देश का नाम सच मे सिर्फ भारत होने वाला है या जी20 में शरीक होने वाले राष्ट्राध्यक्षों को राष्ट्रपति द्वारा दिए जाने वाले भोज के निमंत्रण पत्र पर “President Of Bharat” लिखना महज एक पारंपरिकता को दर्शाने की बानगी भर है?? इस प्रश्न का उत्तर तो आने वाले कुछ दिनों में मिलेगा। दरअसल जबसे संसद की विशेष सत्र की खबर आई है तबसे केन्द्र सरकार की तरफ से अब तक ऐसे दो शिगुफा छोड़ा गया, जिसपर राष्ट्र व्यापी चर्चा हो रहा है। संसद के विशेष सत्र की खबर आने के अगले दिन ही पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में “एक देश एक चुनाव” पर समिति गठन होता है और इसके दो दिन बाद राष्ट्रपति द्वारा एक निमंत्रण पत्र जारी होता है जिसपर “President of Bharat” लिखा होता है। ये सब मीडिया का ध्यान संसद की विशेष सत्र तक भटकाये रखने का हथकंडा है या सचमुच इन दो मुद्दों में से किसी एक का निपटारा होना है ये कुछ दिन बाद ही पता चलेगा। मगर यदि देश के नाम से सचमुच ही इंडिया को हटाया जाता है तो ये गलत समय पर गलत नियत से लिया गया एक सही निर्णय होगा।
गलत समय इसलिए कि जब पीएम मोदी जी को देश के नाम से इंडिया को हटाना ही था तो 26 मई 2014 से विपक्षी महागठबंधन का नाम I.N.D.I.A रखने से पहले तक नौ साल से अधिक सही समय था लेकिन तब पीएम मोदी जी का ध्यान इस पर नहीं गया और जब विपक्षी गठबंधन का नामकरण इंडिया के समान उच्चारित I.N.D.I.A हो ही गया ऐसे में इंडिया शब्द को हटाने का फैसला सरकार की बौखलाहट को दर्शाने जैसा प्रतीत होगा। अगर सही मन से सरकार ऐसा करना भी चाहती है तो मौजूदा दौर में इसे करने का उपयुक्त समय आगामी लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद नई सरकार गठन के बाद होता। लेकिन अभी जब विपक्षी गठबंधन का नाम I.N.D.I.A हो गया है ऐसे में इंडिया नाम हटाने से देश दुनिया मे गलत संदेश जाएगा।
दूसरी बात गलत नियत इसलिए क्योंकि अगर असल मायने में इंडिया नाम हटाकर पूरे प्रेम भाव के साथ वैचारिक प्रतिबद्धता से पीएम मोदी भारत नाम रखना चाहते तो 2014 में सत्ता पाने के बाद से अधिकांश योजनाओं और उसके प्रचार प्रसार में बार बार इंडिया शब्द नहीं आता। जैसे “मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, डिजिटल इंडिया, कैशलेस इंडिया, ट्रांस्फोर्मिंग इंडिया, खेलो इंडिया, इनक्रेडिबल इंडिया” आदि। इसका साफ मतलब है कि सरकार अब अगर देश का नाम भारत करना चाहती भी है तो अंतरमन से नहीं बल्कि विपक्ष द्वारा अपने गठबंधन का I.N.D.I.A नाम रखने से तिलमिलाकर ऐसा कर रही है। और सही निर्णय इसलिए कि एक देश का दो नाम अक्सर सुनने में अच्छा नहीं लगता। दूसरी बात इंडिया शब्द विदेशियों द्वारा भले ही सिंधु घाटी के नाम पर पड़ने की बात हमारे इतिहासकार करते हो फिर भी सुनने में ये शब्द किसी भी सूरत में भारतीय शब्द से नहीं मिलता और इससे अपनेपन का भाव नहीं आता और सबसे बड़ी बात हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि इसी नाम की एक कंपनी बनाकर लुटेरे हमें गुलाम बनाने आएं थें। भारत वो नाम है लगभग पांच हजार साल से चलता आया है, जिसका उल्लेख विष्णुपुराण में भी आता है। भले ही राजतंत्र में ये भूमि कई राज्यों में विभक्त रही हो मगर सांस्कृतिक दृष्टि से हिमालय से लेकर हिन्द महासागर तक विस्तृत इस भूखंड को भारत ही कहा जाता था। इसके अलावा भी राजसूय यज्ञ और अश्वमेध यज्ञ के जरिए पृथक पृथक राज्यों में विभाजित इस भूखंड को चक्रवर्ती सम्राट मिलता था। ईशा पूर्व 375 में भी आचार्य चाणक्य ने चंद्रपुत मौर्य के माध्यम से फिर से राज्यों को नियंत्रित करने केलिए केन्द्रीय व्यवस्था गठन किया तो उसका नाम भारत ही रखा गया। और यही बजह है कि व्यक्तिगत रूप से मैं भी चाहता हूँ देश का नाम सिर्फ और सिर्फ भारत ही रहे और इंडिया को हटा दिया जाए।
समझने वाली बात ये है कि देश के नाम से इंडिया को हटा पाना इतना भी सहज नहीं जितना भाजपाई प्रवक्ता या समर्थक समझ रहे हैं और इतना मुश्किल भी नहीं जितना विपक्षी समझा रहे हैं। अगर इंडिया शब्द को हटाना भी है, इसके लिए संविधान संशोधन की जरूरत है। इसके अलावा दक्षिणी भारत मे इसके खिलाफ कोई स्वर ना उठे इसे भी ध्यान में रखना पड़ेगा। पहले से स्थापित सभी संस्थानों का पुनः नामकरण करना पड़ेगा जिसमें हजारों करोड़ो रूपये की धनराशि खर्च हो सकती है। बहरहाल इलाहाबाद को प्रयागराज हुए लगभग पांच साल पूरे हो गए लेकिन अभी तक इलाहाबाद हाईकोर्ट या इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का नाम नहीं बदला जा सका। एक और बात है कि इंडिया के लोगों को इंडियन कहा जाता है वैसे भारत के लोगों को भारतीय, या भारती या भारतवासी इन तीनो में से क्या कहा जायेगा इसपर भी कोई एक नाम तय करना पड़ेगा। विपक्षी पार्टियां या उससे जुड़े तमाम बुद्धिजीवी जिस प्रकार अनर्गल मुद्दों का हवाला देकर विरोध कर रहे हैं वो सब तर्कों और तथ्यों की कसौटी पर तनिक भी नहीं टिकते। विपक्ष को अगर विरोध करना है तो तर्कों और तथ्यों के आधार पर करना चाहिए ना कि सिर्फ विरोध केलिए कुछ भी बयान देते हैं। राजदीप राय दुल्लभछोड़ा, करीमगंज
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