“एक देश एक चुनाव, लोकतंत्र केलिए लाभदायक या हानिकारक??”

इन दिनों देश मे अचानक से “एक देश एक चुनाव” चर्चा का केन्द्रबिन्दु बना हुआ है और हो भी क्यों ना पिछले 31 अगस्त के दोपहर को खबर आती है कि 18 से 22 सितंबर तक संसद का विशेष सत्र आयोजित होना है। अभी इस विषय पर तमाम तरह के कयास लग ही रहे थें कि इसके एकदिन बाद ही केन्द्र सरकार पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के नेतृत्व में “एक देश एक चुनाव” केलिए एक समिति का गठन करती है और एकप्रकार से ये तय मान लिया जाता है कि सरकार “एक देश,एक चुनाव” पर कोई कदम उठाने वाली है।
अब संसद की विशेष सत्र किस मुद्दे पर बुलाई गई है ये तो भविष्य के गर्भ में है क्योंकि पीएम नरेन्द्र मोदी की सरकार में गोपनीयता का बहुत महत्व रहा है जब तक औपचारिक घोषणा नहीं होता तबतक खबर लीक होना नामुमकिन है। फिर भी जब पूर्व राष्ट्रपति की अध्यक्षता में “एक देश एक चुनाव” पर समिति का गठन हो ही गया है तो आज नहीं तो कल समिति की रिपोर्ट संसद पटल पर आएगा ही। वैसे भी ये मुद्दा पिछले लोकसभा चुनाव के समय भाजपा के संकल्प पत्र में शामिल था।
सबसे पहले तो हमें ये समझना होगा कि “एक देश एक चुनाव” का सहज अर्थ है देश मे एकसाथ लोकसभा और विधानसभाओं का चुनाव सम्पन्न होना। ऐसा नहीं है कि ये भारत मे पहली बार होने जा रहा है या होने वाला है बल्कि उन्नीस सौ सैंतालीस में आजादी मिलने के बाद जब उन्नीस सौ बावन में पहली बार चुनाव हुए थें तबसे लेकर उन्नीस सौ सड़सठ तक लगातार चार बार विधानसभा और लोकसभा चुनाव एकसाथ ही होते रहे। लेकिन धीरे धीरे कई प्रदेशों में स्थानीय क्षत्रपों के मजबूत होने के कारण और केन्द्रीय पार्टी को सत्ता से रोकने के नाम पर छोटी छोटी पार्टियों के गठबंधन से जबसे सरकारें बनने लगी और बहुत कम समय मे ही विभिन्न मतभेदों के कारण विधानसभा भंग होने लगा तभी से देश मे अलग अलग समय पर अलग अलग राज्यों में मध्यावधि विधानसभा चुनाव होने का दौर शुरू होने लगा। लोकसभा के संदर्भ में भी कमोबेश यही स्तिथि मुख्य कारण बनी। उन्नीस सौ बावन से सतहत्तर तक जबतक केन्द्र में एक दल की बहुमत की सरकार थी तबतक लोकसभा चुनाव पांच साल पर ही होती आई भले ही इकहत्तर का चुनाव इसमें अपवाद था। क्योंकि तमाम वरिष्ठ कांग्रेसी, समाजवादी और जनसंघ के नेताओं के तीन तरफा विरोध में उलझी तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान पर मिली महाविजय को भुनाकर राजनीतिक लाभ लेने के लिए बहत्तर में होने वाले चुनाव को कुछ महीने पूर्व इकहत्तर में ही करवा लिया था। ये सिलसिला सतहत्तर में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद टूटा क्योंकि जनता पार्टी में देश के दक्षिणपंथी वामपंथी समाजवादी लगभग सभी विचारधाराओं से जुड़ी पार्टियां शामिल थीं। परिणाम ये हुआ कि दो साल में ही दो नए प्रधानमंत्री देश को मिल गए और उन्नासी में ही देश फिर आम चुनाव के मुहाने पर खड़ा हो गया। लोकसभा या प्रदेशों की विधानसभाओं में जब जब खंडित जनादेश आया तब तब चुनाव निर्धारित समय से पहले होने लगी। फलस्वरूप मौजूदा परिस्थिति ऐसी हो गई कि हर छह महीने के अंतराल पर देश मे चुनाव होते रहते हैं।
ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि एक देश एक चुनाव को कैसे लागू किया जाएगा। इसके लिए कोई विशेष एक्ट बनाया जाएगा या ऐसे ही राज्यों के चुनावों को तय समय से थोड़ा आगे पीछे करके लोकसभा चुनाव के साथ करवाया जाएगा और इसके दो-तीन महीने के भीतर देश के सभी शहरी और ग्रामीण स्थानीय निकाय चुनावों को करवाया जाएगा? अगर बिना किसी मजबूत कानूनी प्रावधान के इसे लागू किया जाता है तो भविष्य में फिर जब जब खंडित जनादेश आने या सरकार चलाने वाली पार्टीयों का अकस्मात गठबंधन टूट जाने की स्तिथि में फिर से लोकसभा-विधानसभाएं भंग होकर मध्यावधि चुनाव होती रहेंगी और फिर से धीरे धीरे साठ-सत्तर के दशक की तरह देश  एक साथ चुनाव के पथ से  हटकर अलग अलग समय मे चुनाव होने के रास्ते पर आ जायेगा। और फिर 360 डिग्री घूमकर दुबारा देश उसी परिदृश्य में खड़ा मिलेगा जहां से हम एक देश चुनाव की यात्रा शुरू करने वाले हैं। इसलिए अगर इसे सही नियत से लागू करना है तो इसमें कुछ ऐसे सख्त प्रावधान की जरूरत है जिससे कभी खण्डित जनादेश आने या किसी भी दल द्वारा सरकार न बना पाने अथवा समय से पहले ही सरकार गिर जाने की स्तिथि में तत्काल मध्यावधि चुनाव नहीं करवाकर तय समय तक के लिए राष्ट्रपति शासन लागू करके उक्त राज्यों में सरकार चलाई जाए लेकिन चुनाव पूरे देश के साथ ही करवाई जाए। किसी सांसद विधायक के आकस्मिक निधन होने की स्तिथि में उक्त क्षेत्र के पूर्व चुनाव में वोटों की दृष्टि से दूसरे पायदान पर रहने वाले को आगामी आम चुनाव होने तक शपथ पाठ करवाकर विधायक सांसद की जिम्मेदारी दी दी जाए।
यूँ तो एकदेश एक चुनाव से राष्ट्र को कई मोर्चे पर लाभ होगा सबसे पहले तो अलग अलग समय मे चुनाव होते रहने से जो भारी भरकम रकम खर्च होता है वो बचेगा। इसके अलावा सरकारें बिना किसी दबाव के साढ़े चार साल तक मजबूती चल सकेंगी और जरूरत पड़ने पर ठोंस और शख्त निर्णय भी ले सकती हैं। आम जनता भी साढ़े चार साल तक राजनीतिक मुद्दों को भूलकर विकास से संबंधित मामलों और तमाम वास्तविक मुद्दों पर अपना ध्यान केंद्रित कर सकेगी। बहरहाल हर चीज का एक दूसरा पहलू भी होता है। ठीक वैसे ही इसका भी दूसरा पहलू है जो सबसे महत्वपूर्ण भी है। एक देश एक चुनाव लागू होने से लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होने का भी गुंजाइश है। इससे सरकारें निरंकुश,अहंकारी हो सकती हैं जो तानाशाही की पहला लक्षण होता है। पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न संस्थानों पर सत्ता का वर्चस्व साफ झलक रहा है। ऐसी स्थिति में विपक्ष भी बहुत कमजोर होकर रह जायेगा। जो लोकतांत्रिक व्यवस्था केलिए ठीक नहीं है। सबसे बड़ी बात है कि एक साथ चुनाव होने से राज्यसभा के सदन में सदस्यों के पहुँचने की जो विधि बनाई गई है जिससे राज्यसभा में अमूमन किसी एक दल का बहुमत नहीं होता है वहां भी वो विधि कुछ हद तक टूटेगी और एकक दल का बहुमत हो सकता है। ये सभी पहलुएं सत्ता को तानाशाही की ओर ले जाने के लिए पर्याप्त हैं। और ये कतई स्वस्थ और मजबूत लोकतंत्र के लिए शुभ लक्षण नहीं हैं। लोकतंत्र इस देश की आत्मा है स्वाधिकार और समानाधिकार है। लोकतंत्र का मजबूत रहना हम आम नागरिकों के मजबूत होने जैसा है।
इसलिए बिना सोचें समझें एक देश एक चुनाव का समर्थन या विरोध नहीं करके इसपर और ज्यादा चिंतन,मनन और अध्ययन की आवश्यकता है।
                   राजदीप राय
                करीमगंज,दुल्लभछड़ा
                8011960168

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