बेमौसम बारिश और तूफान की मार : फिर संकट में अन्नदाता, किसानों के नुकसान की भरपाई कौन करेगा?

प्रकृति की मार से खेतों में बिछी धान की फसल, किसानों की महीनों की मेहनत पर फिरा पानी

भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहां की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा आधार आज भी किसान और कृषि क्षेत्र हैं। लेकिन विडंबना यह है कि देश का अन्नदाता आज भी पूरी तरह मौसम की अनिश्चितताओं पर निर्भर है। कभी सूखा, कभी बाढ़, कभी ओलावृष्टि तो कभी बेमौसम बारिश उसकी वर्षों की मेहनत और उम्मीदों पर पानी फेर देती है। पिछले दो-तीन दिनों से उत्तर प्रदेश और बिहार के अनेक इलाकों में चक्रवाती तूफान ‘अर्णब’ के प्रभाव से हुई तेज बारिश और आंधी ने एक बार फिर किसानों के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है।

अक्टूबर का अंतिम सप्ताह किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। इस समय खरीफ की प्रमुख फसल धान पककर तैयार होती है और कई क्षेत्रों में कटाई तथा फसल को सुखाने का काम चल रहा होता है। ऐसे समय में अचानक हुई तेज बारिश और हवाओं ने खेतों में खड़ी धान की फसल को गिरा दिया है। जिन किसानों ने फसल काट ली थी, उनकी उपज खुले खेतों और खलिहानों में भीगने की आशंका है। इससे केवल उत्पादन ही प्रभावित नहीं होगा, बल्कि अनाज की गुणवत्ता, बाजार मूल्य और भंडारण क्षमता पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में मौसम की इस मार से धान की खेती करने वाले किसानों की चिंता बढ़ गई है। धान के अलावा केला, सब्जियों और अन्य मौसमी फसलों को भी नुकसान पहुंचने की आशंका है। खेतों में जलजमाव होने से फसल की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। सबसे बड़ी परेशानी उन छोटे और सीमांत किसानों की है, जिन्होंने कर्ज लेकर खेती की है और जिनके लिए एक फसल का नुकसान पूरे परिवार की आर्थिक व्यवस्था को संकट में डाल सकता है।

सवाल यह है कि आखिर हर साल प्राकृतिक आपदाओं का सबसे अधिक बोझ किसानों को ही क्यों उठाना पड़ता है? खेती में बीज, खाद, कीटनाशक, सिंचाई, मजदूरी और मशीनों पर भारी खर्च करने के बाद जब फसल तैयार होती है, तब मौसम की एक मार उनकी सारी उम्मीदों को समाप्त कर सकती है। किसान के पास न तो अपनी फसल को बचाने के लिए पर्याप्त संसाधन होते हैं और न ही अचानक होने वाली प्राकृतिक आपदा से निपटने की कोई ठोस व्यवस्था।

ऐसी स्थिति में केंद्र और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। उत्तर प्रदेश और बिहार की सरकारों को चाहिए कि प्रभावित क्षेत्रों में तत्काल कृषि एवं राजस्व विभाग की संयुक्त टीमें भेजकर फसलों के नुकसान का निष्पक्ष और पारदर्शी सर्वेक्षण कराया जाए। केवल कागजी आंकड़ों के आधार पर नहीं, बल्कि खेतों में पहुंचकर वास्तविक स्थिति का आकलन किया जाना चाहिए। जिन किसानों की फसलें नष्ट हुई हैं, उन्हें शीघ्र उचित मुआवजा दिया जाए। फसल बीमा योजना के अंतर्गत आने वाले किसानों को भी बिना अनावश्यक सरकारी प्रक्रियाओं में उलझाए बीमा राशि उपलब्ध कराने की व्यवस्था होनी चाहिए।

इसके साथ ही सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसानों को राहत देने की घोषणा केवल राजनीतिक बयान बनकर न रह जाए। मुआवजे की राशि समय पर उनके बैंक खातों तक पहुंचे, ताकि वे अगली फसल की तैयारी कर सकें और कर्ज के बोझ से उबरने का प्रयास कर सकें।

यह भी आवश्यक है कि कृषि विभाग मौसम संबंधी पूर्व चेतावनियों को गांव-गांव तक पहुंचाने की प्रभावी व्यवस्था विकसित करे। किसानों को मोबाइल संदेश, स्थानीय रेडियो, पंचायत और कृषि अधिकारियों के माध्यम से समय रहते जानकारी मिले, ताकि वे तैयार फसल की कटाई, सुरक्षित भंडारण और जल निकासी के लिए आवश्यक कदम उठा सकें।

प्राकृतिक आपदाओं को रोकना मनुष्य के हाथ में नहीं है, लेकिन उनके कारण होने वाले नुकसान को कम करना निश्चित रूप से सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है। कृषि को आधुनिक बनाने की बात तभी सार्थक होगी, जब किसान को मौसम की मार से बचाने के लिए प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था भी उपलब्ध कराई जाए।

देश के नीति-निर्माताओं को समझना होगा कि किसान केवल अनाज पैदा नहीं करता, बल्कि पूरे देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करता है। यदि किसान आर्थिक रूप से कमजोर होगा तो उसका प्रभाव केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी।

आज उत्तर प्रदेश और बिहार के खेतों में गिरी धान की फसल केवल एक कृषि नुकसान की तस्वीर नहीं है, बल्कि यह उस किसान की पीड़ा का प्रतीक है, जिसने महीनों तक दिन-रात मेहनत करके अपनी फसल तैयार की थी। उसकी आंखों में अब अच्छी पैदावार और आमदनी के सपनों की जगह नुकसान और कर्ज की चिंता दिखाई दे रही है।

अन्नदाता को केवल सम्मान और आश्वासन नहीं, बल्कि संकट की घड़ी में ठोस आर्थिक सहायता चाहिए। सरकारों को चाहिए कि वे किसानों के आंसू पोंछने के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाएं। आखिरकार, किसान बचेगा तभी खेत बचेगा और खेत बचेगा तभी देश की खाद्य सुरक्षा सुरक्षित रहेगी।

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