वक्त के निर्मम चपेटाघात सहते
चीखते चिल्लाते
गोली के शिकार बन वे
दम तोड़कर चले गए।
उनकी कमजोरियों का फायदा उठा
लगाकर तोहमत उनपर
मोलभाव करते हुए
उनके लहूसे सनी मिट्टी को
अपने भारी कदमों से
आप रौंदकर चले गए।
वे डूबते गए, पीसते गए
आप सज्जनों के घर को आबाद करते करते
वे बेघर हो गए।
श्राद्धादि क्रिया में आकर
शेखी बघारते रहें आप
ज्यादा यहीं किया आपने
दो-चार फूलमालाएँ चढ़ा कर
उनके कब्र पर
दो लब्जों में
उन्हें शहीद बना दिया
और शहीद वेदीपर धूपवत्ती जला दिया।
आप ऊँचेपद पर बने रहें।
और उन्हें आयनाखाल बना दिया।
पथराई उदास आँखों में
वे टुकुर टुकुर निहारते रहे
अपने प्राणप्रिय आयनाखाल को
उसका चहुमुखी विकाश को
झुर्रिओं भरा, कालसे अवहेलित
असहाय बुढ़ापे का नजारा देखते देखते
बालकनी में चाय की चुस्कियाँ ले रहे हैं आप।
उनके रिसते हुए घावों से
टपकते हुए लहूके बूंद
प्रश्न चिह्न छोड़ते हैं
शून्य में
क्या ? अब भी आप
निहारते हैं अपने चेहरे
आयनाखाल के आईने में ?
(5 मई 1994 को गोली से
मारे गए आएनाखाल चाय बागान के चार शहीदों
को श्रद्धांजली)
– बाबुल नारायण कानू