आज की युवा पीढ़ी को अक्सर सबसे बुद्धिमान, सबसे जागरूक और सबसे तेज पीढ़ी कहा जाता है। तकनीक, सूचना और सोशल मीडिया तक इसकी पहुंच निश्चित रूप से अभूतपूर्व है। लेकिन एक गंभीर सवाल यह भी है कि क्या सूचना की अधिकता ने वास्तव में समझ और विवेक को भी बढ़ाया है?
पिछले कुछ दिनों से दिल्ली के जंतर-मंतर और उसके आसपास के प्रदर्शनों के अनेक वीडियो सोशल मीडिया पर लगातार सामने आ रहे हैं। इन वीडियो को किसी बाहरी स्रोत ने नहीं, बल्कि उसी भीड़ में शामिल लोगों ने बनाया है। इसलिए ये वीडियो उस आंदोलन की वास्तविक मानसिकता और वातावरण की एक झलक भी प्रस्तुत करते हैं।
वीडियो में बड़ी संख्या में युवा लड़के-लड़कियां दिखाई दे रहे हैं। उनके हाथों में मोबाइल हैं, कैमरे चालू हैं और हर कोई किसी न किसी रूप में रिकॉर्डिंग कर रहा है। प्रदर्शन, नारे, मीडिया को दिए जा रहे बयान और सोशल मीडिया पर वायरल होने की होड़—कई जगह यह सब किसी गंभीर जनांदोलन से अधिक एक सार्वजनिक प्रदर्शन जैसा दिखाई देता है।
लोकतांत्रिक विरोध का अधिकार हर नागरिक को है। सरकार की आलोचना करना भी लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा है। लेकिन क्या विरोध के नाम पर अश्लील भाषा, हिंसा का आह्वान, प्रधानमंत्री या किसी अन्य व्यक्ति के लिए जान से मारने जैसी बातें कहना भी लोकतांत्रिक अधिकार का हिस्सा है?
किसी लड़की को कैमरे के सामने यह कहते हुए सुना गया कि प्रधानमंत्री को गोली मार देनी चाहिए। यह बात वह हंसते हुए कह रही थी। ऐसे वक्तव्यों के कानूनी और सामाजिक परिणाम हो सकते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि कई लोगों को इसका सामान्य-सा अंदाजा भी नहीं है।
यही आज की सबसे बड़ी चिंता है—हमारे पास अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो है, लेकिन क्या उसके साथ आने वाली जिम्मेदारी का बोध भी है?
आंदोलन और अराजकता के बीच अंतर
किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन की अपनी कुछ बुनियादी मर्यादाएं होती हैं। उसके पास स्पष्ट और वैध मांगें होनी चाहिए। उसके पीछे नेतृत्व और संगठन होना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात—वह शांतिपूर्ण होना चाहिए।
जब प्रदर्शनकारी पुलिस पर पत्थर फेंकते हैं, पत्रकारों पर हमला करते हैं, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं या संसद जैसे संवैधानिक संस्थानों में जबरन प्रवेश का प्रयास करते हैं, तब सवाल उठता है कि क्या इसे अब भी आंदोलन कहा जा सकता है?
सरकार की आलोचना कीजिए। नीतियों का विरोध कीजिए। प्रदर्शन कीजिए। लेकिन हिंसा और अराजकता को लोकतांत्रिक अधिकार का नाम नहीं दिया जा सकता।
राजनीति के खेल में मोहरा कौन बन रहा है?
देश के विभिन्न हिस्सों में बैठे लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या इन प्रदर्शनों में राजनीतिक हित हावी हो चुके हैं। मंचों से दिए जा रहे कुछ बयान, राजनीतिक दलों की सक्रियता और उकसावे वाली भाषा इस आशंका को और मजबूत करती है।
राजनीतिक दल अपने हितों के लिए आंदोलनों का समर्थन करते रहे हैं। यह राजनीति का हिस्सा है। लेकिन असली सवाल उन युवाओं से है जो बिना पूरी जानकारी के किसी भी भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं।
किसी नेता का भाषण सुनकर नारे लगाने से पहले यह समझना जरूरी है कि उस आंदोलन का उद्देश्य क्या है, उसका नेतृत्व कौन कर रहा है और उसके परिणाम क्या हो सकते हैं।
राजनेता अपने राजनीतिक जीवन में संकटों से निपटने के लिए वकील, संगठन और संसाधन जुटा लेते हैं। लेकिन आम युवा के सामने यदि कोई कानूनी मामला खड़ा हो जाए तो उसके परिवार को वर्षों तक उसका बोझ उठाना पड़ सकता है।
युवाओं को यह समझना होगा कि राजनीतिक दलों के लिए आंदोलन अक्सर सत्ता की रणनीति होते हैं, लेकिन आम नागरिक के लिए उसके परिणाम वास्तविक और व्यक्तिगत हो सकते हैं।
वायरल होने की मानसिकता
आज के समय में सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को संभावित ‘कंटेंट क्रिएटर’ बना दिया है। हर किसी को प्रसिद्ध होना है। हर किसी को वायरल होना है। और कई बार इसके लिए लोग ऐसी बातें कहने या करने लगते हैं, जिनके परिणामों के बारे में उन्होंने कभी सोचा तक नहीं होता।
अश्लील भाषा, हिंसक बयान और उकसाने वाले नारे कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकते हैं। लेकिन वायरल होने के बाद वही वीडियो कानूनी साक्ष्य भी बन सकता है।
क्या आज के युवा इस बात को समझते हैं?
