– दिलीप कुमार
लोकतंत्र में आम नागरिक के पास सबसे बड़ा हथियार उसकी आवाज है। जब उसके साथ अन्याय होता है, उसकी संपत्ति पर अवैध कब्जे का आरोप होता है, प्रशासन उसकी बात नहीं सुनता या किसी सरकारी व्यवस्था से उसे शिकायत होती है, तो संविधान और कानून उसे शिकायत करने, न्याय मांगने और संबंधित संस्थाओं का दरवाजा खटखटाने का अधिकार देते हैं।
लेकिन सवाल यह है कि जब शिकायत करने के सारे रास्ते खुले हों और फिर भी न्याय का रास्ता बंद हो जाए, तब आम आदमी कहां जाए?
श्रीमती विमला देवी (परिवर्तित नाम) की कहानी इसी सवाल को सामने रखती है।
वर्ष 2014 में उन्होंने अपनी मेहनत की कमाई से जमीन खरीदी। भविष्य के लिए सपने देखे। वर्ष 2017 में उनकी जमीन पर कथित कब्जे की स्थिति पैदा हुई। इसके बाद उन्होंने कानून का सहारा लिया। स्थानीय पुलिस से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों तक आवेदन दिए। जनप्रतिनिधियों और मंत्रियों तक अपनी बात पहुंचाई। राज्य सरकार के जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायत की। वहां अपेक्षित समाधान नहीं मिलने पर केंद्र सरकार के CPGRAMS पोर्टल का दरवाजा खटखटाया।
उम्मीद थी कि शिकायत जितने ऊंचे स्तर तक जाएगी, समाधान की संभावना उतनी ही बढ़ेगी।
लेकिन हुआ इसके उलट।
शिकायत ऊपर गई, अधिकारियों के बीच घूमी और अंततः फिर उसी स्थानीय तंत्र तक लौट आई, जहां से शिकायतकर्ता पहले ही निराश हो चुका था।
यहीं से शुरू होता है जनसुनवाई का असली चक्रव्यूह।
शिकायतकर्ता को न्याय चाहिए, ‘निस्तारण’ नहीं
सरकारी पोर्टल पर शिकायत दर्ज करना आज पहले से कहीं आसान है। मोबाइल फोन से शिकायत कीजिए, शिकायत संख्या प्राप्त कीजिए और ऑनलाइन स्थिति देखिए।
लेकिन डिजिटल सुविधा का अर्थ तभी है, जब उसके पीछे जवाबदेही भी हो।
किसी शिकायत को एक अधिकारी से दूसरे अधिकारी को भेज देना कार्रवाई नहीं है। शिकायत के जवाब में एक रिपोर्ट तैयार कर देना भी न्याय नहीं है। और पोर्टल पर ‘निस्तारित’ लिख देना इस बात का प्रमाण नहीं हो सकता कि नागरिक को वास्तविक राहत मिल गई।
प्रशासनिक निस्तारण और न्यायपूर्ण समाधान में अंतर समझना होगा।
यही अंतर हमारी शिकायत निवारण व्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा है।
जब आरोपी तंत्र ही जांचकर्ता बन जाए
मान लीजिए कोई नागरिक किसी स्थानीय अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ शिकायत करता है। यदि वही शिकायत फिर उसी अधिकारी के अधीनस्थ तंत्र को जांच के लिए भेज दी जाती है, तो भले ही जांच नियमों के अनुसार हुई हो, शिकायतकर्ता के मन में निष्पक्षता को लेकर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
यहां समस्या केवल भ्रष्टाचार की नहीं है।
समस्या हितों के टकराव और स्वतंत्र जांच की धारणा की भी है।
न्याय केवल होना नहीं चाहिए, न्याय होते हुए दिखाई भी देना चाहिए।
इसीलिए गंभीर शिकायतों के लिए स्वतंत्र जांच तंत्र की आवश्यकता महसूस होती है। शिकायत जिस कार्यालय या अधिकारी के खिलाफ हो, जांच उसी संरचना से बाहर के सक्षम अधिकारी अथवा स्वतंत्र प्रकोष्ठ को देने की व्यवस्था होनी चाहिए।
‘फॉरवर्डिंग मशीन’ नहीं बनें जनसुनवाई पोर्टल
देश में डिजिटल शासन का उद्देश्य कागजी लालफीताशाही कम करना था। लेकिन यदि डिजिटल पोर्टल केवल शिकायतों को ऊपर से नीचे भेजने की मशीन बन जाएं, तो तकनीक ने लालफीताशाही खत्म नहीं की—उसका केवल डिजिटल संस्करण बना दिया।
एक क्लिक में शिकायत आगे बढ़ती है।
दूसरे क्लिक में जवाब आता है।
तीसरे क्लिक में शिकायत बंद हो जाती है।
लेकिन इस पूरी प्रक्रिया के बीच कहीं वह नागरिक गायब हो जाता है, जिसने शिकायत की थी।
क्या उसकी समस्या हल हुई?
