत्यैःकव्यैःपितृभिर्धर्मसभ्दिः” अर्थात उन पितरों को साथ लेकर हे अग्नि देव ! आप यहाँ उपस्थित हों ! अर्थात अग्नि देवता ही आप और देवताओं तथा आप और आपके पितरों के मध्य एक सेतु हैं-
“ये तातृषुर्देवत्रा जेहमाना होत्राविदः स्तोम तष्टासो अर्कैः।आग्नेयाहि सुविदत्रेभिरर्वाङ् सत्यैःकव्यैःपितृभिर्धर्मसभ्दिः।।”
और इसी के साथ इस ऋचा की प्रबोधिनी पूर्ण करता हूँ!!सूक्त की १० वीं ऋचा के साथ पुनः उपस्थित होता हूँ!..–आनंद शास्त्री सिलचर, सचल दूरभाष यंत्र सम्पर्कांक 6901375971″

पितृ-सूक्त दसवां मंत्र प्रथम भाग-इक्कीसवां अंक-
समादरणीय आत्म बंधुओं ! पुनश्च ऋषि कहते हैं कि-
“ये सत्यासो हविरदोहविष्पा इन्द्रेणदेवैः सरथं दघानां।
आग्नेयाहिसहस्त्रंदेववन्दैशरैः पूर्वैः पितृभिर्धर्मसभ्दिः।।”
अर्थात-“कभी न बिछुड़नेवाले ठोस हवि का भक्षण करने वाले, द्रव हविका पान करने वाले, इन्द्रादि देवताओं के साथ एक ही रथ में बैठकर प्रयाण करने वाले,- देवोंकी वन्दना करने वाले,धर्म नामक हविके समीप बैठने वाले जो हमारे पूर्वज और पितर हैं,उन्हे सहस्त्रों की संख्या में लेकर हे अग्निदेव ! यहाँ पधारें।”

