काश माँ तुम होती! ( माँ बेटे की बिछङुन)

मैं अभी संभला नहीं तुम क्यों चली गई

ढूंढता हूँ दिनरात तुम किस गली गई?
माँ तुम्हारे बिन मैं निराश हूँ हताश हूं
मैं था कुंवर तेरा, सिर्फ अब बकवास हूँ
घर तेरा इतना बङा संख्या बेशुमार है
सब पङे अचेत ऐसे सबको बुखार है
खुब सेवा करने पर भी तु बेदमाल थी
आइसू में तङपती जिंदगी बदहाल थी
कहो माँ कैसे मैं राज को समझाउंगा
रोज ढूंढें दादी माँ कैसे मैं बताउँगा
बहूएं तेरी रो रही बेटियां बेहाल है
भूल कहाँ हुयी मेरी सबका सवाल है
रात में आवाज आई बेटी बन आउंगी
बीस साल शेष रहे चुकता कर जांउंगी
रोना मत लाल मेरे दूनिया का दस्तुर है
मेरे कर्म मेरे साथ तेरा क्या कशुर है?
रो पड़ा श्रवण कुमार देख माँ की धोती
चिपट गया  वस्त्र से काश माँ तुम होती
मदन सुमित्रा सिंघल
पत्रकार एवं साहित्यकार
शिलचर असम
मो 9435073653

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