वाह! पनघट।
वाह! पनघट। हां पनघट सखियों की जमघट मन की बातें करती जहाँ समस्या सुलझाती कमर पर गगरी ना होती शहरी वसंत मे कू कोयल की और छम- छम गूंज पायल की गगरी छल – छल छलकती बलखाती, संभलती पगडंडी पर चलती सरकती दुपट्टा संभालती शीर्ष पतियों से लालिमा विदा लेती इधर सखियाँ घर लौटती अब … Read more