क्रांति, आंदोलन और परिवर्तन जैसे शब्द बहुत भारी शब्द हैं। इनके पीछे त्याग, अनुशासन, विचार और दीर्घकालिक संघर्ष होता है। केवल कैमरे के सामने नारा लगाने या सोशल मीडिया पर वीडियो डालने से कोई व्यक्ति आंदोलनकारी नहीं बन जाता।
जेपी आंदोलन से अन्ना आंदोलन तक—इतिहास से सीखने की जरूरत
भारत में अनेक बड़े जनांदोलन हुए हैं। जयप्रकाश नारायण का आंदोलन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। उसमें लाखों लोग शामिल हुए। अनेक युवाओं ने संघर्ष किया, लाठियां खाईं और जेल गए।
लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि हर आंदोलन में शामिल होने वाला व्यक्ति सत्ता या राजनीति में नहीं पहुंचता। कुछ नेता बनते हैं, कुछ सत्ता में आते हैं, लेकिन अधिकांश लोग अपने सामान्य जीवन में लौट जाते हैं।
सवाल यह है कि क्या उन आंदोलनों में शामिल आम लोगों की जिंदगी वास्तव में बदल गई?
सरकारें बदलीं। सत्ता बदली। नेता बदले। लेकिन व्यवस्था की अनेक मूल समस्याएं आज भी बनी रहीं।
अन्ना आंदोलन का उदाहरण भी हमारे सामने है। उस आंदोलन से कई राजनीतिक चेहरे उभरे और बाद में उन्होंने अपनी-अपनी राजनीतिक यात्राएं शुरू कीं। लेकिन आंदोलन में शामिल हर आम व्यक्ति को क्या मिला?
इतिहास हमें यही सिखाता है कि किसी भी आंदोलन में शामिल होने से पहले यह समझना आवश्यक है कि उसका अंतिम लाभ किसे मिलेगा और उसकी कीमत कौन चुकाएगा।
युवाओं को भीड़ नहीं, विवेक चाहिए
आज की युवा पीढ़ी को मूर्ख कहना आसान है, लेकिन समस्या इससे कहीं अधिक गंभीर है। यह पीढ़ी सूचना से घिरी हुई है, परंतु विवेकपूर्ण विश्लेषण का अभ्यास कम होता जा रहा है।
हर वायरल वीडियो सत्य नहीं होता। हर लोकप्रिय नारा सही नहीं होता। हर नेता जनहितैषी नहीं होता। और हर भीड़ आंदोलनकारी नहीं होती।
युवाओं को किसी भी आंदोलन का हिस्सा बनने से पहले कम से कम पांच सवाल खुद से पूछने चाहिए—
मैं किस उद्देश्य के लिए यहां हूं?
इस आंदोलन का नेतृत्व कौन कर रहा है?
इसका अंतिम लक्ष्य क्या है?
यदि स्थिति बिगड़ी तो नुकसान किसका होगा?
और क्या मैं अपने निर्णय के परिणामों के लिए तैयार हूं?
लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है। सरकारों से सवाल पूछना आवश्यक है। विरोध करना नागरिक अधिकार है। लेकिन अधिकारों के साथ जिम्मेदारी भी आती है।
आज के युवाओं को केवल स्मार्टफोन, तकनीक और सोशल मीडिया में स्मार्ट नहीं, बल्कि अपने निर्णयों और उनके परिणामों को समझने में भी स्मार्ट बनना होगा।
क्योंकि किसी भी आंदोलन में भीड़ का हिस्सा बनना आसान है। लेकिन सही उद्देश्य, सही नेतृत्व और सही तरीके का चुनाव करना ही वास्तविक बुद्धिमत्ता है।
— संपादकीय