रूह का जायका
रवायतों की ज़ंजीरों के उस परे अदावतों की लकीरों से बिन डरे शिकायतों के मजीरों को दूर धरे जब “वो” शाम ढले, तेरे साये तले रात भर धुंए का साया बन ढलना चाहता हूँ अपनी रूह का जायका चखना चाहता हूँ बंदिशों के ताने बाने तोड़ रंजिशों के सब बहाने मोड़ ख्वाहिशों के हर ठिकाने … Read more