प्रिय मित्रों ! आप ऋग्वेदोक•१•९४•४•का इस संदर्भ में अवस्य ही स्मरण करें-“अग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव।।”
अर्थात हे अग्नि ! हम तेरे मित्र भाव में दुःखी और नष्ट न हों।
वस्तुतः मै समझता हूँ कि मैं आर्य हूँ और मेरे पूर्वज आर्य थे ! आर्य अर्थात अग्नि के उपासक अथवा नैसर्गिक प्रकृति की उपासना करने वाले ! और प्रकृति अथवा जो अग्नि के उपासक होंगे ! जो सूर्य,चन्द्र,पृथ्वी,जल,नदियों और पहाडों के होंगे ! उनका दृष्टिकोण- व्यापक, वैज्ञानिकीय,सार्वभौमिकीय ही नहीं ब्रम्हाण्डात्मक भी होग ! अर्थात वे पर्यावरण के रक्षक और पाखंड से दूर होंगे।
ऋचा में कहते हैं कि-“ये सत्यासो हविरदोहविष्पा”-कभी न बिछुड़नेवाले ठोस हविका भक्षण करने वाले,द्रव हवि का पान करनेवाले जो अग्नि देव हैं ! आप ये याद रखें कि ये शोषल-मीडिया की जो दुनिया है ! ये बहुआयामी है ! आधुनिक शिक्षित समाज के योगदान को मैं आध्यामिक योगदानों से जरा सा भी कम नहीं आँकता ! जिस प्रकार-“सी•वी•रमन• जी ने एक सिद्धांत दिया कि किसी भी पारदर्शी सतह से टकराकर प्रकाश हजारों हजार भागों में बंटकर और भी विस्तृत हो जाता है ! और यही हमारे ऋषि-मुनियों की वैदिकीय मान्यता रही है ! हजारों हजार साल से रही है।
मित्रों ! अग्नियों को जैसे अध्यात्म जगत् पंञ्चाग्नियों में विभक्त कर देखता है ! वैसा ही दृष्टिकोण विज्ञान का भी है ! ये भेद तो आधे-अधूरे ज्ञान के कारण मुझ जैसी मूर्खोंको दृष्टिगोचर होता है ! फिर भी मेरा उद्देश्य तो यज्ञाग्नि के भेद पर आप का ध्यान आकर्षित कराने का है। मैं सुना हूँ कि महर्षि भारद्वाज ने समस्त गृंथों के अध्ययन का संकल्प लिया और उन्हें पढते -पढते हजारों हजार वर्ष व्यतीत हो गये ! अंततः उनके समक्ष महेन्द्र अर्थात इन्द्र देव ने उपस्थित होकर एक मुट्ठि भर मिट्टी रख दी-और सामने स्थित दो विशाल-पर्वतों को ईंगित करते हुवे उन्हे कहा कि हे ऋषि-राज ! ये जो आप ने अभी तक अध्ययन किया है वो इस एक मुट्ठी के बराबर है ! और वो जो सामने दो पहाड़ दिख रहे हैं,उतना अध्ययन आपका अभी शेष है-
“यत्सार भूतंतदूपासितव्यम।।”
प्रिय मित्रों ! आप लोग मुझसे नाराज मत होजाना ! मैं मानव हूँ, स्वभाव से ही अल्पज्ञानी,एक बात कहता हूँ-जैसे कि आज मैं राम,अग्नि,कृष्ण,शिव,सूर्य,ब्रम्हा,दुर्गा,चन्द्र,भैरव प्रजापति, हनुमानजी,गणेश,इन्द्र,वरूण आदि-आदि देवी-देवताओं की उपासना करता हूँ ! इसे आप एक-“काॅकटेल” कह सकते हो ! इसके लिये अंग्रेजी में एक बहूत ही अच्छा शब्द है,इसे आप-” Anthropomorphism “भी कह सकते हैं ! किन्तु ये -“फोबिया” नहीं हैं।
मैंने अपनी-आपकी शारीरिक संरचना के आधार पर उन देवों को गढ लिया ! हमने अपने मुक्त ऐतिहासिक परमार्थपदावलीन विभूतियों तथा वैदिक वैज्ञानिकीय तत्त्वों के प्रतीक गूढतम रहस्यात्मक भेदों को आपस में उलझा कर रख दिया ! परिणाम स्वरूप ब्रम्हाण्ड की श्रेष्ठतम विचारधारा पर-“अंधश्रद्धालू” होने की अभिशाप मयी तलवार आज लटक रही है।
मैं समझता हूँ कि-“अग्नि”ही संकल्प है ! आप अग्नि अर्थात उर्जा को पाकर ही किसी भी वस्तु का निर्माण करते हैं ! और यह अग्नि, उर्जा-“सोम” अर्थात मन की आहुति से वृद्धि को प्राप्त होती है।
जैसे कि अग्नि में डाला हुवा कोई भी ठोस अथवा द्रव पदार्थ किसी न किसी तापक्रम पर सूक्ष्म होकर ऊर्ध्वगामी हो जाता हैं- “वाचश्चित्तस्योत्तरोत्तरिक्रमो यद्यज्ञ” इसे ही-“यज्ञ” कहते हैं ! और इसे ही इस ऋचा में ऋषि ने कहा है कि-“ये सत्यासो हविरदोहविष्पा- अर्थात कभी न बिछुड़नेवाले ठोस हविका भक्षण करने वाले,द्रव हविका पान करने वाले” और उन आहुतियों से अग्नि और भी प्रज्वलित होती है ! अतः पदार्थ ही सोम हैं और अग्नि ही सूर्य है। जैसे-जैसे आपकी बाह्यदृष्टि बढती जाती है ! वैसे-वैसे ही आपमें ईक्षायें,वासनायें अर्थात अग्नि बढती जाती हैं ! अर्थात आपकी अंतर्मुखी प्रवृत्तियों का कमतर होता जाना ही चन्द्रमा अर्थात मन के भटकाव का मुख्य कारण है।
अभी एक बात और भी है- प्रकाश-अंधकार, जीवन-मृत्यु, स्थितीरता-गति,स्त्री-पुरूष ये दोनों साथ-साथ रहते हैं !
देवता और पितर साथ-साथ रहते हैं ! एक ही रथ पर रहते हैं !और वह रथ है,अग्नि-“इन्द्रेणदेवैः सरथं दघानां” ऋचा यह कहना चाहती है कि- इन्द्रादि सभी देवताओं को पितरों केसाथ अग्नि ही “यम-अर्थात काल,स्थिति,संयोगानुसार प्रज्वलित उष्ण अग्नि” लेकर जाती है ! तथा पुनश्च शीतल-अग्नि अर्थात वर्षा रूपी रथ पर चढकर ये देवता और पितर पुनश्च आ जाते हैं।

इसी के साथ ऋचाके इस अंक को यहाँ विश्राम देता हूँ और शीघ्र ही इसके अगले अंक के साथ उपस्थित होता हूँ–.–आनंद शास्त्री सिलचर, सचल दूरभाष यंत्र सम्पर्कांक 6901375971″

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