यही सवाल सबसे महत्वपूर्ण है।
अधिकारी की जिम्मेदारी सिर्फ रिपोर्ट भेजने तक क्यों?
शिकायत निवारण व्यवस्था में जवाबदेही का पैमाना बदलने की जरूरत है।
किसी अधिकारी का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उसने कितनी शिकायतों का निस्तारण किया। यह भी देखा जाना चाहिए कि शिकायतकर्ता की समस्या वास्तव में हल हुई या नहीं।
इसके लिए शिकायतकर्ता की स्वतंत्र प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण हो सकती है।
यदि नागरिक निस्तारण से असंतुष्ट है, तो उसके पास पुनर्विचार का सरल और प्रभावी विकल्प होना चाहिए। गंभीर मामलों में स्वतः स्वतंत्र समीक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए।
साथ ही, शिकायत के निस्तारण में यह स्पष्ट होना चाहिए कि—
- आरोप क्या था?
- जांच किसने की?
- किन दस्तावेजों और तथ्यों की जांच हुई?
- संबंधित पक्षों के बयान लिए गए या नहीं?
- निष्कर्ष किस आधार पर निकाला गया?
- और यदि आरोप सही पाया गया तो जिम्मेदारी किसकी तय हुई?
सिर्फ एक पंक्ति की रिपोर्ट—‘शिकायत का निस्तारण कर दिया गया’—लोकतांत्रिक जवाबदेही के लिए पर्याप्त नहीं होनी चाहिए।
अदालत हर समस्या का पहला और अंतिम उत्तर नहीं हो सकती
जब प्रशासनिक व्यवस्था से राहत नहीं मिलती तो नागरिक को अक्सर अदालत जाने की सलाह दी जाती है।
न्यायपालिका लोकतंत्र की महत्वपूर्ण संस्था है और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा में उसकी केंद्रीय भूमिका है। लेकिन यह भी सच है कि हर नागरिक लंबी कानूनी प्रक्रिया, वकील की फीस और वर्षों तक चलने वाले मुकदमे का बोझ उठाने की स्थिति में नहीं होता।
एक गरीब मजदूर, छोटा व्यापारी, मध्यमवर्गीय कर्मचारी या वृद्ध व्यक्ति यदि अपनी छोटी-सी संपत्ति अथवा अधिकार के लिए वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़ने को मजबूर हो जाए, तो उसके लिए न्याय की लागत स्वयं एक बड़ी समस्या बन जाती है।
इसलिए मजबूत प्रशासनिक शिकायत निवारण व्यवस्था अदालत का विकल्प नहीं, बल्कि अदालत तक जाने की आवश्यकता को कम करने वाला पहला सुरक्षा कवच होनी चाहिए।
जनता को थकाना लोकतंत्र की सफलता नहीं
किसी भी शिकायत व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता तब होती है जब शिकायतकर्ता अंततः यह सोचने लगे—
‘अब छोड़िए, कुछ होने वाला नहीं है।’
यही वह क्षण है जब व्यवस्था एक नागरिक को केवल उसकी समस्या से नहीं, बल्कि उसके अधिकार के प्रति उसके विश्वास से भी वंचित कर देती है।
