कही हज़ारो मे मिलते, दो चार है हमलोग।।
कभी शाख मे है तो कभी जड़ मे है हमलोग, कही हज़ारो मे मिलते, दो चार है हमलोग।। यूँ तो मिलते नहीं काश ढूंढ़ने से भी कभी कभी मिल जाते है आँगन मे टहलते हुए हमलोग।। हम कौन है और किस वजह से है, क्या बताये कभी यूँ ही बेवजह ज़िन्दगी जी लेते है हमलोग।। … Read more