नई दिल्ली। रक्षाबंधन का पर्व केवल भाई-बहन के स्नेह और विश्वास का उत्सव नहीं, बल्कि समाज में प्रेम, संवेदना और जिम्मेदारी के भाव को मजबूत करने का अवसर भी है। इस वर्ष रक्षाबंधन पर पूर्वोत्तर की ग्रामीण बहनों जीता बोरुआ एवं जूरी सैतिया ने अपने हुनर और मेहनत से इस पर्व को एक नई और प्रेरणादायी पहचान दी। असम की ग्रामीण महिलाओं द्वारा अपने हाथों से तैयार की गई इको-फ्रेंडली बाँस की राखियों ने स्नेह के साथ-साथ महिला आत्मनिर्भरता, स्वावलंबन, स्थानीय हुनर और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। इसी प्रेरणादायी पहल के अंतर्गत असम से आई ग्रामीण बहनों ने केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री माननीय श्री भूपेंद्र यादव जी को अपने हाथों से तैयार की गई बाँस की राखी बाँधकर रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ दीं। यह पल ग्रामीण बहनों के लिए भावनात्मक और गौरवपूर्ण रहा। उनके हाथों से बनी राखी में केवल बाँस की कारीगरी ही नहीं, बल्कि उनके परिश्रम, आत्मविश्वास और बेहतर भविष्य के सपनों की झलक भी दिखाई दी।
इस अवसर पर सूर्या फाउंडेशन के वाइस चेयरमैन आदरणीय वेद जी एवं आदर्श गाँव योजना प्रमुख श्री प्रमोद आसरे जी भी उपस्थित रहे। ग्रामीण बहनों के इस प्रयास को प्रोत्साहित करते हुए उनके हुनर और आत्मनिर्भरता की दिशा में किए जा रहे प्रयासों को सराहा गया। सूर्या फाउंडेशन के सहयोग से पूर्वोत्तर की ग्रामीण महिलाओं को प्रशिक्षण, मशीन एवं आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराकर उनके पारंपरिक हुनर को सम्मानजनक आजीविका के अवसरों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। इसका उद्देश्य महिलाओं को केवल प्रशिक्षण देना नहीं, बल्कि उनके कौशल को आय के स्थायी साधन में बदलकर उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त और आत्मनिर्भर बनाना है। बाँस पूर्वोत्तर के ग्रामीण जीवन और संस्कृति से गहराई से जुड़ा प्राकृतिक संसाधन है। इसी स्थानीय संसाधन को रचनात्मक कौशल के साथ जोड़कर तैयार की जा रही बाँस की राखियाँ ग्रामीण महिलाओं के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय का माध्यम बनने की दिशा में एक सकारात्मक पहल हैं।
बाँस की राखी की खासियत केवल यह नहीं है कि यह पर्यावरण-अनुकूल है, बल्कि यह ग्रामीण महिलाओं के जीवन में आए बदलाव की कहानी भी कहती है। एक ओर यह प्लास्टिक एवं कृत्रिम सामग्री के विकल्प के रूप में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाती है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण बहनों के हुनर को बाजार और आजीविका से जोड़ने का माध्यम बनती है। यह राखी उस सोच का प्रतीक है, जिसमें पर्यावरण संरक्षण और महिला सशक्तिकरण एक साथ आगे बढ़ते हैं। जब किसी ग्रामीण बहन के हाथों से बनी राखी किसी भाई की कलाई तक पहुँचती है, तो उसके साथ उस बहन की मेहनत, उम्मीद और आत्मसम्मान भी पहुँचता है। यही इस पहल की सबसे बड़ी खूबसूरती है।
रक्षाबंधन के इस अवसर पर यह पहल समाज को एक महत्वपूर्ण संदेश देती है कि त्योहारों की खुशियों को यदि स्थानीय उत्पादों और ग्रामीण कारीगरों से जोड़ा जाए, तो उत्सव के साथ-साथ आत्मनिर्भरता और स्वावलंबन को भी बढ़ावा दिया जा सकता है। पूर्वोत्तर की ग्रामीण बहनों द्वारा तैयार की गई ये बाँस की राखियाँ उनके हुनर को पहचान देने के साथ-साथ उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने की दिशा में प्रेरित कर रही हैं। यह प्रयास स्थानीय से वैश्विक, महिला स्वावलंबन और पर्यावरण संरक्षण की भावना को भी मजबूती प्रदान करता है।बाँस की यह राखी केवल भाई की कलाई पर बंधने वाली प्रेम की डोर नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर की बहनों के हुनर, मेहनत, स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता की कहानी है।