यदि कोई व्यक्ति बार-बार आवेदन देता है, अलग-अलग कार्यालयों में जाता है, पोर्टल पर शिकायत करता है और अंततः केवल इसलिए शिकायत करना छोड़ देता है क्योंकि प्रक्रिया ने उसे थका दिया, तो यह केवल एक व्यक्ति की हार नहीं है।
यह संस्थागत विश्वास के लिए गंभीर संकेत है।
सुधार की शुरुआत यहीं से हो
जनसुनवाई को वास्तव में प्रभावी बनाने के लिए कुछ बुनियादी सुधारों पर गंभीरता से विचार होना चाहिए—
पहला— शिकायतकर्ता के खिलाफ शिकायत वाले अधिकारी या उसके प्रत्यक्ष अधीनस्थ से गंभीर शिकायतों की जांच न कराई जाए।
दूसरा— संवेदनशील मामलों में स्वतंत्र अथवा थर्ड-पार्टी जांच की स्पष्ट व्यवस्था हो।
तीसरा— ‘निस्तारण’ के बजाय वास्तविक समाधान को सफलता का पैमाना बनाया जाए।
चौथा— शिकायतकर्ता को निस्तारण से असहमति होने पर सरल पुनर्विचार प्रक्रिया मिले।
पांचवां— झूठी, अपूर्ण या महज औपचारिक जांच रिपोर्ट के लिए अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।
छठा— शिकायतकर्ता की स्वतंत्र प्रतिक्रिया को शिकायत निवारण प्रणाली का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए।
और सबसे महत्वपूर्ण—
जनसुनवाई को अधिकारी-केंद्रित नहीं, नागरिक-केंद्रित बनाया जाए।
आखिर जनसुनवाई किसके लिए है?
सरकारें बदलती हैं। अधिकारी बदलते हैं। पोर्टल बदलते हैं। तकनीक बदलती है। लेकिन नागरिक की मूल अपेक्षा नहीं बदलती—
वह चाहता है कि उसकी बात सुनी जाए और उसके साथ न्याय हो।
श्रीमती विमला देवी का मामला हमें इसी बुनियादी सवाल के सामने खड़ा करता है।
यदि शिकायत प्रधानमंत्री कार्यालय से मुख्यमंत्री कार्यालय, वहां से मुख्य सचिव, जिलाधिकारी, पुलिस अधिकारियों और फिर स्थानीय स्तर तक पहुंचती रहे, लेकिन शिकायतकर्ता की समस्या वहीं खड़ी रहे, तो हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि ‘शिकायत का निस्तारण क्यों नहीं हुआ?’
हमें यह पूछना चाहिए—
‘हमारी शिकायत निवारण व्यवस्था में ऐसी कौन-सी खामी है, जिसके कारण शिकायत बार-बार घूमकर उसी जगह लौट आती है?’
जनसुनवाई लोकतंत्र का सजावटी शब्द नहीं होना चाहिए।
यह उस नागरिक का भरोसा है, जो अपनी ताकत से बड़ी किसी व्यवस्था के सामने खड़ा होकर कहता है—
‘मेरे साथ अन्याय हुआ है, मेरी बात सुनीजिए।’
उस आवाज का जवाब यदि केवल एक फाइल नंबर, एक अग्रेषण पत्र और एक औपचारिक निस्तारण रिपोर्ट है, तो व्यवस्था को स्वयं से सवाल पूछना होगा।
क्योंकि लोकतंत्र की असली परीक्षा यह नहीं है कि सत्ता तक शिकायत कितनी जल्दी पहुंचती है।
असली परीक्षा यह है कि—
शिकायत लेकर आया आम आदमी न्याय लेकर वापस लौटता है या निराश होकर।
— संपादकीय
प्रेरणा भारती हिंदी दैनिक, शिलचर